कनाडा के टोरंटो में आयोजित ‘हिंदू विश्व बंधु–दोस्ती के साथ दुनिया को अपनाएं’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भारत की सेवा-परंपरा, विविधता में एकता और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की अवधारणा पर विस्तार से अपने विचार रखे।
कार्यक्रम का आयोजन कैनेडियन हिंदूज फॉर आउटरीच, रिलेशंस एंड डायलॉग (CHORD) ने किया था। इसमें कनाडा के पूर्व रक्षा मंत्री एवं अल्बर्टा के पूर्व प्रीमियर जेसन केनी सहित भारतीय समुदाय के कई प्रतिनिधि शामिल हुए।
भारत ने मदद मांगने वालों को कभी मना नहीं किया: भागवत
मोहन भागवत ने कहा कि दुनिया में जब भी किसी देश या समुदाय ने भारत से सहायता मांगी, भारत ने कभी इनकार नहीं किया। कई अवसरों पर भारत ने बिना मांगे भी जरूरतमंदों की सहायता के लिए हाथ बढ़ाया है।
उन्होंने इसे भारत की प्राचीन परंपरा और देश के सांस्कृतिक DNA का हिस्सा बताते हुए कहा, “अगर हिंदू जागते हैं, तो दुनिया जागती है।” भागवत के मुताबिक, भारत का उत्थान किसी पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि मानवता की सेवा करने के लिए होना चाहिए।
#WATCH | Toronto, Canada | Addressing the 'Hindu Vishwa Bandhu – Embrace the World in Friendship' event in Toronto, RSS Chief Mohan Bhagwat says, "Whenever Bharat has been asked for help anywhere in the world, it has never refused and it extends a helping hand even without even… pic.twitter.com/8bHIhhoGB2
— ANI (@ANI) August 30, 2026
विविधता भारत की कमजोरी नहीं, एकता का स्वरूप
RSS प्रमुख ने कहा कि हिंदू विचार सजीव और निर्जीव, दोनों को अपना मानने की शिक्षा देता है। भारतीय परंपरा में अलग-अलग भाषा, धर्म, पूजा-पद्धति और जीवनशैली को एकता के रास्ते की समस्या नहीं माना जाता।
भागवत ने कहा कि भारत केवल विविधता में एकता को स्वीकार नहीं करता, बल्कि विविधता को ही एकता का स्वाभाविक स्वरूप मानता है। यही कारण है कि अनेक संस्कृतियों, भाषाओं और परंपराओं के बावजूद भारत की मूल एकता बनी हुई है।
‘वसुधैव कुटुंबकम’ का अर्थ पूरी पृथ्वी एक परिवार
मोहन भागवत ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि खुले विचारों और ज्ञान से संपन्न लोग पूरी पृथ्वी को एक परिवार मानते हैं।
उन्होंने कहा कि भौतिक रूप से लोगों के शरीर, रंग-रूप और आकार अलग हो सकते हैं, लेकिन मूल रूप से सभी मनुष्य एक हैं। इसी समझ के कारण दूसरों की सेवा करना मनुष्य का कर्तव्य बनता है। सेवा से मिलने वाला संतोष स्थायी होता है।
हिंदू शब्द किसी एक पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं
भागवत ने कहा कि ‘हिंदू’ शब्द को किसी एक भाषा, पूजा-पद्धति या जीवनशैली के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता। इसमें अलग-अलग मान्यताओं और परंपराओं को स्वीकार करने का भाव शामिल है।
उनके अनुसार, हिंदू विचार सभी का सम्मान और स्वीकार करने की शिक्षा देता है। भारत ने इतिहास में उत्पीड़न से बचकर आए अनेक समुदायों को शरण दी और उन्हें अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान के साथ आगे बढ़ने का अवसर दिया।
भारत विश्वगुरु बना, महाशक्ति नहीं: भागवत
मोहन भागवत ने कहा कि भारत का उद्देश्य दुनिया पर अधिकार स्थापित करना नहीं रहा। भारत ने ज्ञान, आयुर्वेद, खगोल विज्ञान और सभ्यतागत मूल्यों को दूसरे देशों तक पहुंचाया, लेकिन किसी देश को जीतने के उद्देश्य से ऐसा नहीं किया।
उन्होंने कहा कि भारत ने अपने चरित्र और दुनिया की सेवा करने वाली संस्कृति के कारण ‘विश्वगुरु’ का स्थान प्राप्त किया, न कि सैन्य अथवा राजनीतिक प्रभुत्व के कारण।
न्यूयॉर्क में भी दिया था वैश्विक एकता का संदेश
टोरंटो कार्यक्रम से पहले मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन स्थित इन्फोसिस थिएटर में आयोजित ‘Universal Oneness Celebration’ को संबोधित किया था।
अपने संबोधन में उन्होंने कहा था कि अमेरिका के संदर्भ में बहुलतावाद और भारत के संदर्भ में विविधता में एकता की चर्चा होती है। भारत की विविधता का सम्मान, स्वीकार और उत्सव मनाया जाना चाहिए। उन्होंने भारतीय प्रवासियों से अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए संबंधित देश के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनने का भी आह्वान किया।
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