जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में कांग्रेस सांसद और प्रोफेसर अंगोमचा बिमोल अकोइजाम के खिलाफ यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, विश्वविद्यालय की 11 महिला छात्राओं ने JNU की आंतरिक शिकायत समिति यानी Internal Complaints Committee (ICC) के समक्ष शिकायत दर्ज कराई है। आरोपों में अनुचित और यौन संकेत वाले कथनों के साथ-साथ कथित तौर पर बेहतर अंक देने के बदले यौन संबंधी फायदे मांगने जैसी शिकायतें शामिल हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने मामले में कार्रवाई और समयबद्ध जांच की मांग को लेकर प्रदर्शन किया है।
JNU में ABVP का प्रदर्शन, जांच में देरी पर उठाए सवाल
ABVP ने 9 सितंबर को JNU के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के बाहर प्रदर्शन किया और कांग्रेस सांसद तथा JNU प्रोफेसर बिमोल अकोइजाम के खिलाफ सामने आई शिकायतों की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग की।
छात्र संगठन ने सवाल उठाया कि यदि शिकायतें मई में दर्ज की गई थीं, तो करीब चार महीने बीतने के बाद भी जांच का अंतिम निष्कर्ष सामने क्यों नहीं आया।
ABVP ने विश्वविद्यालय प्रशासन और आंतरिक शिकायत समिति से जांच की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि मामले में पारदर्शिता जरूरी है, ताकि न तो शिकायतकर्ताओं के अधिकार प्रभावित हों और न ही आरोपी के खिलाफ बिना जांच पूरी हुए कोई पूर्वाग्रह बने।
मई में सामने आई थीं कथित शिकायतें
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला मई के पहले सप्ताह में आयोजित वाइवा परीक्षाओं से जुड़ा बताया जा रहा है। दावा है कि एक छात्रा ने अपने अनुभव को छात्रों के एक निजी WhatsApp ग्रुप में साझा किया, जिसके बाद अन्य महिला छात्रों ने भी इसी तरह की शिकायतें सामने रखीं।
इसके बाद कथित तौर पर 11 छात्राओं ने JNU की Internal Complaints Committee का रुख किया। शिकायतों में अनुचित टिप्पणियों, यौन संकेत वाले कथनों और कथित रूप से अतिरिक्त अंक देने के बदले यौन संबंधी लाभ मांगने जैसे आरोपों का उल्लेख किया गया है।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये अभी केवल आरोप हैं और ICC की जांच का निष्कर्ष ही तय करेगा कि इन शिकायतों में कितनी सच्चाई है।
90 दिन की समयसीमा को लेकर विवाद
मामले में सबसे बड़ा सवाल जांच की अवधि को लेकर उठाया जा रहा है। JNU की आंतरिक शिकायत समिति से संबंधित दिशा-निर्देशों के अनुसार, यौन उत्पीड़न की शिकायत पर जांच सामान्य रूप से शिकायत प्राप्त होने के 90 दिनों के भीतर पूरी की जानी चाहिए और इसके बाद रिपोर्ट जमा की जाती है।
यदि शिकायतें मई में मिली थीं, तो अगस्त तक 90 दिन की अवधि एक महत्वपूर्ण समयसीमा बन जाती है। इसी आधार पर ABVP ने सवाल किया है कि जांच अब तक पूरी क्यों नहीं हुई। मामले में यह भी मांग की जा रही है कि विश्वविद्यालय स्पष्ट करे कि जांच किस चरण में है और क्या समयसीमा बढ़ाने का कोई प्रशासनिक या प्रक्रियात्मक कारण है।
शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा पर भी उठे सवाल
आरोपी प्रोफेसर के एक वर्तमान सांसद होने के कारण मामले ने राजनीतिक रूप भी ले लिया है। बिमोल अकोइजाम कांग्रेस के लोकसभा सांसद हैं और इनर मणिपुर सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं।
ABVP ने सवाल उठाया है कि क्या शिकायतकर्ताओं को किसी संभावित राजनीतिक या संस्थागत दबाव से पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है।
किसी भी यौन उत्पीड़न शिकायत में शिकायतकर्ताओं की गोपनीयता, सुरक्षा और बिना दबाव के बयान देने की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में विश्वविद्यालय प्रशासन से एक निष्पक्ष, स्वतंत्र और विश्वसनीय प्रक्रिया सुनिश्चित करने की अपेक्षा की जा रही है।
कौन हैं बिमोल अकोइजाम?
बिमोल अकोइजाम एक शिक्षाविद से राजनेता बने हैं। वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सामाजिक प्रणालियों के अध्ययन का केंद्र से जुड़े प्रोफेसर हैं।
उनके अकादमिक कार्यों में पहचान की राजनीति, सामाजिक और राजनीतिक मनोविज्ञान, संघर्ष, राष्ट्र-राज्य, अल्पसंख्यक, अंतर-समूह संबंध, जेंडर संबंध और मणिपुर से जुड़े सामाजिक-राजनीतिक विषय शामिल रहे हैं।
उन्होंने मणिपुर की राजनीति, संघर्ष और Armed Forces (Special Powers) Act यानी AFSPA जैसे विषयों पर भी लेखन किया है।
2024 में बने कांग्रेस सांसद
बिमोल अकोइजाम ने 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर इनर मणिपुर सीट से चुनाव लड़ा था। उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार थौनाओजम बसंता कुमार सिंह को एक लाख से अधिक वोटों के अंतर से हराया था।
यह उनका पहला लोकसभा कार्यकाल है। संसद में भी वह मणिपुर से जुड़े मामलों को लेकर मुखर रहे हैं।
कांग्रेस और छात्र संगठनों की भूमिका पर भी सवाल
ABVP ने कांग्रेस, NSUI और वामपंथी छात्र संगठनों की प्रतिक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए हैं। संगठन का आरोप है कि महिला सुरक्षा और छात्र अधिकारों के मुद्दों पर सक्रिय रहने वाले समूहों को इस मामले में भी समान मानदंड अपनाने चाहिए।
हालांकि, किसी राजनीतिक दल या संगठन की प्रतिक्रिया से अलग, जांच का केंद्र केवल शिकायतों के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों पर होना चाहिए।
अगर आरोप गलत साबित होते हैं तो बिमोल अकोइजाम को निष्पक्ष प्रक्रिया के जरिए अपना नाम साफ करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। वहीं, यदि आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो विश्वविद्यालय के नियमों और कानून के अनुसार उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।
JNU के सामने संस्थागत विश्वसनीयता की चुनौती
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल JNU की आंतरिक शिकायत व्यवस्था की विश्वसनीयता को लेकर है। जब इतनी गंभीर प्रकृति की शिकायतें सामने आई हों, तब जांच का निष्पक्ष और समयबद्ध होना जरूरी है।
विश्वविद्यालय प्रशासन पर अब यह दबाव बढ़ रहा है कि वह जांच की प्रगति, देरी के कारण और शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा को लेकर स्थिति स्पष्ट करे। फिलहाल आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं। ऐसे में अंतिम निष्कर्ष ICC की जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
हमारी यूट्यूब चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करे
Like, Share and Subscribe our YouTube channel