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जिसने राष्ट्रवाद से लड़ने के लिए बनाया ₹8300 करोड़ का फंड, उसने अब अमेरिका में खरीदे 200+ रेडियो स्टेशन

FCC की इस मंजूरी के कारण अमेरिकी चुनाव के कुछ दिन पहले वामपंथी कारोबारी की पहुँच 16 करोड़ से अधिक लोगों और 40 बाजारों तक हो सकती है। जिस कम्पनी को सोरोस ने अधिग्रहित किया है उस पर $400 मिलियन (लगभग ₹3200 करोड़) का कर्ज है।

Last updated: 2024/09/27 at 12:28 PM
One India News Team
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15 Min Read
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वामपंथी अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस को अमेरिका में ‘ऑडेसी’ खरीदने की मंजूरी मिल गई है। ऑडेसी कंपनी अमेरिका की दूसरी सबसे बड़ी रेडियो चेन है और इसके पास अमेरिका के भीतर 200 से अधिक रेडियो स्टेशन हैं। इसे सुनने वालों की संख्या 16 करोड़ से अधिक है। इसे हाल ही में अमेरिका में रेडियो, केबल और ऐसे ही इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को नियंत्रण करने वाली संस्था FCC ने मंजूरी दी है। यह एक बड़ी डील मानी जा रही है।

Contents
कौन हैं जॉर्ज सोरोस?सरकारों के खिलाफ प्रोपगेंडा और भारत

FCC की इस मंजूरी के कारण अमेरिकी चुनाव के कुछ दिन पहले वामपंथी कारोबारी की पहुँच 16 करोड़ से अधिक लोगों और 40 बाजारों तक हो सकती है। जिस कम्पनी को सोरोस ने अधिग्रहित किया है उस पर $400 मिलियन (लगभग ₹3200 करोड़) का कर्ज है। सोरोस ने हाल ही में यह कर्ज अपने हाथों में ले लिया था। सोरोस ने लगभग $280 मिलियन टर्म लोन और $135 मिलियन रिवॉल्विंग कर्ज को 50 सेंट/डॉलर पर या ऑडेसी में लगभग 40% मालिकाना हक़ के बदले लिया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, “FCC का यह निर्णय मतदान के बाद आया। FCC में शामिल 3 डेमोक्रेट ने इस कदम के पक्ष में मतदान किया, जबकि दो रिपब्लिकन ने इसके खिलाफ मतदान किया।” FCC नियमों के अनुसार, अमेरिकी रेडियो स्टेशनों पर किसी विदेशी कंपनी का मालिकाना हक़ 25% से अधिक नहीं होना चाहिए।

इस विषय में उपलब्ध सार्वजनिक दस्तावेजों के अनुसार, सोरोस ने कम्पनी की बोली लगाने के लिए अपने विदेशी निवेश वाली कम्पनी का इस्तेमाल किया। उसने विदेशी कम्पनी के जरिए मालिक बनने के लिए FCC से रियायत भी माँगी। इस प्रक्रिया में अमेरिकी सुरक्षा पर प्रभाव को भी जाँचा जाता है, इस प्रक्रिया में 1 साल तक लग सकता है। इस बार इसका पालन भी नहीं हुआ।

FCC के एक प्रवक्ता के अनुसार, “कोई भी निर्णय तब तक अंतिम नहीं होता जब तक आयोग इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं करता। सोरोस वाले निर्णय हमने सार्वजनिक नहीं किया है।” FCC के प्रवक्ता ने बताया है कि उसे ऑडेसी के दिवालिया होने के पहले के स्वरुप और बाद के स्वरुप को लेकर आवेदन मिला है। उसने बताया है कि इसमें 1 साल तक लगता है।

दूसरी ओर, FCC के कुछ लोगों ने इस बात को नकारा है कि सोरोस वाली डील में कोई जल्दबाजी बरती गई है। उन्होंने बताया कि क्यूम्यलस मीडिया (2018), आईहार्ट मीडिया (2019), लिबरमैन टेलीविजन (2019), फ्यूजन कनेक्ट (2019), विंडस्ट्रीम होल्डिंग्स (2020), अमेरिका-सीवी स्टेशन ग्रुप (2021), और अल्फा मीडिया (2021) के ऐसे ही दिवालिया होने के बाद यही प्रक्रिया अपनाई गई थी और इतना ही समय लिया गया था।

वहीं, पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नामित FCC आयुक्त नाथन सिमिंगटन ने इस प्रक्रिया की आलोचना की है और दावा किया है कि इसे तेजी से आगे बढ़ाया गया है। उन्होंने आरोप लगाया, “FCC ऐसी कम्पनियों को विदेशी स्वामित्व वाली सीमा की शर्त से छूट देता है जो दिवालियापन से बाहर निकल रहीं हो। मेरे विरोध के बावजूद, इस निर्णय में ऐसा ही किया गया। लेकिन यह एकमात्र ऐसा कारण नहीं था जिससे इसको तेजी से आगे बढ़ाया गया।”

सिमिंगटन ने आगे बताया, “FCC ने कर्मचारियों के ही स्तर पर इसे निपटाने का फैसला ले लिया था। इसकी सूचना FCC आयुक्तों को शुक्रवार को दी गई। इस संबंध में लगभग कोई तथ्यात्मक रिकॉर्ड नहीं है क्योंकि इसका कोई विश्लेषण तक नहीं किया गया। अध्यक्ष के अलावा किसी भी आयुक्त को इस मुद्दे के बारे में विचार करने के लिए नहीं बुलाया गया। यहाँ तक कि कर्मचारियों को हमारे वोट के बिना हमारी ओर से इसे संभालने का निर्देश दिया गया था। यही असली फास्ट-ट्रैक है।”

ट्रंप द्वारा FCC में नामित दूसरे सदस्य ब्रेंडन कैर ने भी पहले इस सौदे के बारे में चिंता जताई थी। उन्होंने हाल ही में कहा, “मुझे लगता है कि FCC कई वर्षों से स्थापित की गई लेन-देन की समीक्षा के लिए अपनी सामान्य प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहा है। मुझे लगता है कि FCC पहली बार एक बिल्कुल नया शॉर्टकट बनाने के लिए तैयार है।”

कैर ने कहा, “हम आम तौर पर लोगों से हमारे पास याचिका दायर करने के लिए कहते हैं, इसके बाद विदेशी मालिकाना हक़ की जाँच के लिए सुरक्षा एजेंसियों की राय लेते हैं और उसके बाद मतदान करते हैं। यहाँ, वे कुछ ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं जो आयोग के मामले में पहले कभी नहीं किया गया है।”

कैर ने एक इंटरव्यू में कहा, “सोरोस देश के दूसरे सबसे बड़े रेडियो स्टेशन समूह को खरीदना चाहता है। उनमें से कुछ पेंसिल्वेनिया, वर्जीनिया और फ्लोरिडा (आगामी राष्ट्रपति चुनाव में महत्वपूर्ण राज्य) में हैं। अधिकांश संभवतः संगीत या खेल से संबंधित हैं, लेकिन उन राज्यों में कुछ ऐसे भी हैं जो बातचीत प्रसारित करते हैं।”

हालाँकि, एक वेबसाइट दिखाती है कि यह अमेरिका की सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली रेडियो कम्पनियों में से एक है। ऑडेसी ने जनवरी में दिवालियापन के लिए आवेदन किया था, इसमें दावा किया गया था कि उनके विज्ञापन राजस्व में अरबों डॉलर की गिरावट आई है। उन्ह्होने इसे वित्तीय कठिनाइयों का सबसे बड़ा कारण बताया था।

सोरोस के इस कम्पनी को खरीदने के बाद अवर्तमान शेयरहोल्डर की भागीदारी इसमें खत्म हो जाएगी। इससे पहले टेक्सास के रिपब्लिकन सांसद चिप रॉय ने अप्रैल में सोरोस की संदिग्ध गतिविधियों पर FCC के ढुलमुल रवैये का मामला उठाया था।

रॉय द्वारा खुलासा किए जाने से कुछ महीने पहले ही सोरोस ने ऑडेसी में लगभग $400 मिलियन का निवेश किया था। रॉय ने एक कानून का हवाला दिया, इसके अनुसार जिन फर्मों में 25% से अधिक विदेशी स्वामित्व है, वह रेडियो लाइसेंस नहीं रख सकतीं। रॉय के कारण सोरोस की रेडियो नेटवर्क खरीदने की योजना खटाई में पड़ गई।

रॉय ने FCC को एक पत्र में लिखा है कि सोरोस ने FCC को आवेदन देकर सामान्य प्रक्रिया का पालन करने के बजाय प्रक्रिया ही खत्म करने का आवेदन दिया और इसे कुछ समय के लिए टालने का अनुरोध भी किया। सोरोस ने इस पूरी प्रकिया को ही उलट पलट डालने का प्रयास किया।

93 साल के वामपंथी सोरोस ने अपनी 6.7 बिलियन डॉलर की कुल संपत्ति का उपयोग करके कई लिबरल नीतियों को बढ़ाया है। 2021 में, उसने अपने ‘ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन’ के माध्यम से चुनाव और राजनीतिक न्याय के नाम परकम से कम $140 मिलियन का योगदान दिया।

सोरोस ने 2023 में अपने बेटे एलेक्स को अपनी विरासत सौंप दी थी। इस बीच उसका संगठन लाखों डॉलर खर्च करके टेक्सास जैसे राज्यों में डेमोक्रेट को जिताने के लिए काम कर रहा है। सोरोस लगातार ऐसे मीडिया संस्थान कब्जाता रहा है जो दक्षिणपंथी झुकाव रखते हैं। सोरोस ने पिछले साल के चुनाव से पहले पोलैंड में एक मीडिया कंपनी खरीदी थी और इसने एक दक्षिणपंथी सरकार को गिराने में अहम रोल निभाया था।

कौन हैं जॉर्ज सोरोस?

जॉर्ज सोरोस एक अमेरिकी अरबपति हैं, जो स्टॉक मार्केट में निवेश करके लाभ कमाते हैं। उनका जन्म 1930 में पश्चिमी देश हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में एक यहूदी परिवार में हुआ था। कहा जाता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब यहूदियों पर अत्याचार हो रहा था, तब उन्होंने झूठा पहचान पत्र बनाकर अपना और अपने परिवार की जान बचाई थी।

जब विश्वयुद्ध खत्म हुआ और हंगरी में कम्युनिस्ट सरकार बनी तो वे 1947 में इंग्लैंड की राजधानी लंदन चले गए। वहाँ उन्होंने रेलवे स्टेशन पर कुली और क्लबों में वेटर का भी काम किया। इस दौरान वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाई की। इसके बाद कुछ समय तक उन्होंने लंदन मर्चेंट बैंक में भी काम किया।

साल 1956 में वे लंदन छोड़कर अमेरिका आ गए और फाइनांस एवं इन्वेस्टमेंट में कदम रखा। उसके बाद उनकी किस्मत चमक उठी और रात दूनी दिन चौगुनी तरक्की करने लगे और खूब संपत्ति इकट्ठा की। वित्तीय पत्रिका फोर्ब्स मैगजीन के अनुसार 17 फरवरी 2023 तक उनके पास 6.7 बिलियन डॉलर (लगभग 55,455 करोड़ रुपए) की संपत्ति है।

सन 1973 में उन्होंने सोरोस फंड मैनेजमेंट की स्थापना की और कथित अत्याचार पीड़ितों की मदद करने लगे। इस दौरान उन्होंने ब्लैक लोगों की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप देना शुरू किया। उनका दावा है कि उन्होंने अब 32 अरब डॉलर (2.62 लाख करोड़ रुपए) जरूरतमंदों को दे चुके हैं। सन 1984 में उन्होंने ओपन सोसायटी नामक संस्था की स्थापना की। आज यह संस्था 70 से अधिक देशों में कार्यरत है।

इन सब मानवीय सेवाओं और दानों के पीछे उनका एक विकृत चेहरा भी है। उन्होंने लाभ कमाने के लिए कई संस्थानों और देशों में वित्तीय संकट खड़ा कर दिया। इसके अलावा, उन्होंने कई देशों की सरकारों के खिलाफ प्रोपगेंडा फैलाने और उन्हें गिराने के लिए फंडिंग करने का काम किया। ओपन सोसायटी का इसमें नाम आया है। इस तरह के आरोप उन पर लगते रहे हैं।

अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश को हटाने के लिए अथाह पैसे खर्च किए थे। साल 2003 में उन्होंने कहा था कि जॉर्ज बुश को हटाना उनके लिए जिंदगी और मौत का सवाल है। उन्होंने कहा था कि अगर बुश को सत्ता से हटाने की अगर कोई गारंटी लेता है और वे अपनी पूरी संपत्ति उस पर लुटा देंगे। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ बुश की कार्रवाई का भी खूब विरोध किया था। बुश को हराने के लिए उन्होंने 250 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए थे।

सोरोस को चीन, भारत के नरेंद्र मोदी, ब्लादिमीर पुतिन, अमेरिका पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेता पसंद नहीं हैं। उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को ठग और पीएम मोदी को तानाशाह कहा था। उन्होंने दुनिया में ‘राष्ट्रवाद’ के बयार से लड़ने के लिए लगभग 100 अरब डॉलर की फंड की स्थापना की है। इन फंड का इस्तेमाल इन लोगों के खिलाफ प्रोपगेंडा फैलाने के लिए किया जाता है। दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में उन्होंने कहा था कि दुनिया में राष्ट्रवाद तेजी से बढ़ रहा है। इसका सबसे खतरनाक नतीजा भारत में देखने को मिला है।

सरकारों के खिलाफ प्रोपगेंडा और भारत

राफेल डील में जाँच के लिए फंडिंग: फ्रांस से भारत ने 36 राफेल विमानों को खरीदा था। इसको लेकर विपक्षी दल कॉन्ग्रेस ने हंगामा किया था और कहा था कि इसमें दलाली हुई है। हालाँकि, यहाँ की सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों को खारिज कर दिया था। इसके बाद फ्रांस की एनजीओ शेरपा एसोसिएशन ने इसमें भ्रष्टाचार की शिकायत दर्ज कराकर जाँच की माँग की थी। इस एनजीओ को जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से फंड जारी किया जाता है।

भारत जोड़ो यात्रा और सोरोस: कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा से भी जॉर्ज सोरोस के नाम जोड़ा गया था। 31 अक्टूबर, 2022 को सलिल शेट्टी नाम का एक व्यक्ति राहुल गांधी की कर्नाटक के हरथिकोट में उनकी भारत जोड़ी यात्रा में शामिल हुआ। सलिल शेट्टी जॉर्ज सोरोस द्वारा स्थापित ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन के वैश्विक उपाध्यक्ष हैं। इसके पहले शेट्टी एमनेस्टी इंटरनेशनल से जुड़े थे।

CAA प्रोटेस्ट: सीएए प्रोटेस्ट में भी जॉर्ज सोरोस का नाम जुड़ा है। कहा जाता है कि नागरिकता संशोधन बिल के खिलाफ इतने बड़े पैमाने पर हुए विरोध को हवा देने के लिए जॉर्ज सोरो ने फंडिंग की थी। इसकी पुष्टि उनके बयानों से भी होती है। सोरोस ने भारत में लागू किए जा रहे NRC और CAA को मुस्लिम विरोधी बताया था।

कश्मीर से धारा 370 का खात्मा: इसी तरह कश्मीर से जब केंद्र की मोदी सरकार ने धारा 370 को खत्म कर जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त किया था, तब भी सोरोस सामने आए थे। उन्होंने मोदी सरकार के इस फैसले का विरोध किया था। सोरोस ने कहा था कि भारत हिंदू राष्ट्र बनने की ओर बढ़ रहा है। इसी तरह किसान आंदोलन और भारत द्वारा कोरोना का वैक्सीन बनाने के बाद उसके खिलाफ वैश्विक मुहिम चलाने में भी सोरोस का नाम आ चुका है।

दरअसल, जॉर्ज सोरोस की भूमिका उन हर बातों में लगभग सामने आई, जो केंद्र की भाजपा सरकार और पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ रही। जॉर्ज सोरोस की नरेंद्र मोदी के खिलाफ कितनी नरफत है, इसका वे तानाशाह कहकर सबूत दे चुके हैं और समय-समय पर अन्य आरोपों के जरिए इसकी पुष्टि भई करते रहते हैं। वैसे तो सोरोस की कहानी सैकड़ों पन्नों में भी नहीं खत्म होगी, लेकिन फिलहाल संक्षिप्त में इतना ही।

 

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