उत्तरकाशी के खिरो गार्ड, धराली, हर्षिल, बड़कोट, केदारगांव, स्वलाड़, माटलाड़ी और कर्बारी जैसे गांव 1835 से ही प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहे हैं। एक बार फिर उत्तरकाशी का धराली कस्बा, जो खिरो गार्ड नाले के मार्ग पर बसा है, प्रकृति के प्रकोप का शिकार हो गया। खीरगंगा से आया पानी और मलबे का सैलाब कुछ ही क्षणों में बड़े-बड़े मकानों और होटलों को बहा ले गया। गंगोत्री धाम के रास्ते का यह प्रमुख पड़ाव देखते ही देखते मलबे के ढेर में तब्दील हो गया। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस हादसे में 50 से अधिक लोगों के बहने की आशंका है क्योंकि पानी का बहाव इतना तेज था कि सुरक्षित स्थान पर पहुंचने का मौका ही नहीं मिला। इस भीषण तबाही ने 2013 की केदारनाथ और 2021 की ऋषिगंगा आपदा की यादें ताजा कर दीं।
उत्तरकाशी का इलाका लंबे समय से आपदाओं का केंद्र रहा है। 1835 में खिरो गार्ड में आए फ्लैश फ्लड ने भयंकर तबाही मचाई थी। 6-10 अगस्त 1978 को भागीरथी नदी पर बना कोटिंग ब्रिज बह गया और छह लोगों की मौत हुई। 20 सितंबर 2003 को लैंडस्लाइड ने उत्तरकाशी शहर के बाजार और निजी संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचाया। 13 अगस्त 2010 को गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर भटवाड़ी बाजार की जमीन धंस गई, जिससे लगभग 50 मकान नष्ट हो गए। 3-6 अगस्त 2012 को उसरी गंगा और भागीरथी में आई बाढ़ ने 35 लोगों की जान ले ली और 2,300 से अधिक परिवार प्रभावित हुए। इसके बाद 15-16 जून 2013 को आई आपदा ने 51 लोगों की जान ली और 70 गांव प्रभावित हुए। 18-19 अगस्त 2019 की बाढ़ में मोरी तहसील के कई गांव तबाह हुए और 10 लोगों की मौत हुई। 18 अगस्त 2021 को स्वलाड़, केदारगांव, माटलाड़ी और कर्बारी में लैंडस्लाइड से कई मकान जमींदोज हुए। 12 अगस्त 2023 को गंगोत्री हाईवे के कई हिस्से बह गए और 31 जुलाई 2024 को धराली गांव में भूस्खलन ने 10 लोगों की जान ले ली।
5 अगस्त 2025 को धराली में बादल फटने से आई फ्लैश फ्लड ने बाजार, मकान, दुकानें और होटल ताश के पत्तों की तरह ढहा दिए। लगभग 50 लोगों के बहने और कई के लापता होने की आशंका है। अधिकारियों के अनुसार, खीरगंगा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में बादल फटने से यह बाढ़ आई। बाढ़ का पानी दो दिशाओं में बंटा—एक धारा धराली की ओर और दूसरी सुक्की गांव की ओर गई। राज्य भर में भूस्खलन के कारण सड़कों के अवरुद्ध होने से रेस्क्यू में कठिनाई आई।
उत्तरकाशी में ज्यादातर आपदाएं जुलाई-अगस्त में आती हैं क्योंकि इस समय मॉनसून पूरी तरह सक्रिय होता है। संकरी घाटियों में भारी बारिश, भूस्खलन और तेजी से बढ़ता जलस्तर फ्लैश फ्लड का खतरा बढ़ा देता है। धराली में इस बार बादल फटने के बाद ऊपर के इलाके में जमा मलबा और पानी अचानक नीचे आया। बहते पानी की रफ्तार करीब 15 मीटर/सेकेंड थी और मलबे के दबाव ने लगभग 250 किलोपास्कल का प्रेशर डाला, जिससे रास्ते में आने वाली इमारतें टिक नहीं पाईं और पलक झपकते ही तबाही मच गई।
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