महाराष्ट्र के नागपुर में शनिवार (23 अगस्त 2025) को पारंपरिक धूमधाम के साथ ‘मारबत उत्सव’ मनाया गया। यह उत्सव नागपुर की पहचान बन चुका है और बीते करीब 149 वर्षों से लगातार आयोजित किया जा रहा है। हर साल भाद्रपद महीने में गोकुल अष्टमी के अवसर पर होने वाला यह अनोखा त्योहार बुराइयों और बीमारियों को दूर करने का प्रतीक माना जाता है। इस दिन नागपुर की सड़कों पर हजारों लोग जमा होकर रंग-बिरंगे जुलूस में शामिल होते हैं। ढोल-नगाड़ों की गूंज, गानों की धुन और नृत्य के साथ पूरा शहर मानो बुराइयों के खिलाफ एकजुट होकर संदेश देता है।
#WATCH | Maharashtra: Nagpur witnessed the centuries-old Marbat festival, a unique cultural tradition celebrated every year during the month of Bhadrapada. Known for its vibrant processions and sharp social messages, the festival draws thousands of citizens onto the streets of… pic.twitter.com/RaLTuKWZ4f
— ANI (@ANI) August 23, 2025
मारबत उत्सव की सबसे खास बात यह है कि इसमें पीली मारबत और काली मारबत की झांकियाँ निकाली जाती हैं। काली मारबत को बुराई, महामारी और रोगों का प्रतीक माना जाता है, जबकि पीली मारबत को रक्षा करने वाली शक्ति, देवी और शुभता का रूप समझा जाता है। जुलूस में इन दोनों मारबतों को पूरे शहर में घुमाया जाता है और बाद में इन्हें शहर से बाहर ले जाकर दहन किया जाता है। यह परंपरा इस विश्वास से जुड़ी है कि मारबत के जलने से बुराइयाँ और बीमारियाँ खत्म हो जाती हैं और समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
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इतिहास पर नज़र डालें तो माना जाता है कि काली मारबत की परंपरा 1881 से और पीली मारबत की परंपरा 1885 से शुरू हुई। उस समय नागपुर में बीमारियाँ तेजी से फैल रही थीं, तब लोगों ने इन मारबतों का निर्माण शुरू किया और उनका दहन करके रोगों से मुक्ति की प्रार्थना की। इसी तरह इस उत्सव में ‘बड़ग्या’ नामक पुतलों की परंपरा भी शामिल है। पहले बच्चे इन्हें घर के कचरे और कागज से बनाते थे, लेकिन बाद में यह परंपरा बड़ों ने भी अपनाई। बड़ग्या और मारबत दोनों ही समाज में फैली बुराइयों और नकारात्मकता का प्रतीक माने जाते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस उत्सव की जड़ें भगवान श्रीकृष्ण की कथा से भी जुड़ी हैं। कहा जाता है कि जब पूतना राक्षसी को श्रीकृष्ण ने मार डाला था, तब गोकुलवासी गाँव के कचरे और अपशिष्ट को इकट्ठा कर जुलूस की शक्ल में गाँव से बाहर ले गए और उसे जलाया, ताकि नकारात्मकता का अंत हो सके। इसी घटना को प्रतीकात्मक रूप में हर साल मारबत उत्सव में दोहराया जाता है।
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— ANI (@ANI) August 23, 2025
इतिहास में नागपुर के भोसले राजघराने से भी इस उत्सव का गहरा संबंध है। कहा जाता है कि 1881 में भोसले घराने की महिला रानी बाकाबाई ने अंग्रेजों का साथ दिया था। इसके बाद काली मारबत का जुलूस विद्रोह और विरोध के प्रतीक के रूप में निकालना शुरू किया गया, जो आज भी जारी है। इस प्रकार मारबत उत्सव केवल धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा ही नहीं, बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक संदेश देने वाला पर्व भी है।
आज भी नागपुर के कई कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी मारबत बनाने का कार्य करते हैं और इसे अपनी विरासत मानते हैं। यही वजह है कि 149 वर्षों से यह उत्सव नागपुर की आत्मा और समाजिक चेतना का हिस्सा बन चुका है। यह न केवल बुराइयों और बीमारियों को दूर करने का प्रतीक है, बल्कि समाज को एकजुट कर परंपराओं से जोड़ने वाली सांस्कृतिक धरोहर भी है।
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