महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों के क्षेत्र में महिला मुख्यमंत्री का राज्य आदर्श माना जाना चाहिए, लेकिन पश्चिम बंगाल की स्थिति इसके उलट है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की घटनाएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। हाल ही में एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) की रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि राज्य सरकार महिलाओं की सुरक्षा को गंभीरता से नहीं ले रही।
दुर्गापुर में एमबीबीएस की दूसरी वर्ष की छात्रा के साथ हुए गैंगरेप मामले ने पूरे राज्य को झकझोर दिया है। अब तक अपू बाउरी, फिरदौस शेख और शेख रिजाउद्दीन समेत पाँच आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है। पीड़िता के पिता ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि पश्चिम बंगाल में उनकी बेटी सुरक्षित नहीं है और वे अब राज्य छोड़कर ओडिशा में उसकी आगे की पढ़ाई करवाएँगे। उनका यह बयान पश्चिम बंगाल के मौजूदा हालात पर एक गंभीर सवाल उठाता है। उन्होंने कहा कि “बंगाल में औरंगजेब का शासन” है — यह विश्वास टूटने की गवाही देता है।
#WATCH | Paschim Bardhaman, West Bengal | Father of the Durgapur alleged gangrape victim, says, "… She is unable to walk and is on bedrest. The Chief Minister, DG, SP, and Collector are all helping us a lot and regularly enquiring about her health… I have requested the Chief… pic.twitter.com/W4u54SMnwl
— ANI (@ANI) October 12, 2025
इससे पहले कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में भी एक एमबीबीएस छात्रा के साथ क्रूर तरीके से बलात्कार और हत्या का मामला सामने आया था। इन घटनाओं पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया ने स्थिति को और भी चिंताजनक बना दिया। उन्होंने पीड़िताओं की सुरक्षा के सवालों से ध्यान हटाते हुए पीड़िता पर ही दोष मढ़ दिया। बनर्जी ने कहा था कि “रात 12.30 बजे छात्रा को कॉलेज परिसर से बाहर क्यों जाने दिया गया?” — यह बयान उनकी असंवेदनशीलता को उजागर करता है। यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी ने इस तरह की टिप्पणियाँ की हों।
2012 के कुख्यात पार्क स्ट्रीट गैंगरेप केस में भी उन्होंने घटना को “शजानो घटोना” यानी मनगढ़ंत बताया था। तब टीएमसी के कई नेताओं, जिनमें सांसद काकोली घोष दस्तीदार भी शामिल थीं, ने पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठाए थे। बाद में अदालत ने तीन आरोपितों को दोषी करार दिया, जिससे साबित हुआ कि घटना वास्तविक थी। 2013 में विधानसभा में बलात्कार के बढ़ते मामलों पर चर्चा के दौरान ममता बनर्जी ने अपराधों की वजह “राज्य की जनसंख्या वृद्धि और आधुनिकीकरण” को ठहराया था।

2024 के संदेशखली दंगों में भी महिलाओं के साथ हुए यौन शोषण को उन्होंने “मामूली घटना” कहकर टाल दिया था। यह रवैया दर्शाता है कि मुख्यमंत्री के लिए महिलाओं के खिलाफ अपराध कोई प्राथमिक मुद्दा नहीं है।
एनसीआरबी के नवीनतम आँकड़े इस स्थिति की पुष्टि करते हैं। 2023 में पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 34,691 मामले दर्ज हुए — यह संख्या देश में सबसे अधिक में से एक है। राज्य का क्राइम रेट प्रति लाख महिलाओं पर 71.3 है, जो राष्ट्रीय औसत 65.3 से काफी ज्यादा है। 2023 में राज्य में दर्ज 57 एसिड अटैक के मामलों ने भी पश्चिम बंगाल को इस श्रेणी में देश में शीर्ष पर ला खड़ा किया है।

राज्य में 2023 में 1,110 बलात्कार के मामले दर्ज हुए, जिनमें से अधिकांश में आरोपी पीड़िता के परिचित थे। वहीं, 2,721 मामले पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज किए गए, जो बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की भयावहता को दर्शाते हैं। पति या ससुरालवालों द्वारा क्रूरता (IPC 498A) के तहत दर्ज मामलों में भी पश्चिम बंगाल दूसरे स्थान पर रहा।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में सजा की दर मात्र 3.7% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 21.3% है। लगभग 4 लाख मामले लंबित हैं और न्याय प्रक्रिया बेहद धीमी है।

इसके बावजूद पश्चिम बंगाल सरकार कोलकाता को “महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित शहर” बताकर अपनी पीठ थपथपा रही है। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष अर्चना मजूमदार ने राज्य सरकार पर आँकड़ों की गलत व्याख्या करने का आरोप लगाया है और कहा है कि पुलिस प्रशासन महिलाओं के मामलों पर कार्रवाई करने में विफल हो रहा है।

आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना के बाद दुर्गापुर और बीरभूम जैसे इलाकों में लगातार नए मामले सामने आना यह दर्शाता है कि राज्य में महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। फिर भी टीएमसी सरकार जवाबदेही से बचने के लिए इन्हें “मामूली घटनाएँ” बताने की कोशिश करती है।
Every time an unfortunate incident makes headlines, @BJP4India is first in line, not to act, but to politicise, lecture, and spin it into slogans. Yet their own Home Ministry’s NCRB 2023 report has exposed their favourite fiction: women’s safety under @narendramodi.
— All India Trinamool Congress (@AITCofficial) October 11, 2025
स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में महिलाओं की सुरक्षा अब सिर्फ एक सामाजिक या प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक और नैतिक जिम्मेदारी का सवाल बन गया है। जब एक महिला मुख्यमंत्री भी महिलाओं के दर्द को “गलती” ठहराने लगती हैं, तो यह न केवल संवेदनहीनता बल्कि शासन की असफलता की चरम स्थिति को दर्शाता है।