देशभर में बढ़ती डिजिटल धोखाधड़ी के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने 54,000 करोड़ रुपये से अधिक की डिजिटल ठगी को ‘लूट या डकैती’ करार देते हुए केंद्र सरकार को चार महीने के भीतर इससे निपटने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि डिजिटल फ्रॉड की बढ़ती घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं और इनके खिलाफ मजबूत तंत्र बनाना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि केंद्र सरकार भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), बैंकों, दूरसंचार विभाग (DoT) और अन्य संबंधित एजेंसियों के साथ परामर्श कर एक प्रभावी SOP तैयार करे। अदालत ने कहा कि बैंकों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसा सिस्टम विकसित करें, जिससे बड़े और संदिग्ध लेन-देन पर ग्राहकों को तुरंत अलर्ट भेजा जा सके।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने डिजिटल धोखाधड़ी के पीड़ितों से जुड़े मामलों पर स्वत: संज्ञान लिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि कई मामलों में बैंक अधिकारियों की लापरवाही या संभावित मिलीभगत से अपराधियों को फायदा मिल सकता है।
मामले में अदालत के मददगार वरिष्ठ वकील एनएस नप्पिनाई ने सुझाव दिया कि बैंकों को संदिग्ध लेनदेन पर तुरंत अलर्ट जारी करने के लिए AI आधारित टूल्स का इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल RBI सर्कुलर पर्याप्त नहीं हैं, जब तक सख्त दंडात्मक प्रावधानों के जरिए अनुपालन सुनिश्चित न किया जाए।
मुख्य न्यायाधीश ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी पेंशनभोगी के खाते से अचानक लाखों रुपये का ट्रांजेक्शन होता है, तो बैंक सिस्टम को इसे संदिग्ध मानकर अलर्ट करना चाहिए।
अदालत ने कहा कि बैंक मुनाफे की दौड़ में यह न भूलें कि वे जनता के धन के ट्रस्टी हैं। लोगों का पैसा सुरक्षित रखना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि कई बार बैंक अनजाने या जानबूझकर अपराध की रकम के तेजी से ट्रांसफर का माध्यम बन जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब तक डिजिटल धोखाधड़ी के जरिए 54,000 करोड़ रुपये से अधिक की रकम हड़पी जा चुकी है, जो कई राज्यों के वार्षिक बजट से भी ज्यादा है।
अदालत ने CBI को डिजिटल धोखाधड़ी के मामलों की पहचान करने के निर्देश दिए हैं और गुजरात तथा दिल्ली सरकार से जांच के लिए मंजूरी देने को कहा है। साथ ही, RBI, DoT और अन्य एजेंसियों को पीड़ितों के मुआवजे के लिए एक फ्रेमवर्क तैयार करने का निर्देश दिया गया है। कोर्ट ने कहा कि मुआवजा देने में व्यावहारिक और उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद तय करते हुए उससे पहले स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है।
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