Supreme Court of India में मुस्लिम महिलाओं को संपत्ति में पुरुषों के बराबर हिस्सेदारी देने की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि देश की सभी महिलाओं को समान अधिकार देने का एक तरीका Uniform Civil Code लागू करना भी हो सकता है।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मुद्दा नीतिगत और विधायी क्षेत्र से जुड़ा है, जिस पर अंतिम फैसला संसद और सरकार को करना होता है।
मुस्लिम महिलाओं को बराबर हिस्सेदारी की मांग
याचिका में मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के बराबर संपत्ति में हिस्सेदारी देने की मांग की गई है। इसमें Muslim Personal Law के उन प्रावधानों को चुनौती दी गई है, जिनमें महिलाओं को पुरुषों के बराबर विरासत अधिकार नहीं मिलते।
इस मामले की सुनवाई Surya Kant, Joymalya Bagchi और R. Mahadevan की बेंच कर रही है।
कोर्ट ने उठाया कानूनी शून्य का सवाल
सुनवाई के दौरान बेंच ने याचिकाकर्ता के वकील Prashant Bhushan से पूछा कि क्या अदालत पर्सनल लॉ की संवैधानिक वैधता की जांच कर सकती है।
जस्टिस बागची ने एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पर्सनल लॉ को संविधान की कसौटी पर परखने का सवाल जटिल है।
बेंच ने यह भी पूछा कि यदि अदालत शरीयत के उत्तराधिकार नियमों को रद्द कर देती है तो क्या इससे कानूनी शून्य पैदा नहीं होगा, क्योंकि मुस्लिम उत्तराधिकार को नियंत्रित करने वाला कोई अलग वैधानिक कानून मौजूद नहीं है।
जल्दबाज़ी में सुधार से नुकसान का खतरा
मुख्य न्यायाधीश ने चिंता जताते हुए कहा कि सुधार की जल्दबाजी में ऐसा न हो कि मुस्लिम महिलाओं को मौजूदा अधिकारों से भी वंचित होना पड़े।
इस पर प्रशांत भूषण ने दलील दी कि यदि शरीयत के प्रावधान हटाए जाते हैं तो Indian Succession Act 1925 लागू किया जा सकता है और अदालत मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के बराबर विरासत अधिकार देने की घोषणा कर सकती है।
ट्रिपल तलाक फैसले का दिया उदाहरण
भूषण ने अपने तर्क के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के Triple Talaq Verdict 2017 का हवाला दिया, जिसमें तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया गया था।
UCC को बताया एक संभावित समाधान
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सभी महिलाओं को समान अधिकार देने का एक तरीका UCC लागू करना भी हो सकता है।
जस्टिस बागची ने कहा कि डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स के तहत यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करना विधायिका का विषय है और इस पर अंतिम निर्णय संसद को लेना चाहिए।
याचिका में संशोधन की बात
बेंच ने सुझाव दिया कि यदि शरीयत के उत्तराधिकार नियम रद्द किए जाते हैं तो उनकी जगह कौन-सी वैकल्पिक कानूनी व्यवस्था लागू होगी, यह याचिका में स्पष्ट किया जाए।
इस पर सहमति जताते हुए प्रशांत भूषण ने याचिका में संशोधन करने की बात कही, जिसके बाद अदालत ने मामले की सुनवाई स्थगित कर दी।
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