आगामी जनगणना में डीएनटी (Denotified, Nomadic and Semi-Nomadic Tribes) यानी घुमंतू जनजातियों की अलग से गणना की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर Supreme Court of India ने सुनवाई से इनकार कर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant और जस्टिस Justice Joymalya Bagchi की बेंच ने स्पष्ट कहा कि इस तरह का वर्गीकरण एक नीतिगत मामला है, जिसमें अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने इस याचिका को “समाज को विभाजित करने की गहरी साजिश” करार देते हुए कहा कि इसकी जड़ें देश के बाहर तक हो सकती हैं। हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को जनगणना आयुक्त और संबंधित सरकारी अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखने की छूट दी है।
याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील Siddharth Dave ने दलील दी कि याचिका में डीएनटी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग नहीं की गई है, बल्कि सिर्फ उनकी जनगणना में पहचान सुनिश्चित करने की अपील की गई है।
उन्होंने कहा कि चूंकि जनगणना से जुड़ा अधिनियम अभी लागू नहीं है, इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ये समुदाय जनगणना से बाहर न रह जाएं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
घुमंतू और विमुक्त जनजातियों की आखिरी व्यापक गणना 1911 में ब्रिटिश काल के दौरान हुई थी। उस समय इन्हें Criminal Tribes Act 1871 के तहत ‘आपराधिक जनजाति’ घोषित किया गया था, जिसे बाद में 1949 में समाप्त कर दिया गया।
आयोगों की रिपोर्ट
- 2008 में रेनके आयोग ने इनकी संख्या 10-12 करोड़ बताई
- इडेट आयोग के अनुसार, 1200 से अधिक समुदाय इस श्रेणी में आते हैं
- 1965 की लोकर समिति ने इनके लिए विशेष विकास योजनाओं की सिफारिश की
घुमंतू जनजातियों की स्थिति
डीएनटी समुदाय आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर हैं। इन्हें न तो Scheduled Castes, Scheduled Tribes और न ही Other Backward Classes में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है, जिससे इन्हें आरक्षण और सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
इनकी जीवनशैली गतिशील होती है। Banjara और Rabari जैसी जातियाँ लगातार स्थान बदलते हुए जीवन यापन करती हैं, जबकि गद्दी और मालधारी जैसे समुदाय मौसमी प्रवास करते हैं।
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