बंगाल से लगातार हो रही घुसपैठ और उसके कारण हो रहा जनसांख्यिकीय (डेमोग्राफिक) बदलाव देश के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया जा रहा है। यह सिर्फ पश्चिम बंगाल की राजनीति तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि इससे देश की सुरक्षा, संप्रभुता और सामाजिक ताने-बाने पर असर पड़ने की बात कही जा रही है। बीजेपी नेताओं का दावा है कि इस स्थिति से बंगाल की संस्कृति और पहचान पर सीधा खतरा पैदा हो गया है।
बीजेपी नेता बीएल संतोष ने बंगाल चुनाव को केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि “एक सभ्यता को बचाने की लड़ाई” करार दिया है। उनका कहना है कि भारत को सुरक्षित रखना है तो बंगाल को बचाना जरूरी है। उनके मुताबिक बंगाल में डेमोग्राफी बदलावों को रोकना और हर हाल में सरकार बनाना, देश के भविष्य के लिए अहम है। वे इस पूरे मुद्दे को सियासी संघर्ष से आगे बढ़कर सांस्कृतिक और सभ्यतागत संकट के रूप में देखते हैं।
आरोप है कि पश्चिम बंगाल में लगातार हिंदुओं का पलायन हो रहा है। हिंदू त्योहारों और धार्मिक आयोजनों पर बार-बार विवाद सामने आए हैं। दुर्गापूजा विसर्जन और मुहर्रम के जुलूस एक साथ पड़ने पर विसर्जन की तारीख बदले जाने, राम नवमी जुलूस पर रोक या हिंसा, और होली-दिवाली जैसे पर्वों के दौरान तनाव के उदाहरण गिनाए जाते हैं। मार्च 2025 में शांतिनिकेतन के सोनाझुरी हाट में पर्यावरण संरक्षण का हवाला देकर बसंत उत्सव के दौरान होली समारोह पर लगाए गए प्रतिबंध को भी इसी संदर्भ में देखा गया।
“बंगाल हमारे लिए केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति को बचाने की लड़ाई है।
एक बड़े जनसांख्यिकीय बदलाव से बचाने के लिए पश्चिम बंगाल को जीतना आवश्यक है—और हम इसे अवश्य ही जीतेंगे।”
— श्री बी. एल. संतोष जी
आदरणीय राष्ट्रीय संगठन महामंत्री, भारतीय जनता पार्टी pic.twitter.com/2XVriIMOHC
— BJP Bihar (@BJP4Bihar) December 29, 2025
जनगणना के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा जाता है कि 2011 में पूरे देश में हिंदू आबादी लगभग 0.7 प्रतिशत घटी, जबकि पश्चिम बंगाल में यह गिरावट 1.94 प्रतिशत रही। वहीं राज्य में मुस्लिम आबादी में करीब 0.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। बीजेपी नेताओं का तर्क है कि ये आंकड़े यह संकेत देते हैं कि बंगाल में जनसांख्यिकीय संतुलन तेज़ी से बदल रहा है, और इसके पीछे अवैध घुसपैठ एक बड़ा कारण है।
दावा किया जाता है कि घुसपैठिए बंगाल के सीमावर्ती गांवों में बस जाते हैं, धीरे-धीरे पहचान पत्र हासिल कर लेते हैं और फिर वोटर बन जाते हैं। आंकड़ों के अनुसार 2001 में राज्य में मुस्लिम आबादी करीब 25 प्रतिशत थी, जो 2011 में बढ़कर 27 प्रतिशत से अधिक हो गई। लगभग 9.5 करोड़ की आबादी वाले बंगाल में करीब 2.5 करोड़ मुस्लिम आबादी बताई जाती है, जिसे बीजेपी घुसपैठ के प्रभाव के रूप में पेश करती है।
बताया जाता है कि मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना जैसे बांग्लादेश से सटे जिलों में मुस्लिम आबादी का अनुपात काफी अधिक है। मुर्शिदाबाद को लेकर पूर्व टीएमसी विधायक हुमायूँ कबीर के बयान का भी जिक्र होता है, जिसमें उन्होंने जिले में मुस्लिम आबादी 70 प्रतिशत के करीब होने की बात कही। बीजेपी के मुताबिक, सीमावर्ती 46 विधानसभा क्षेत्रों में एक दशक के भीतर मतदाताओं की संख्या में 40 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है।
इन डेमोग्राफी बदलावों के कारण सामाजिक तनाव, ध्रुवीकरण और असुरक्षा की भावना बढ़ने का आरोप लगाया जाता है। बीजेपी का कहना है कि हिंदू परिवारों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है और पारंपरिक सांस्कृतिक पहचान कमजोर हो रही है। मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के नाम से जुड़े निर्माण को भी इसी संदर्भ में सामाजिक समरसता के खिलाफ बताया जा रहा है।
घुसपैठ का असर केवल बंगाल तक सीमित नहीं बताया जाता, बल्कि असम, त्रिपुरा और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों पर भी इसके दुष्प्रभाव की बात सामने रखी जाती है। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के बयान का हवाला देते हुए कहा जाता है कि बंगाल-बांग्लादेश सीमा पर सख्त कार्रवाई देश के लिए जरूरी है। उनका कहना है कि जहां असम और त्रिपुरा घुसपैठ के खिलाफ लड़ रहे हैं, वहीं बंगाल पर आंख मूंदने के आरोप लगाए जाते हैं।
बीजेपी का तर्क है कि घुसपैठ का संबंध अवैध कारोबार, हथियारों, नशे और सुरक्षा से जुड़े मामलों से भी जुड़ता है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा होता है। इसी आधार पर बीएल संतोष और अन्य बीजेपी नेता यह निष्कर्ष निकालते हैं कि बंगाल में सत्ता परिवर्तन जरूरी है, ताकि राज्य की संस्कृति, पहचान और देश की सुरक्षा को बचाया जा सके।
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