दिल्ली बीजेपी के वरिष्ठतम नेता विजय कुमार मल्होत्रा का मंगलवार सुबह 94 वर्ष की आयु में एम्स, दिल्ली में निधन हो गया। यह संयोग भी उल्लेखनीय है कि उनके निधन से ठीक एक दिन पहले ही दिल्ली बीजेपी को नया कार्यालय मिला था। मल्होत्रा 1980 में दिल्ली बीजेपी के पहले अध्यक्ष बने थे। उस समय पार्टी का दफ्तर अजमेरी गेट पर सिर्फ दो कमरों में हुआ करता था, जबकि आज बीजेपी के पास तीस हजार वर्ग फीट में फैला पांच मंजिला आधुनिक कार्यालय है। दिल्ली में पार्टी की इस लंबी और सफल यात्रा के सारथी विजय कुमार मल्होत्रा ही रहे।
देश की राजधानी में जनता पार्टी तथा भाजपा दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष रहे वरिष्ठ नेता आदरणीय विजय कुमार मल्होत्रा जी के निधन का समाचार अत्यंत दुखद है।
दिल्ली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और लोकसभा सांसद के रूप में उन्होंने दिल्ली के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। साथ ही, संगठन तथा… pic.twitter.com/8lh7KVdV4W
— Smriti Z Irani (@smritiirani) September 30, 2025
दिल्ली की राजनीति में मल्होत्रा, केदारनाथ साहनी और मदनलाल खुराना की तिकड़ी दशकों तक बीजेपी का चेहरा बनी रही। अविभाजित भारत में लाहौर में जन्मे मल्होत्रा दिल्ली आने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ से जुड़ गए थे। 1947 में पाकिस्तान के हमले के दौरान वे जम्मू कश्मीर में संघ के स्वयंसेवक के रूप में सक्रिय थे। छात्र राजनीति से शुरुआत करते हुए वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संस्थापक सदस्य और सचिव भी रहे। 1951 में जनसंघ की स्थापना पर उन्हें दिल्ली जनसंघ का सचिव बनाया गया।
आज दिल्ली में भारतीय जनसंघ एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा जी की पार्थिव देह के अंतिम दर्शन कर श्रद्धांजलि अर्पित की एवं शोक संतप्त परिजनों से भेंट कर अपने संवेदनाएं व्यक्त की।
संगठन के विस्तार और राष्ट्र व समाज उत्थान के लिए उनका संघर्ष, अतुलनीय योगदान और… pic.twitter.com/yH0pgYad7u
— Jagat Prakash Nadda (@JPNadda) September 30, 2025
सिर्फ 27 वर्ष की उम्र में 1958 में वे दिल्ली महानगर परिषद के सदस्य बन गए और 1967 में मुख्य कार्यकारी पार्षद के पद तक पहुंचे, जो आज के दिल्ली के मुख्यमंत्री के समकक्ष माना जाता है। 1977 में जनता पार्टी के गठन के बाद वे दिल्ली इकाई के अध्यक्ष बने और 1980 में बीजेपी की स्थापना के बाद दिल्ली बीजेपी के पहले अध्यक्ष बने। उनके राजनीतिक कद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे पांच बार सांसद, दो बार विधायक और राज्यसभा सदस्य भी रहे। 1999 में उन्होंने दक्षिण दिल्ली से डॉ. मनमोहन सिंह को हराकर सबको चौंका दिया था।
जीवनपर्यंत जनसेवा में समर्पित रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय कुमार मल्होत्रा जी के निधन से गहरा दुख हुआ है। वे जमीन से जुड़े ऐसे नेता थे, जिन्हें जनता के मुद्दों की गहरी समझ थी। दिल्ली में पार्टी को सशक्त बनाने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। संसद में अपनी सक्रियता और योगदान के लिए… pic.twitter.com/aULfroSFEJ
— Narendra Modi (@narendramodi) September 30, 2025
बीजेपी ने उन्हें 2008 विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। हालांकि पार्टी को सफलता नहीं मिल पाई, लेकिन वे ग्रेटर कैलाश से विधायक बने। बतौर सांसद उन्होंने लोकसभा में भी प्रभाव छोड़ा और पार्टी के डिप्टी लीडर बने। यूपीए सरकार के दौरान उन्होंने दिल्ली से जुड़े मुद्दों को जोरशोर से उठाया और दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग करते रहे।
मल्होत्रा लालकृष्ण आडवाणी के बेहद करीबी थे। दोनों नेता करीब तीन दशक तक पंडारा रोड पर एक ही मकान में रहते थे। दिल्ली बीजेपी को लेकर फैसलों में उन्हें हमेशा खुला हाथ मिला। राजनीतिक जीवन में उन्होंने कई आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की। जम्मू कश्मीर के पूर्ण विलय आंदोलन के दौरान छह महीने जेल में रहे, गोरक्षा आंदोलन में गोली लगी और जेल भी गए। आपातकाल के समय भी वे 19 महीने तक जेल में बंद रहे।
सिर्फ राजनीति ही नहीं, खेल प्रशासन में भी मल्होत्रा ने अपनी छाप छोड़ी। वे भारतीय ओलंपिक संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष रहे, साथ ही लंबे समय तक भारतीय तीरंदाजी संघ के अध्यक्ष भी रहे। 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स में उनकी भूमिका अहम रही।
अकादमिक रूप से भी मल्होत्रा बेहद प्रतिभाशाली थे। मात्र 18 साल की उम्र में वे ग्रैजुएट हो गए थे और दो बार प्रमोट भी किए गए। उन्होंने हिन्दी में एमए और साहित्य में पीएचडी की। उनकी थीसिस हिन्दी के प्रख्यात कवि सोहनलाल द्विवेदी पर आधारित थी। वे दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज में 35 वर्षों तक हिन्दी के प्रोफेसर रहे। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं और धार्मिक ग्रंथों जैसे भगवद्गीता, बाइबिल, कुरान और गुरु ग्रंथ साहिब का गहन अध्ययन किया।
विजय कुमार मल्होत्रा चमत्कारों में विश्वास नहीं करते थे। वे मानते थे कि सफलता के कोई शॉर्टकट नहीं होते। उनकी जीवन यात्रा और उपलब्धियां इस विचार का जीवंत प्रमाण हैं कि निरंतर प्रयास ही सच्चे चमत्कार होते हैं।
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