राज्य में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार पर शिक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। साल 2011 में सत्ता में आने के बाद सरकार ने वर्ल्ड क्लास यूनिवर्सिटी बनाने का वादा किया था, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आ रही है।
वर्ल्ड क्लास यूनिवर्सिटी का अधूरा सपना
2011 में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि बंगाल में शिकागो और हार्वर्ड जैसी यूनिवर्सिटी बनाई जाएंगी, ताकि छात्रों को बाहर न जाना पड़े। इसके तहत 16 नई यूनिवर्सिटी बनाने का ऐलान किया गया था।
हालांकि, 2017-18 में 11 यूनिवर्सिटी स्थापित की गईं, लेकिन इनमें पढ़ाई की शुरुआत 2021 के विधानसभा चुनावों के आसपास ही हो पाई।
15 साल बाद भी अधूरी व्यवस्था
2026 में दार्जिलिंग हिल यूनिवर्सिटी को छोड़कर बाकी संस्थानों को वैधानिक मान्यता मिली। यानी वादे के करीब 15 साल बाद भी शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह व्यवस्थित नहीं हो सकी।
जमीनी हकीकत: अस्थायी कैंपस और गेस्ट लेक्चरर
रिपोर्ट्स के मुताबिक:
- 11 में से 7 यूनिवर्सिटी अभी भी अस्थायी परिसरों से चल रही हैं
- स्थायी शिक्षकों की कमी
- UGC के मानकों के अनुसार गेस्ट लेक्चरर पर निर्भरता
- कई जगह छात्रों की संख्या में गिरावट
भर्ती घोटाले और प्रशासनिक विवाद
राज्य में शिक्षा व्यवस्था पहले से ही शिक्षक भर्ती घोटाले को लेकर विवादों में रही है। इसके अलावा, 2023-24 में मुख्यमंत्री और राज्यपाल सीवी आनंद बोस के बीच विवाद के कारण कुलपति नियुक्तियाँ भी अटकी रहीं।
बाद में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद 2024 में नियुक्तियों को वैधानिक दर्जा दिया गया।
बजट में शिक्षा को कम प्राथमिकता
2025-26 के बजट में शिक्षा क्षेत्र को अपेक्षाकृत कम आवंटन मिलने से भी सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठ रहे हैं।
छात्रों का पलायन जारी
इन परिस्थितियों के चलते पश्चिम बंगाल के कई छात्र बेहतर शिक्षा के लिए दूसरे राज्यों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर और दबाव बढ़ रहा है।
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