संगीतकार ए.आर. रहमान के परिवार को लेकर तमिल गीतकार पिरईसूदन (Piraisoodan) द्वारा किया गया खुलासा चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने बताया कि रहमान के परिवार की सोच हिंदू प्रतीकों और धार्मिक परंपराओं के प्रति असहिष्णुता दर्शाती है। गीतकार पिरईसूदन के अनुसार, एक सरकारी कार्यक्रम में ए.आर. रहमान से मुलाकात के दौरान पुराने दिनों की याद ताजा हुई, जब वे साथ में काम करते थे। उस मुलाकात के दौरान रहमान ने पिरईसूदन को अपने घर आमंत्रित किया और कहा कि वे उनके घर आकर गाना लिखें।
लेकिन जब पिरईसूदन रहमान के घर पहुँचे, तो रहमान की माँ करीमा बेगम (पूर्व नाम कस्तूरी शेखर) ने उनसे घर में विभूति और कुमकुम तिलक न लगाकर आने को कहा। इस बात से पिरईसूदन को गहरा धक्का लगा क्योंकि दक्षिण भारत में विभूति और कुमकुम हिंदू परंपरा का अहम हिस्सा हैं और माथे पर इन्हें लगाना आस्था की अभिव्यक्ति मानी जाती है। पिरईसूदन ने साफ तौर पर इन धार्मिक चिह्नों को हटाने से इनकार कर दिया और घर में प्रवेश नहीं किया।
Shocking Revelation of AR Rehman
AR Rehman's Mother asked Lyricist Writer Piraisoodan not to Apply Vibhuti & Kunkumam While Visiting their House
They Left Hindu Fold & Converted
Still Hindu in TN Loved him Irrespective of his Ideology But,This is How Hindus Humiliated & Shamed pic.twitter.com/7O9EsaX9pW
— Shobhana Ganesan 🇮🇳 (@GShobna) July 28, 2020
इस घटना ने रहमान के धर्म परिवर्तन और परिवार की धार्मिक विचारधारा को लेकर फिर से बहस छेड़ दी है। गौरतलब है कि ए.आर. रहमान का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था, लेकिन बाद में उन्होंने इस्लाम कबूल किया। बताया जाता है कि जब रहमान की बहन गंभीर रूप से बीमार थीं, तब एक सूफी संत ने उनकी जान बचाने के नाम पर इस्लाम अपनाने की शर्त रखी थी। इसके बाद दिलीप कुमार से वे ए.आर. रहमान बन गए और उनकी माँ ने भी धर्म परिवर्तन कर लिया।
रहमान पहले भी कई बार विवादों में आ चुके हैं। एक बार उन्होंने कहा था कि उनके पिता की मृत्यु के लिए वही देवी-देवता ज़िम्मेदार हैं जिन्हें वे पूजा करते थे। वहीं उनकी बेटी खतीजा रहमान ने भी बुर्के के समर्थन में बयान देकर कहा था कि बुर्का पहनना सशक्तिकरण का प्रतीक है। साथ ही, रहमान ने बॉलीवुड में नेपोटिज्म और गैंगबाज़ी का आरोप भी लगाया था, जिसमें उन्होंने कहा कि एक खास ‘गैंग’ उन्हें अंधेरे या ‘डार्क’ फिल्मों तक सीमित रखना चाहता है, ताकि उन्हें मुख्यधारा की अच्छी फिल्में न मिलें।
यह पूरा प्रकरण केवल व्यक्तिगत आस्था का मामला नहीं बल्कि सांस्कृतिक असहिष्णुता की बड़ी बहस को जन्म देता है, जिसमें धर्म, कला, और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन की चुनौती भी झलकती है।
हमारी यूट्यूब चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करे
Like, Share and Subscribe our YouTube channel