हर साल भारत सरकार एक अहम दस्तावेज़ जारी करती है, जिसे इकोनॉमिक सर्वे कहा जाता है। यह रिपोर्ट केवल अर्थव्यवस्था, टैक्स या GDP तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसमें देश के नागरिकों की सेहत, जीवनशैली और भविष्य की चुनौतियों पर भी विस्तार से चर्चा की जाती है। इस बार जारी इकोनॉमिक सर्वे 2025–26 के हेल्थ सेक्शन में ऐसी स्वास्थ्य समस्याओं को उजागर किया गया है, जो आज लगभग हर घर में देखने को मिल रही हैं। इनमें मोटापा, अस्वस्थ खानपान और मोबाइल व स्क्रीन पर बढ़ती निर्भरता जैसी चिंताएँ प्रमुख हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, ये समस्याएँ अब केवल लाइफस्टाइल तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि डायबिटीज, हृदय रोग और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों की बड़ी वजह बनती जा रही हैं। इकोनॉमिक सर्वे 2025–26 यह भी बताता है कि भारत इस समय दोहरी स्वास्थ्य चुनौती से गुजर रहा है। एक ओर जहां मातृ और शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, वहीं दूसरी ओर लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियाँ तेज़ी से बढ़ रही हैं।
सरकार ने खास तौर पर कुछ मुद्दों पर गंभीर चिंता जताई है, जिनमें बढ़ता मोटापा और ओवरवेट, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता सेवन, बच्चों और युवाओं में डिजिटल एडिक्शन, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ शामिल हैं। सर्वे के अनुसार, भारत में करीब 24 प्रतिशत महिलाएँ और 23 प्रतिशत पुरुष अधिक वजन या मोटापे की श्रेणी में आ चुके हैं। यह समस्या अब सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे शहरों और कस्बों में भी तेज़ी से फैल रही है। बढ़ता वजन आगे चलकर डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ा देता है।
इकोनॉमिक सर्वे में यह भी बताया गया है कि लोग अब पहले की तुलना में ज़्यादा पैकेट बंद, रेडी-टू-ईट और जंक फूड का सेवन कर रहे हैं, जिन्हें अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड कहा जाता है। इस तरह के खाने में नमक, चीनी और फैट की मात्रा बहुत अधिक होती है, जबकि पोषण बेहद कम होता है। साथ ही, इनमें मौजूद एडिटिव्स के कारण इनकी लत लगने का खतरा भी रहता है। सरकार का मानना है कि घर के बने भोजन की जगह इन खाद्य पदार्थों के बढ़ते इस्तेमाल से हृदय रोग और डायबिटीज जैसी बीमारियाँ तेज़ी से बढ़ रही हैं।
डिजिटल लाइफस्टाइल को भी इकोनॉमिक सर्वे ने एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बताया है। बच्चों और युवाओं में मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग की बढ़ती आदतें साफ तौर पर देखी जा रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अधिक स्क्रीन टाइम से नींद की समस्या बढ़ रही है, पढ़ाई और एकाग्रता पर नकारात्मक असर पड़ रहा है और एंजाइटी व डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्याएँ भी बढ़ रही हैं। इसी को देखते हुए सरकार ने Tele-MANAS जैसी मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन और डिजिटल एडिक्शन से जुड़े कई कार्यक्रम शुरू किए हैं।
सर्वे में यह भी रेखांकित किया गया है कि भारत ने हाल के वर्षों में मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर को काफी हद तक कम किया है। इसके साथ ही e-Sanjeevani और आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन जैसी योजनाओं के जरिए स्वास्थ्य सेवाएँ लोगों तक पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ी से पहुँच रही हैं।
कुल मिलाकर, इकोनॉमिक सर्वे 2025–26 यह साफ संकेत देता है कि ये स्वास्थ्य समस्याएँ न सिर्फ लोगों की सेहत के लिए गंभीर हैं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी इनका सीधा असर पड़ता है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर समय रहते जीवनशैली और खानपान की आदतों में बदलाव नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियाँ भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती हैं।
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