बिहार SIR (सर्टिफाइड इलेक्टर्स रजिस्टर) मामले पर आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन और प्रशांत भूषण ने पक्ष रखा। याचिकाकर्ताओं की चिंता यह थी कि बिहार की नई मतदाता सूची (ड्राफ्ट लिस्ट) से करीब 65 लाख लोगों के नाम हटा दिए गए हैं, जिनमें कई जीवित और वैध मतदाता भी शामिल हो सकते हैं।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि यह पाया गया कि मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर वैध नाम हटाए गए हैं, तो वह तत्काल हस्तक्षेप करेगा। अदालत ने कहा, “15 ऐसे लोगों को पेश करो, जो साबित करें कि वे जीवित हैं और फिर भी उनका नाम सूची से गायब है।” कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि राजनीतिक दलों को इस मामले में सामाजिक संगठनों की तरह सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
वहीं, चुनाव आयोग की ओर से दलील दी गई कि ड्राफ्ट मतदाता सूची का प्रचार पहले ही किया जा चुका है, और नागरिकों को 30 दिनों का समय दिया गया है कि वे आपत्ति दर्ज करा सकें और अपने नाम पुनः जुड़वा सकें। आयोग ने दावा किया कि जिन 65 लाख लोगों के नाम हटा दिए गए हैं, वे या तो मृतक हैं या स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके हैं।
वरिष्ठ वकील सिब्बल और भूषण ने तर्क दिया कि जो लोग ड्राफ्ट सूची में नहीं हैं, उन्हें पता ही नहीं चल पाएगा कि उनका नाम हटा दिया गया है, और ऐसे में उन्हें दोबारा आवेदन करने का अवसर भी नहीं मिलेगा। उन्होंने यह भी पूछा कि चुनाव आयोग ने उन 65 लाख लोगों की सूची सार्वजनिक क्यों नहीं की।
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, और उसकी कार्यप्रणाली पर भरोसा किया जाना चाहिए, लेकिन कोर्ट इस पूरे मामले की न्यायिक समीक्षा जरूर करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर सूची में गड़बड़ी पाई जाती है, तो कोर्ट हस्तक्षेप करने को तैयार है।
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को 3 घंटे बहस का समय देने की बात कही, और संकेत दिए कि वह जनवरी 2025 की सूची को ही आधार मानेगा, यदि नई सूची में अनियमितताएं सिद्ध नहीं होतीं। मामले में अगली सुनवाई और बहस के लिए दिन तय किया जाएगा।
यह मामला आगामी बिहार विधानसभा चुनाव और लोकतांत्रिक अधिकारों की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील बन गया है, और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में इसकी निष्पक्षता सुनिश्चित की जा रही है।
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