प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार की समावेशी विकास नीतियों और आंतरिक सुरक्षा के बहुआयामी दृष्टिकोण ने भारत में वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद), विशेषकर अर्बन नक्सल नेटवर्क को निर्णायक रूप से कमजोर किया है। एक समय था जब छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना और पूर्वोत्तर राज्य वामपंथी हिंसा से पीड़ित थे, लेकिन अब इन क्षेत्रों में हालात तेजी से बदले हैं।
सरकार की रणनीति तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित रही है—सुरक्षा, समावेशी विकास और सामुदायिक भागीदारी। एनआईए के अनुसार शहरी नक्सली—जो अक्सर मानवाधिकार कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और छात्र संगठनों के रूप में सामने आते हैं—कई विश्वविद्यालयों और संस्थानों में युवाओं को कट्टरपंथी बनाकर माओवादी विचारधारा का प्रचार करते थे। लेकिन हाल के वर्षों में केंद्र सरकार की कठोर कार्रवाई, जमीनी स्तर पर रोजगार व शिक्षा के अवसर और सूचना अभियानों ने इन गतिविधियों को काफी हद तक नियंत्रित किया है।
2010 में जहां वामपंथी हिंसा के 1,936 मामले थे, वहीं 2024 तक यह संख्या घटकर केवल 374 रह गई है, यानी 81% की गिरावट। इसी दौरान मौतों की संख्या भी 85% कम हुई है।
पूर्वोत्तर में उग्रवाद पर नियंत्रण और शांति बहाली भी एक बड़ी सफलता रही है। पिछले 11 वर्षों में 12 शांति समझौते हुए और 10,000 से अधिक उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया। बोडो, ब्रू-रियांग, एनएलएफटी, एटीटीएफ जैसे समझौतों ने दशकों की हिंसा को समाप्त किया। इसका परिणाम यह रहा कि पूरे पूर्वोत्तर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (AFSPA) को सीमित कर दिया गया।
‘लुक ईस्ट’ से ‘एक्ट ईस्ट’ नीति में बदलाव ने न सिर्फ पूर्वोत्तर को एक रणनीतिक व्यापारिक प्रवेश द्वार में बदला, बल्कि सांस्कृतिक जागरूकता और स्थानीय कृषि उत्पादों जैसे मुगा सिल्क, जोहा चावल, काजी नेमू आदि को वैश्विक पहचान दिलाई। नतीजतन, पर्यटन, कृषि, और व्यापार में भी उछाल देखा गया।
‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ जैसे प्रयासों ने वामपंथी प्रभाव वाले क्षेत्रों में व्यक्तिगत सुविधाओं की पहुंच बढ़ाई है, जिससे 1.5 करोड़ से अधिक लोग लाभान्वित हो रहे हैं। इसके साथ ही 612 किलेबंद थाने, 302 सुरक्षा कैंप और 68 हेलीपैडों का निर्माण सुरक्षा ढांचे को मजबूत करता है।
केंद्र सरकार ने वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति अपनाई है, जिसका मकसद है न केवल हिंसा पर काबू पाना बल्कि उन क्षेत्रों को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से जोड़ना जिन्हें अब तक उपेक्षित रखा गया था। इसके तहत स्किल डेवलेपमेंट, एफपीओ गठन, ITI और Eklavya मॉडल स्कूलों की स्थापना से युवाओं को हिंसा के रास्ते से हटाकर निर्माण की ओर प्रेरित किया गया।