दक्षिणी इज़राइल के नेवातिम में हाल ही में नवानगर (अब जामनगर) के पूर्व महाराजा जामसाहेब दिग्विजय सिंह जडेजा की प्रतिमा का अनावरण किया गया। यह प्रतिमा उस करुणा और मानवता की प्रतीक है, जब जामसाहेब ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड के सैकड़ों बच्चों—जिनमें कई यहूदी बच्चे भी शामिल थे—को भारत में शरण और सुरक्षा दी थी।
प्रतिमा के नीचे अंकित है –
“होलोकॉस्ट के दौरान, उन्होंने अपने खर्च पर कई यहूदी बच्चों को बचाया और उन्हें अपने घर में आश्रय दिया तथा उन्हें देखभाल और प्यार प्रदान किया।”
कार्यक्रम में यहूदी धर्मग्रंथ से यह वाक्य भी पढ़ा गया—
“जो एक जीवन बचाता है, वह पूरी दुनिया को बचाता है।”
यह आयोजन भारतीय यहूदी विरासत केंद्र (IJHC) और कोच्चि यहूदी विरासत केंद्र (CJHC) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। यह प्रतिमा सितंबर 2024 में तैयार हो चुकी थी, लेकिन हमास के साथ जारी युद्ध के कारण इसका अनावरण कई बार टल गया।
A moving tribute at Moshav Nevatim 🇮🇳🤝🇮🇱
The statue of Maharaja Jam Saheb of Nawanagar (Gujarat) was unveiled in Nevatim honouring his exemplary compassion during World War-II. He adopted hundreds of Polish children including Jewish children and built a home for them in 1942… pic.twitter.com/MLKg9satnk
— India in Israel (@indemtel) November 11, 2025
जाम साहब दिग्विजय सिंह जडेजा कौन थे
महाराजा दिग्विजय सिंह रणजीत सिंह जडेजा नवानगर (अब जामनगर) के अंतिम शासक थे। उन्हें जनता स्नेहपूर्वक “बापूसाहेब” कहती थी—यह कोई औपचारिक उपाधि नहीं थी, बल्कि उनके प्रति लोगों के प्रेम और विश्वास का प्रतीक थी। उनका जीवन मंत्र था—“मेरी प्रजा का कल्याण मेरे साथ हो।”
उन्होंने न केवल अपने राज्य के लोगों का ध्यान रखा, बल्कि हजारों किलोमीटर दूर पोलैंड के बच्चों की भी मदद की। द्वितीय विश्व युद्ध के समय उन्होंने इन शरणार्थी बच्चों को भारत में सुरक्षित स्थान दिया और मानवता की मिसाल कायम की। आज भी पोलैंड और इज़राइल दोनों देश उन्हें गहरी श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ याद करते हैं।
जाम साहब का जन्म 1895 में हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा राजकुमार कॉलेज और यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन से प्राप्त की। 1919 में वे ब्रिटिश सेना में सेकंड लेफ्टिनेंट बने और लगभग 20 वर्षों की सेवा के बाद 1931 में सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद भी वे 1947 तक भारतीय सेना में मानद पद पर जुड़े रहे। 1933 में अपने चाचा रणजीत सिंह जडेजा के निधन के बाद वे नवानगर के महाराजा बने और 1966 में अपने निधन तक शासन किया।
भारत की स्वतंत्रता के बाद 1947 में उन्होंने अन्य राजाओं के साथ अपने राज्य का भारत में विलय कर दिया। उनके पुत्र शत्रुशल्य सिंह जडेजा वर्तमान में जामनगर के राजपरिवार का प्रतिनिधित्व करते हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध और पोलिश बच्चों को आश्रय
1939 में जब सोवियत संघ और जर्मनी ने मिलकर पोलैंड पर आक्रमण किया, तो वहां की सरकार गिर गई और लाखों नागरिक—महिलाएँ, बच्चे और अनाथ—सोवियत शिविरों में पहुँचा दिए गए। वहाँ वे भूख, बीमारी और कठिनाइयों से जूझते रहे।
1941 में सोवियत सरकार ने उन्हें रिहा किया, जिसके बाद हजारों पोलिश नागरिक दुनिया के विभिन्न हिस्सों में शरण लेने लगे। उसी दौरान महाराजा दिग्विजय सिंह जडेजा ब्रिटिश युद्ध मंत्रिमंडल में हिंदू प्रतिनिधि के रूप में कार्यरत थे। जब उन्हें इन बच्चों की हालत का पता चला, तो उन्होंने बिना देर किए भारत में उनके लिए शरण देने का निर्णय लिया।
“अब तुम अनाथ नहीं हो, मैं तुम्हारा पिता हूँ”
1942 में पोलिश बच्चों का पहला समूह नवानगर पहुँचा। महाराजा दिग्विजय सिंह स्वयं उनका स्वागत करने आए और भावुक शब्दों में कहा—
“भले ही तुमने अपने माता-पिता को खो दिया हो, लेकिन आज से मैं तुम्हारा पिता हूँ, और नवानगर अब तुम्हारा घर है।”
उन्होंने बच्चों के रहने, खाने और पढ़ाई की पूरी व्यवस्था की। बालाचडी के पास उनके लिए विशेष शिविर बनाया गया, जहाँ सुरक्षित माहौल, चिकित्सा सुविधा और शिक्षा की व्यवस्था थी। पोलिश भाषा की किताबों से युक्त पुस्तकालय भी बनाया गया ताकि बच्चे अपनी मातृभाषा से जुड़े रहें।
जाम साहब स्वयं हर व्यवस्था पर नजर रखते थे। जब बच्चों ने बताया कि भारतीय खाना बहुत मसालेदार है, तो उन्होंने सात पोलिश रसोइए और पोलिश शिक्षक नियुक्त कर दिए। बाद में एक और कैंप बनाया गया जिसमें और बच्चों को रखा गया। इस मानवीय अभियान में पटियाला और बड़ौदा के राजाओं ने आर्थिक सहयोग दिया, जबकि टाटा समूह ने भी सहायता राशि दी।
युद्ध की समाप्ति तक बच्चे नवानगर में रहे। जब पोलैंड में नई सरकार बनी, तो कुछ बच्चे अपने देश लौट गए, जबकि कई ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में बस गए। जाम साहब स्वयं उन्हें विदा करने पहुँचे—वह विदाई क्षण अत्यंत भावुक था।

“अच्छे महाराजा” के रूप में याद
पोलैंड के लोग आज भी जामसाहेब दिग्विजय सिंह को “गुड महाराजा” के नाम से याद करते हैं। उन्होंने न केवल पोलिश बच्चों का जीवन बचाया बल्कि उन्हें नया परिवार, शिक्षा और भविष्य भी दिया।

इज़राइल में मिला सम्मान
इज़राइल ने भी इस मानवीय कार्य की सराहना की। नवानगर में जिन पोलिश बच्चों को शरण मिली, उनमें कई यहूदी बच्चे थे। यहूदी समुदाय आज भी मानता है कि जाम साहब ने धर्म या जाति का भेद किए बिना सभी को समान रूप से अपनाया।
यहूदी-अमेरिकी ऐतिहासिक संरक्षण सोसायटी के अध्यक्ष जेरी क्लिंगर ने लिखा कि जब उन्हें जाम साहब की इस कहानी का पता चला, तो उन्होंने इसे “मानवता की अद्वितीय मिसाल” कहा। उनकी पहल पर ही नेवातिम, इज़राइल में महाराजा दिग्विजय सिंह जडेजा की प्रतिमा स्थापित की गई—ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उस भारतीय राजा को याद रखें, जिसने युद्ध के अंधकार में भी मानवता की ज्योति जलाए रखी।
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