भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर की ब्रसेल्स यात्रा एक बार फिर यह दिखाती है कि भारत अब वैश्विक कूटनीति में न केवल आत्मविश्वास से भरपूर है, बल्कि अपने हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक मंचों पर स्पष्ट, सशक्त और संतुलित आवाज भी बन चुका है। इस यात्रा के दौरान उन्होंने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय संघ की विदेश मामलों की प्रमुख काजा कैलास से मुलाकात की, जिसमें उन्होंने भारत-यूरोप संबंधों, वैश्विक संकटों और भारत की रणनीतिक भूमिका पर गहराई से बातचीत की।
जयशंकर ने अपनी बातचीत में भारत की वैश्विक स्थिति और रणनीतिक महत्व को रेखांकित किया और आतंकवाद जैसे विषय पर बेहद स्पष्ट और दृढ़ रुख अपनाया। उन्होंने 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले की निंदा के लिए यूरोपीय संघ का आभार जताया और चेताया कि आतंकवाद केवल भारत-पाकिस्तान का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक खतरा है जो किसी भी समय यूरोप और अन्य पश्चिमी देशों को भी प्रभावित कर सकता है। उन्होंने ओसामा बिन लादेन का उदाहरण देते हुए पाकिस्तान को घेरा और वैश्विक समुदाय को याद दिलाया कि आतंकवाद को नजरअंदाज करने की कीमत अंततः सभी को चुकानी पड़ती है।
भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की पृष्ठभूमि में जयशंकर ने भारत को एक भरोसेमंद आर्थिक भागीदार बताया। उन्होंने कहा कि भारत 1.4 अरब लोगों का लोकतांत्रिक देश है जो चीन की तुलना में ज्यादा पारदर्शिता, कुशल श्रमबल और स्थायित्व की पेशकश करता है। यह संदेश यूरोपीय संघ के लिए खासतौर पर महत्वपूर्ण है, जहां चीन के साथ व्यापारिक तनाव और रणनीतिक मतभेद बढ़ रहे हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध पर भी जयशंकर ने संतुलित और परिपक्व दृष्टिकोण रखा। उन्होंने दोहराया कि भारत युद्ध को समाधान नहीं मानता और भारत किसी पक्ष का विरोध या समर्थन करने की बजाय शांति और संवाद की वकालत करता है। रूस पर प्रतिबंध लगाने में भारत की भागीदारी न होने को लेकर उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत अपनी नीति अपने हितों, ऐतिहासिक संबंधों और अनुभवों के आधार पर तय करता है, न कि किसी दबाव के तहत।
जब उनसे पूछा गया कि क्या भारत को डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेता पर भरोसा है, तो जयशंकर ने बड़ी परिपक्वता से जवाब दिया, “मैं दुनिया को वैसे ही लेता हूं जैसा मैं पाता हूं।” उन्होंने यह भी साफ किया कि भारत व्यक्तियों से नहीं, देशों और संस्थाओं से रिश्ते बनाता है, और अमेरिका के साथ संबंध भारत की विदेश नीति के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक हैं।
जयशंकर की यह यात्रा भारत के “वसुधैव कुटुम्बकम” के मूल मंत्र को आगे बढ़ाने के साथ-साथ राष्ट्रीय हितों की प्रभावशाली रक्षा का उदाहरण भी बनी। उन्होंने दिखा दिया कि भारत अब एक ऐसा देश है जो कूटनीति में न तो दबाव में आता है, न दुविधा में पड़ता है, बल्कि स्पष्टता, संतुलन और आत्मगौरव के साथ संवाद करता है।