प्रयागराज माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा स्वयं को ‘शंकराचार्य’ कहे जाने पर कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2022 के स्थगन आदेश का हवाला देते हुए प्रशासन ने उन्हें 24 घंटे के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया है। प्राधिकरण ने सवाल उठाया है कि जब मामला शीर्ष अदालत में विचाराधीन है, तो वे स्वयं को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य कैसे घोषित कर रहे हैं।
इस संबंध में माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक औपचारिक नोटिस जारी किया है। नोटिस में सुप्रीम कोर्ट में लंबित सिविल अपील संख्या 3010/2020 और 3011/2020 का उल्लेख किया गया है। प्रशासन के अनुसार, अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने ज्योतिषपीठ के किसी भी नए पट्टाभिषेक पर रोक लगा दी थी, जो अब तक प्रभावी है।
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नोटिस में स्पष्ट रूप से पूछा गया है कि जब शीर्ष अदालत ने अंतिम निर्णय आने तक किसी को भी शंकराचार्य नियुक्त करने से मना किया है, तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिविर, बोर्ड और प्रचार सामग्री में इस पद का उपयोग कैसे कर रहे हैं। प्रशासन ने इसे अदालत की अवमानना की श्रेणी में आने वाला कृत्य मानते हुए 24 घंटे के भीतर स्पष्टीकरण दाखिल करने को कहा है।
मेला प्राधिकरण ने अपने नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्टूबर 2022 के आदेश का भी विस्तृत उल्लेख किया है, जिसमें प्रार्थना खंड (a) को स्वीकार करते हुए ज्योतिषपीठ बद्रीनाथ या किसी अन्य संस्था को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद या किसी अन्य व्यक्ति का पट्टाभिषेक करने से रोक दिया गया था। प्रशासन का कहना है कि चूंकि मुख्य अपील अब भी लंबित है और कोई नया आदेश पारित नहीं हुआ है, इसलिए वर्तमान में ज्योतिषपीठ का कोई भी नया शंकराचार्य कानूनी रूप से मान्य नहीं है।
प्राधिकरण ने विभिन्न अधिवक्ताओं द्वारा दी गई विधिक राय का भी हवाला दिया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिषपीठ के उत्तराधिकारी के रूप में किसी भी प्रकार की भूमि आवंटित करना या उन्हें शंकराचार्य के रूप में मान्यता देना सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना होगी।
इसी कानूनी जटिलता के चलते माघ मेला प्रशासन ने मेले के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा किए जा रहे प्रचार-प्रसार और ‘शंकराचार्य’ शब्द के प्रयोग पर गंभीर आपत्ति जताई है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि अदालत के अंतिम निर्णय तक किसी भी प्रकार की मान्यता या विशेष सुविधा नहीं दी जा सकती।
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