फिलिस्तीनी अथॉरिटी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन किया है। भारत में फिलिस्तीन के राजदूत अब्दुल्ला अबू शावेश की ओर से नई दिल्ली में भारत की दावेदारी के समर्थन की बात सामने आने के बाद यह सवाल फिर चर्चा में है कि क्या आने वाले समय में अरब और खाड़ी देश भी भारत के पक्ष में एकजुट हो सकते हैं।
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग करता रहा है। नई दिल्ली का तर्क है कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था 21वीं सदी की राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करती। भारत चाहता है कि सुरक्षा परिषद के स्थायी और अस्थायी, दोनों वर्गों में विस्तार हो और उसे स्थायी सदस्य के रूप में जगह मिले। दिसंबर 2025 में विदेश मंत्रालय ने संसद में भी कहा था कि सरकार विस्तारित UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है और इसके लिए द्विपक्षीय तथा बहुपक्षीय स्तर पर लगातार समर्थन जुटाया जा रहा है।
अरब देशों का रुख उतना अस्पष्ट नहीं, जितना अक्सर माना जाता है
भारत की UNSC दावेदारी को लेकर अरब देशों की स्थिति को समझना जरूरी है। सभी खाड़ी देशों ने एक जैसा रुख नहीं अपनाया है, लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि UAE समेत किसी प्रमुख खाड़ी देश ने भारत का स्पष्ट समर्थन नहीं किया है।
लोकसभा की विदेश मामलों की समिति की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, छह सदस्यीय Gulf Cooperation Council यानी GCC में UAE, ओमान और बहरीन भारत की स्थायी UNSC सीट की दावेदारी के समर्थन से भारत को अवगत करा चुके हैं। वहीं सऊदी अरब, कुवैत और कतर ने उस रिपोर्ट के समय तक भारत की दावेदारी के पक्ष में सार्वजनिक समर्थन व्यक्त नहीं किया था।
इस लिहाज से फिलिस्तीन का समर्थन भारत के लिए महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र से यह पहला समर्थन नहीं है। UAE, ओमान और बहरीन पहले ही भारत की दावेदारी के पक्ष में सकारात्मक रुख जता चुके हैं।
क्या सऊदी अरब भी भारत के साथ आएगा?
अब सबसे ज्यादा नजर सऊदी अरब, कतर और कुवैत जैसे देशों पर रहेगी। भारत के सऊदी अरब के साथ ऊर्जा, व्यापार, निवेश, सुरक्षा और रणनीतिक क्षेत्रों में संबंध पिछले वर्षों में काफी मजबूत हुए हैं। इसी तरह कतर और कुवैत भी भारत के महत्वपूर्ण खाड़ी साझेदार हैं।
हालांकि द्विपक्षीय संबंध मजबूत होने का मतलब यह नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पुनर्गठन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सभी देश स्वतः समान रुख अपनाएंगे। UNSC सुधार में केवल भारत की सदस्यता का सवाल नहीं है, बल्कि नई स्थायी सीटों की संख्या, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, अफ्रीका की भागीदारी और वीटो अधिकार जैसे कई मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं।
भारत सरकार भी मानती है कि 193 सदस्य देशों के बीच सुरक्षा परिषद सुधार की प्रकृति और स्वरूप को लेकर अलग-अलग विचार हैं। यही वजह है कि यह प्रक्रिया वर्षों से Intergovernmental Negotiations यानी IGN में आगे बढ़ रही है।
OIC फैक्टर कितना महत्वपूर्ण?
अरब और मुस्लिम देशों की स्थिति में Organisation of Islamic Cooperation यानी OIC की राजनीति को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। OIC में 57 सदस्य देश हैं और पाकिस्तान इस मंच पर कश्मीर सहित भारत से जुड़े मुद्दे उठाता रहा है।
लेकिन OIC सदस्यता का अर्थ यह नहीं है कि सभी मुस्लिम या अरब देश भारत से जुड़े हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर पाकिस्तान के रुख का अनुसरण करते हैं। भारत के UAE, सऊदी अरब, ओमान और बहरीन जैसे देशों के साथ अलग-अलग मजबूत द्विपक्षीय संबंध हैं। UNSC के मामले में UAE, ओमान और बहरीन का भारत के पक्ष में समर्थन इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
इसलिए भारत के लिए रणनीति केवल पूरे OIC को एक समूह के रूप में देखने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ समर्थन मजबूत करने की रही है।
फिलिस्तीन और भारत के रिश्तों का लंबा इतिहास
फिलिस्तीन की ओर से भारत की UNSC दावेदारी का समर्थन दोनों देशों के दशकों पुराने रिश्तों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है।
भारत ने 1974 में Palestine Liberation Organization यानी PLO को फिलिस्तीनी जनता के एकमात्र वैध प्रतिनिधि के रूप में मान्यता दी थी और ऐसा करने वाला पहला गैर-अरब देश बना था। इसके बाद भारत ने 1988 में फिलिस्तीन राज्य को मान्यता दी। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, फिलिस्तीनी मुद्दे का समर्थन लंबे समय से भारत की विदेश नीति का हिस्सा रहा है।
भारत ने स्वास्थ्य, शिक्षा, आईटी, प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचा और संस्थागत क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में भी फिलिस्तीन को सहायता दी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फरवरी 2018 में फिलिस्तीन की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे। उस दौरे में भारत और फिलिस्तीन के बीच सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल समेत कई विकास परियोजनाओं को लेकर समझौते हुए थे।
फिलिस्तीन के लिए भारत की नई स्वास्थ्य सहायता
भारत-फिलिस्तीन विकास सहयोग अब भी जारी है। 20 अगस्त 2026 को सामने आई जानकारी के मुताबिक भारत ने फिलिस्तीन में 200 बेड के सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल के निर्माण के लिए भी समझौता किया है। इसमें आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के साथ ट्रॉमा सेंटर की व्यवस्था प्रस्तावित है।
इससे स्पष्ट है कि इजरायल के साथ भारत के गहरे रणनीतिक संबंध होने के बावजूद नई दिल्ली ने फिलिस्तीन के साथ अपने विकास और राजनीतिक संबंधों को पूरी तरह छोड़ा नहीं है।
इजरायल से दोस्ती और फिलिस्तीन का समर्थन—भारत की संतुलन नीति
पिछले एक दशक में भारत और इजरायल के बीच रक्षा, कृषि, टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और व्यापार के क्षेत्रों में संबंध तेजी से बढ़े हैं। वहीं दूसरी ओर भारत लगातार फिलिस्तीनी लोगों के विकास और एक बातचीत-आधारित समाधान का समर्थन करता रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी 2018 की फिलिस्तीन यात्रा के दौरान भी कहा था कि भारत फिलिस्तीन के विकास में पुराना सहयोगी रहा है और प्रशिक्षण, टेक्नोलॉजी, बुनियादी ढांचे तथा परियोजना सहायता के क्षेत्र में सहयोग जारी रखेगा।
यानी भारत की नीति को केवल ‘इजरायल बनाम फिलिस्तीन’ के चश्मे से देखना सही नहीं होगा। नई दिल्ली इजरायल के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने के साथ फिलिस्तीन के साथ अपने पारंपरिक संबंध और विकास सहायता भी कायम रखने की कोशिश करती रही है।
फिलिस्तीन का समर्थन भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण?
फिलिस्तीन का समर्थन भारत की UNSC दावेदारी के लिए कूटनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे Global South और अरब-मुस्लिम देशों के बीच भारत की दावेदारी को और बल मिल सकता है।
हालांकि स्थायी सदस्यता की राह अभी लंबी है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में बदलाव और व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति की आवश्यकता होगी। भारत के लिए अगली बड़ी चुनौती उन देशों से स्पष्ट समर्थन हासिल करना होगी जिन्होंने UNSC सुधार की सामान्य मांग का समर्थन तो किया है, लेकिन भारत की स्थायी सीट पर अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट रुख नहीं अपनाया है।
फिलहाल तस्वीर यह है कि फिलिस्तीन के साथ-साथ UAE, ओमान और बहरीन भी भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी के समर्थन में आ चुके हैं, जबकि सऊदी अरब, कतर और कुवैत जैसे देशों से सार्वजनिक और स्पष्ट समर्थन हासिल करना भारतीय कूटनीति के लिए महत्वपूर्ण अगला कदम हो सकता है।
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