सऊदी अरब–पाकिस्तान रक्षा समझौता: दिखावा ज़्यादा, मजबूरी कम नहीं
सऊदी अरब और पाकिस्तान ने बुधवार (17 सितंबर 2025) को ‘स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते में लिखा है कि अगर किसी एक देश पर हमला होता है तो उसे दोनों पर हमला माना जाएगा। यानी सऊदी पर हमला हुआ तो पाकिस्तानी फौज उतरेगी और पाकिस्तान पर संकट आया तो सऊदी भी उसकी तरफदारी करेगा।
सुनने में यह साझेदारी मजबूत लगती है, लेकिन असलियत कहीं ज़्यादा जटिल है। सऊदी अरब आर्थिक रूप से मजबूत है, उसके पास दुनिया के सबसे आधुनिक हथियार और बड़ी सैन्य क्षमता है, लेकिन उसके सैनिकों की ट्रेनिंग और जज़्बा हमेशा सवालों में रहा है। वहीं पाकिस्तान की फौज संख्या में बड़ी और जंग लड़ने की आदी जरूर है, मगर आर्थिक तंगी से जूझ रहा पाकिस्तान इस गठजोड़ में पैसे और निवेश की आस लिए बैठा है।
Joint Statement Issued Following Pakistan Prime Minister State Visit to Saudi Arabia.https://t.co/qtzfeV32Pi#SPAGOV pic.twitter.com/5riRT9QsvP
— SPAENG (@Spa_Eng) September 17, 2025
क्यों हुआ यह समझौता?
यह डील ऐसे समय आई है जब इज़रायल और क़तर के बीच तनाव चरम पर है। हाल ही में इज़रायल ने दोहा में हवाई हमला किया था, जिसमें हमास के नेता मारे गए। क़तर ने इसे ‘राज्य प्रायोजित आतंकवाद’ कहा। अमेरिका भी इस मामले में खुलकर इज़रायल का साथ नहीं दे रहा। ऐसे में सऊदी को लगा कि अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर रहना ठीक नहीं, इसलिए उसने पाकिस्तान जैसे ‘इस्लामिक भाई’ को साथ खड़ा कर लिया।
एमबीएस (मोहम्मद बिन सलमान) ने रियाद में कहा कि यह समझौता उनकी सुरक्षा को और मजबूत करेगा। इसमें ट्रेनिंग, हथियारों का आदान-प्रदान और ज़रूरत पड़ने पर न्यूक्लियर सहयोग तक का जिक्र है।
It’s not new. Saudi Arabia and Pakistan have signed such defense understandings before, but these have always been about protecting Saudi security, not Pakistan’s.
During the Iran–Iraq War (1980–88), Pakistan assured Riyadh that an attack on Saudi Arabia would be treated as an… https://t.co/8un3kY2kKH
— Zahack Tanvir — ضحاك تنوير (@ZahackTanvir) September 18, 2025
पाकिस्तान को क्या फायदा?
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लगातार गिरावट में है। महँगाई, बेरोजगारी और आईएमएफ के कड़े शर्तों वाले कर्ज ने उसे कमज़ोर बना दिया है। ऐसे में यह समझौता उसके लिए ऑक्सीजन है।
- पाकिस्तान को $38 बिलियन का रक्षा निवेश मिलने का वादा किया गया है।
- सऊदी पाकिस्तान में हथियार फैक्ट्रियाँ लगाएगा और रोजगार के मौके भी बढ़ेंगे।
- पाकिस्तानी सैनिकों को सऊदी में तैनाती के अवसर मिलेंगे। एक सैनिक के पीछे मिलने वाला पैसा सरकार के खजाने में जाएगा।
यानी पाकिस्तान खुश है क्योंकि उसे तुरंत अरबों डॉलर की मदद और निवेश की उम्मीद है।
सऊदी को क्या फायदा?
सऊदी को हमेशा से ही पाकिस्तान की फौज पर भरोसा रहा है।
- 1969 में साउथ यमन के हमले के दौरान पाकिस्तानी पायलटों ने सऊदी की एयरफोर्स को बचाया।
- 1979 में मक्का की ग्रैंड मस्जिद पर कब्जे के वक्त पाकिस्तानी कमांडो उतारे गए।
- 1980 के ईरान-इराक युद्ध में 20 हज़ार पाकिस्तानी सैनिक सऊदी में तैनात रहे।
- हाल ही में यमन युद्ध और इस्लामिक कोलिशन में भी पाकिस्तानी सैनिकों की भूमिका रही।
सऊदी जानता है कि उसके सैनिकों की लड़ाई की क्षमता सीमित है। इसलिए पाकिस्तान को ‘रेंटल आर्मी’ की तरह इस्तेमाल करता है। पैसे के बदले सुरक्षा।
भारत पर असर?
भारत को इस डील से ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता।
- सऊदी अरब हमेशा भारत–पाक युद्धों में न्यूट्रल रहा है।
- 1965, 1971 और कारगिल तक में उसने पाकिस्तान को सिर्फ आर्थिक मदद दी, लेकिन भारत के खिलाफ खड़ा नहीं हुआ।
- आज सऊदी–भारत का व्यापार $50 बिलियन से ऊपर है, जबकि पाकिस्तान से सिर्फ $3 बिलियन।
भारत ने आधिकारिक बयान में कहा कि वह इस समझौते का अध्ययन करेगा, लेकिन चिंता की कोई वजह नहीं है।
नतीजा
यह समझौता असल में पुरानी बोतल में नई शराब जैसा है।
- पाकिस्तान मजबूरी में इसमें शामिल है क्योंकि उसे पैसे चाहिए।
- सऊदी को अपने लिए सस्ती और जंग-आज़माई हुई फौज चाहिए।
- भारत के लिए इसमें कोई बड़ा खतरा नहीं है, क्योंकि सऊदी अपने आर्थिक हितों के चलते पाकिस्तान के लिए भारत से रिश्ते खराब नहीं करेगा।