इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने खिलाफ शुरू की गई महाभियोग प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उन्होंने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के उस फैसले को गलत ठहराया है, जिसके तहत उनके खिलाफ जाँच के लिए एक तीन-सदस्यीय कमेटी गठित की गई थी।
जस्टिस वर्मा का आरोप है कि स्पीकर ने कमेटी बनाते समय कानूनी प्रावधानों का पालन नहीं किया और मनमाने तरीके से निर्णय लिया। उनका कहना है कि महाभियोग से जुड़ी जाँच कमेटी बनाने के लिए लोकसभा और राज्यसभा—दोनों सदनों की सहमति जरूरी होती है। इस मामले को गंभीर मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा स्पीकर के साथ-साथ लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय को नोटिस जारी किया है।
यह पूरा मामला तब सामने आया, जब दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के आवास पर आग लगने की घटना के दौरान कथित तौर पर नकदी मिलने की बात सामने आई। इसके बाद हुई एक आंतरिक जाँच में उन्हें दोषी ठहराया गया, जिसके आधार पर 146 सांसदों ने संसद में उनके महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया।
अपनी याचिका में जस्टिस वर्मा ने ‘जजेस (जाँच) अधिनियम, 1968’ के उल्लंघन का आरोप लगाया है। कानून के अनुसार, यदि लोकसभा और राज्यसभा में एक ही दिन महाभियोग प्रस्ताव लाया जाता है, तो जाँच कमेटी के गठन का फैसला दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों को संयुक्त रूप से करना होता है।
हालाँकि, जस्टिस वर्मा का कहना है कि लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने राज्यसभा के सभापति की सहमति का इंतजार किए बिना ही अकेले कमेटी का गठन कर दिया। इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने भी हैरानी जताई कि संसद में इतने अनुभवी कानूनी जानकारों के रहते ऐसी प्रक्रिया संबंधी चूक कैसे हो सकती है।
फिलहाल स्पीकर द्वारा गठित तीन-सदस्यीय जाँच कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार भी शामिल हैं। इस कमेटी ने जस्टिस वर्मा से आरोपों पर लिखित जवाब माँगा है। जस्टिस वर्मा ने इस नोटिस को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में सुनवाई करेगा, जबकि जस्टिस वर्मा को जाँच कमेटी के सामने 24 जनवरी 2026 को पेश होना है।
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