कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने द हिंदू में अपने लेख के जरिए ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का तीखा विरोध किया है। उन्होंने इसे 72,000 करोड़ रुपये की ‘बेकार और खर्चीली योजना’ बताते हुए कहा कि यह प्रोजेक्ट जनजातीय समुदायों के लिए अस्तित्व का खतरा है और पर्यावरण के लिए विनाशकारी साबित होगा। उनके मुताबिक, यह दुनिया की अनोखी जैव विविधता को नष्ट कर देगा और आदिवासियों के अधिकारों को कुचल देगा।
लेकिन सोनिया गाँधी की आलोचना में कई खामियाँ और राजनीति का रंग भी दिखता है। 2004 की सुनामी में जब निकोबारी गाँव तबाह हुए थे, तब कांग्रेस सरकार ने आदिवासियों के पुनर्वास और आधुनिक सुविधाएँ देने पर ध्यान नहीं दिया। आज जब मोदी सरकार सड़कों, बिजली और कनेक्टिविटी की बात कर रही है, तब इसे ‘आपदा’ कहकर डर दिखाया जा रहा है।

कानूनी प्रक्रिया और मंजूरी का सच
सोनिया गाँधी का आरोप है कि प्रोजेक्ट में नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी हुई है। जबकि सच्चाई यह है कि इसे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, पर्यावरण मंत्रालय की हाई पावर्ड कमेटी और नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट (NCSCM) से मंजूरी मिली है। NCSCM की जाँच में पाया गया कि प्रोजेक्ट का इलाका CRZ 1B श्रेणी में आता है, जहाँ बंदरगाह का निर्माण वैध है। यह नियमों की अवहेलना नहीं बल्कि पालन है।
पेड़ लगाने पर विवाद
सोनिया गाँधी ने जंगल कटाई की भरपाई के लिए पेड़ लगाने की योजना को ‘भयानक पर्यावरणीय तबाही’ बताया। लेकिन यह भारत के वन संरक्षण कानून के तहत अनिवार्य प्रक्रिया है, जिसे कांग्रेस सरकारों ने भी वर्षों तक अपनाया। इसे खारिज करना पर्यावरणीय नियमों को ही नकारना है।
रणनीतिक और आर्थिक पहलू
भारत का 25% कार्गो विदेशी बंदरगाहों से होकर गुजरता है, जिसमें कोलंबो का चीन-निर्मित टर्मिनल अकेले 40% कार्गो संभालता है। गलाथिया बे की 18–20 मीटर गहराई और इसकी भौगोलिक स्थिति भारत को सिंगापुर जैसे ट्रांसशिपमेंट हब से टक्कर देने का दुर्लभ अवसर देती है। यदि यह प्रोजेक्ट पूरा होता है, तो भारत विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम कर सकता है और हर साल अरबों रुपये बचा सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा का पहलू
सोनिया गाँधी ने राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा लगभग टाल दिया। भारत का बड़ा हिस्सा अभी कोलंबो से होकर जाता है, जहाँ चीन अरबों रुपये निवेश कर चुका है और जासूसी जहाज भी रुकते हैं। यह भारत की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। ऐसे में गलाथिया बे पर बड़ा बंदरगाह बनाना सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि सामरिक आवश्यकता है।
प्रोजेक्ट की योजना
मोदी सरकार ने 2024 में गलाथिया बे को ‘प्रमुख बंदरगाह’ घोषित किया। 44,000 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला यह प्रोजेक्ट चार चरणों में विकसित होगा। पहला चरण 2028 तक पूरा होगा, जो 40 लाख TEU कंटेनर संभालने में सक्षम होगा। 2058 तक इसकी क्षमता 1.6 करोड़ TEU तक पहुँच सकती है। यह भारत को पूर्वी तट पर एक समुद्री महाशक्ति में बदल सकता है।