‘द बंगाल फाइल्स’ वो फिल्म है जो हमारी उस बनावटी धारणाओं को चकनाचूर कर देती है कि हम एक शांतिपूर्ण, धर्मनिरपेक्ष और सभ्य समाज में जी रहे हैं। यह फिल्म केवल एक कहानी नहीं सुनाती, बल्कि आपको उस दर्दनाक इतिहास से रूबरू कराती है, जिसे हमारे इतिहासकारों और बंगाल के तथाकथित बुद्धिजीवियों ने हमारी स्मृतियों से लगभग मिटा दिया था। यह फिल्म मनोरंजन के दायरे से कहीं आगे बढ़कर आपको यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे साथ कभी क्या हुआ था और आज भी हम किस स्थिति से गुजर रहे हैं।
आमतौर पर जब कोई शानदार फिल्म खत्म होती है, तो लोग तालियाँ बजाते हैं, खुशी से झूम उठते हैं। लेकिन ‘द बंगाल फाइल्स’ देखने के बाद मेरे भीतर गहरा सन्नाटा था। मैं तालियाँ नहीं बजा सका, क्योंकि यह फिल्म महज़ सिनेमा नहीं थी, बल्कि हमारे इतिहास का एक ऐसा खौफनाक आईना थी, जिसे देखना आसान नहीं। यह फिल्म आपको बार-बार सवाल करने पर मजबूर करती है कि आखिर हमारे नेताओं और बुद्धिजीवियों ने इस भयानक सच को क्यों छुपाया? हमारे वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष इतिहासकारों ने इस काले अध्याय को सफेद करने की कोशिश क्यों की? क्या किसी गहरे जख्म को सिर्फ ढक देने से वो ठीक हो जाता है? या वो अंदर ही अंदर और सड़ता है, जैसे गैंग्रीन? यही सवाल फिल्म में एक जवान अधिकारी अपने सीनियर से करता है और गुस्से में पूछता है कि हर अपराध को हिंदू-मुस्लिम का रंग क्यों दिया जाता है।
फिल्म की कहानी और स्क्रीनप्ले बेहद दमदार हैं। निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने इसे ‘द कश्मीर फाइल्स’ से भी एक कदम आगे ले जाकर रचा है। कहानी 15 अगस्त 1947 से पहले के खूनी महीनों और आज के बंगाल की अल्पसंख्यक-प्रधान राजनीति के बीच बार-बार झूलती रहती है। दोनों दौर को जोड़ने वाली कड़ी है भारती बनर्जी का किरदार, जिसे पल्लवी जोशी ने अद्भुत तरीके से जीवंत किया है। उनका अभिनय इतना प्रभावी है कि वे कई पुरस्कारों की हकदार हैं, लेकिन संभवतः उन्हें ये पुरस्कार न मिलें, क्योंकि पुरस्कार देने वाली लॉबी वही है जो अकादमिक और मीडिया जगत पर हावी रही है। फिल्म का संदेश साफ है—बंगाल आज भी उसी उग्रवाद और असुरक्षा से जूझ रहा है, जैसा 1946 में हुआ था।
फिल्म में कई ऐसे किरदार और प्रसंग सामने आते हैं, जिन्हें हमारी किताबों में लगभग दफ्न कर दिया गया था। जैसे गोपाल पाठा और हिंदू महासभा के उन बहादुर स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियाँ, जिनके बारे में आम लोगों को कुछ नहीं बताया गया। फिल्म में गांधी जी को आदर्शवादी लेकिन भ्रमित और असहाय रूप में दिखाया गया है, खासकर कोलकाता और नोआखाली के हिंसक दौर में। वे उन पीड़ित महिलाओं को केवल ‘सौम्य सलाह’ देते दिखते हैं, जिनका अपहरण और बलात्कार हो रहा था। वहीं कांग्रेस के थके हुए नेता, जो जल्दबाजी में आज़ादी पाने की चाह में हजारों साल पुराने देश को विभाजित करने के लिए राज़ी हो गए, दर्शकों के मन में और भी सवाल खड़े करते हैं।
इस फिल्म की ताकत उसके संवादों में भी है। कई संवाद दिल को झकझोरते हैं और सोचने पर मजबूर करते हैं। जैसे ‘द कश्मीर फाइल्स’ में एक मशहूर संवाद था—“सरकार उनकी है, पर सिस्टम हमारा है।” उसी तरह इस फिल्म में हिंदू-मुस्लिम संबंधों और तथाकथित ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ पर इतनी बेबाक चर्चा होती है, जैसी पहले कभी स्क्रीन पर देखने को नहीं मिली। यही ईमानदारी और स्पष्टता कई नेताओं और बुद्धिजीवियों को असहज करती है, क्योंकि यह फिल्म उनकी वोट बैंक की राजनीति को उजागर करती है।
अभिनय की बात करें तो सभी कलाकारों ने बेहतरीन काम किया है। दर्शन कुमार का कृष्ण पंडित का किरदार, जो पूरी जिंदगी अन्याय सहता है और अंत में गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ता है, दर्शकों के दिल में अमिट छाप छोड़ता है। मिथुन चक्रवर्ती, अनुपम खेर, राजेश खेरा, मोहन कपूर, नमाशी चक्रवर्ती और शाश्वत चटर्जी ने अपने किरदारों को बेहद संजीदगी से निभाया। युवा भारती मुखर्जी बनी सिमरत कौर का अभिनय प्रभावी है, हालांकि उनके किरदार में थोड़ी और गहराई आ सकती थी।
फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक और सिनेमैटोग्राफी भी इसे नई ऊँचाइयों तक ले जाते हैं। पुराने बांग्ला गीतों का प्रयोग बेहद भावनात्मक तरीके से किया गया है, जिससे दर्शकों की भावनाएँ और गहरी हो जाती हैं। बड़े-बड़े सेट्स और ऐतिहासिक माहौल को असली रूप में पेश करने में निर्देशक ने कोई कमी नहीं छोड़ी। कैमरे का काम इतना सटीक है कि आप खुद को उसी दौर में खड़ा हुआ महसूस करते हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि यह फिल्म आपको असहज करती है। यह आपके भीतर की उस नकली आत्म-छवि को तोड़ देती है जिसमें हम मानते हैं कि हम शांति और धर्मनिरपेक्षता के छाते तले जी रहे हैं। लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। इस असहजता का सामना करना ज़रूरी है, क्योंकि जब तक हम सच को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक न तो इतिहास से सबक ले पाएँगे और न ही भविष्य में त्रासदियों को रोक पाएँगे।
दुनिया के कई देशों ने ऐसा किया है। जर्मनी ने यहूदी नरसंहार पर बनी फिल्मों को देखकर संवेदनशीलता अपनाई, अमेरिका ने अश्वेतों और मूल निवासियों के प्रति हुए अन्याय को स्वीकार कर सुलह की राह चुनी। उसी तरह भारत को भी अपने असली इतिहास का सामना करना होगा। विवेक अग्निहोत्री को दोष देने से पहले हमें उन झूठी कहानियों को दोष देना होगा, जो हमें वर्षों से सुनाई जाती रही हैं। निर्देशक का काम केवल हमें आईना दिखाना है, ताकि हम अपनी आत्मा को शुद्ध करें और सच को अपनाकर आगे बढ़ें।
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