भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने रविवार (14 दिसंबर 2025) को सम्राट पेरूम्बिडुगु मुथारैयार द्वितीय के नाम पर एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। इस घोषणा के बाद लोगों में यह स्वाभाविक जिज्ञासा पैदा हुई कि आखिर पेरूम्बिडुगु मुथारैयार द्वितीय कौन थे, जिनका नाम आम इतिहास पुस्तकों में शायद ही देखने को मिलता है। यह सवाल हमें उस सच्चाई की ओर ले जाता है कि इतिहास केवल वही नहीं होता जो हमें पढ़ाया गया हो, बल्कि वह भी होता है जिसे समय और सत्ता की राजनीति ने हाशिये पर डाल दिया।
स्वतंत्रता के बाद जिस तरह का इतिहासबोध स्कूलों और विश्वविद्यालयों में स्थापित हुआ, उसमें कुछ गिने-चुने राजवंशों और विचारधाराओं को ही प्रमुखता मिली। उत्तर भारत में तो पेरूम्बिडुगु मुथारैयार का नाम लगभग अज्ञात ही रहा, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि दक्षिण भारत में भी, जहां उन्होंने शासन किया, वहां तक पाठ्यक्रमों में उनके बारे में विस्तृत जानकारी नहीं मिलती। इतिहास लेखन की इसी प्रवृत्ति के कारण दक्षिण भारत के कई स्वाभिमानी और शक्तिशाली शासकों की स्मृति धुंधली पड़ती चली गई।
गौरतलब है कि नवंबर 2025 में पेरूम्बिडुगु मुथारैयार द्वितीय पर आयोजित एक कार्यक्रम में तमिलनाडु की DMK सरकार के एक मंत्री ने केंद्र सरकार से उनके नाम पर डाक टिकट जारी करने की अपील की थी। उस अपील के महज एक महीने के भीतर केंद्र सरकार द्वारा यह डाक टिकट जारी किया जाना अपने आप में ऐतिहासिक महत्व रखता है।
The Hon’ble Vice-President of India, Shri C. P. Radhakrishnan, released a commemorative postage stamp in honour of Emperor Perumbidugu Mutharaiyar II (Suvaran Maran) today at the Vice-President’s Enclave, New Delhi.
Speaking on the occasion, the Hon’ble Vice-President… pic.twitter.com/7olOi1x0Le
— Vice-President of India (@VPIndia) December 14, 2025
सम्राट पेरूम्बिडुगु मुथारैयार द्वितीय का वास्तविक नाम सुवरन मारन था। ‘पेरूम्बिडुगु’ उनकी उपाधि थी, जबकि ‘मुथारैयार’ उनके वंश का नाम। सुवरन मारन का जन्म सातवीं शताब्दी में हुआ माना जाता है और उन्होंने सातवीं से आठवीं शताब्दी ईस्वी के बीच वर्तमान तमिलनाडु के तंजावुर, त्रिची और पुदुकोट्टई क्षेत्रों पर शासन किया। अभिलेखों के अनुसार, उन्होंने अपने जीवनकाल में 12 युद्ध लड़े और कभी पराजय का सामना नहीं किया।
आमतौर पर इतिहास के विद्यार्थी चोल और पाण्ड्य जैसे प्रसिद्ध साम्राज्यों के बारे में तो पढ़ते हैं, लेकिन मुथारैयार वंश का उल्लेख या तो बहुत सीमित है या फिर पूरी तरह अनुपस्थित। जबकि विद्वान इतिहासकारों के अनुसार सुवरन मारन का पराक्रम और शासन क्षमता किसी भी मायने में चोलों और पाण्ड्यों से कम नहीं थी।
तंजावुर जिले के सेंदलै गांव में स्थित मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर के चार स्तंभों पर खुदे अभिलेख सुवरन मारन और उनके मुथारैयार वंश के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। इन अभिलेखों में प्राचीन तमिल लिपि में उनकी वंशावली, चरित्र और मेइकीर्ति यानी यशोगाथा का वर्णन मिलता है। मेइकीर्ति उन उपाधियों का समूह होता है, जो किसी राजा को उसकी वीरता, साहस और पराक्रम के आधार पर दी जाती थीं।
अभिलेखों में सुवरन मारन को कई उपाधियों से विभूषित किया गया है। इनमें ‘श्री तामरालयन’ (जिसमें शांति का वास हो), ‘श्री अभिमनदीरन’ (अहंकारी राजाओं के शत्रु), ‘श्री कलवर कलवन’ (चोरों का संहार करने वाला) और ‘श्री सथुरु केसरी’ (शत्रुओं के लिए सिंह समान) जैसी उपाधियाँ प्रमुख हैं। उन्हें ‘शत्रुभयंकर’ के नाम से भी जाना जाता था, जो उनकी सैन्य शक्ति के साथ-साथ उनके राजनीतिक प्रभाव को भी दर्शाता है।
सुवरन मारन का दरबार केवल युद्ध और सत्ता का केंद्र नहीं था, बल्कि वह विद्वानों और विचारधाराओं के संवाद का मंच भी था। अभिलेखों के अनुसार उन्होंने कोडुंबालूर, मनालूर, थिंगालूर, कंथालूर, अज़ुंथियूर, करै, मरंगूर, पुग़ज़ी, अन्नालवायिल, सेम्पोन मारी, वेंकोडल और कन्ननूर सहित 12 स्थानों पर युद्ध लड़े। इनमें से कई स्थान आज भी अपने प्राचीन नामों से जाने जाते हैं।
उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि सुवरन मारन शैव परंपरा के संरक्षक थे और शैव विद्वानों को संरक्षण देते थे, लेकिन उनकी बौद्धिक उदारता किसी एक पंथ तक सीमित नहीं थी। इतिहासकार डी. जी. महाजन के शोधपत्र ‘Ancient Dravidian Jain Heritage’ में उल्लेख मिलता है कि जैन आचार्य विमलचंद्र ने उनके दरबार में शैव विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ किया था। विमलचंद्र श्रवणबेलगोला की जैन परंपरा से जुड़े थे और उनके दरबार में विभिन्न विचारधाराओं के बीच संवाद हुआ करता था।
अभिलेख यह भी बताते हैं कि आचार्य पचिलवेल नम्बन, आचार्य अनिरुद्ध, कोट्टात्रु इलम पेरुमनार और कुववन कंजन जैसे कवि सुवरन मारन के दरबार की शोभा थे। इन कवियों ने उनकी वीरता और पराक्रम का गुणगान किया, जो मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर के स्तंभों पर आज भी अंकित है।
कांचीपुरम के वैकुंठ पेरुमाल मंदिर के एक अभिलेख में नंदीवर्मन द्वितीय के राज्याभिषेक के समय एक मुथारैयार राजा के औपचारिक स्वागत का उल्लेख मिलता है, जिसे इतिहासकार पेरूम्बिडुगु मुथारैयार द्वितीय से जोड़ते हैं। डेनिस हडसन की पुस्तक ‘बॉडी ऑफ गॉड: एन एंपरर्स पैलेस फॉर कृष्णा इन एट्थ-सेंचुरी काँचीपुरम’ में भी उनके शासन का विस्तृत वर्णन मिलता है।
प्रशासनिक दृष्टि से भी सुवरन मारन दूरदर्शी शासक थे। उन्होंने जलाशयों, नहरों और पुलों का निर्माण कराया, जो उस समय की वर्षा-आधारित सिंचाई व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। यह उनके कुशल प्रशासन और जनकल्याणकारी सोच को दर्शाता है।
अब जब केंद्र सरकार ने उनके नाम से डाक टिकट जारी किया है, तो यह उम्मीद की जा सकती है कि सुवरन मारन और मुथारैयार वंश को इतिहास के पाठ्यक्रमों में उचित स्थान मिलेगा। इससे आने वाली पीढ़ियों को यह समझने का अवसर मिलेगा कि भारत का इतिहास केवल कुछ प्रसिद्ध नामों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें ऐसे अनेक सुवरन मारन भी हैं, जिनकी स्मृति का पुनर्जागरण समय की आवश्यकता है।
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