पर्युषण पर्व का महत्व
जैन समाज में पर्युषण पर्व का विशेष स्थान है। यह आत्मशुद्धि, संयम, तप और क्षमा का पर्व माना जाता है। इस वर्ष यह पर्व 24 अगस्त से प्रारंभ हुआ है।
श्वेतांबर और दिगंबर परंपरा में अंतर
- श्वेतांबर जैन समाज में पर्युषण पर्व भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी से शुरू होकर शुक्ल पक्ष की पंचमी तक चलता है।
- दिगंबर जैन समाज में यह पर्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष पंचमी से चतुर्दशी तक मनाया जाता है।
क्षमावाणी और मिच्छामी दुक्कड़म
पर्युषण पर्व के समापन पर क्षमावाणी दिवस या मैत्री दिवस मनाया जाता है। इस दिन जैन धर्मावलंबी एक-दूसरे से कहते हैं—
“मिच्छामी दुक्कड़म”
अर्थात— यदि मैंने मन, वचन या कर्म से, जाने-अनजाने आपको दुख पहुँचाया हो, तो कृपया मुझे क्षमा करें।
- मिच्छामी का अर्थ है क्षमा करना।
- दुक्कड़म का अर्थ है गलतियाँ या पाप।
इस तरह यह वाक्य क्षमा, मैत्री और आपसी सौहार्द का प्रतीक है।
विश्वभर में उत्सव
भारत के साथ-साथ यह पर्व आज अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और जापान जैसे देशों में बसे जैन समुदाय द्वारा भी पूरे श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है।
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