रील्स, पॉप और हिप-हॉप के दौर में ग़ज़ल एक बार फिर युवाओं के बीच अपनी जगह बना रही है। सोशल मीडिया पर जौन एलिया, राहत इंदौरी और दूसरे मशहूर शायरों की पंक्तियां वायरल हो रही हैं, वहीं नई पीढ़ी ग़ज़ल के शेरों में प्यार, दिल टूटने, तन्हाई और इंतज़ार जैसे अपने जज़्बात तलाश रही है। ग़ज़ल गायक निश्चल ज़वेरी भी इस बदलाव को करीब से महसूस कर रहे हैं।
छह साल की उम्र से तबला और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीखने वाले निश्चल का ग़ज़ल से रिश्ता बचपन में घर पर सुनी गई ग़ज़लों से शुरू हुआ। कोविड के दौरान उन्होंने इस विधा को गहराई से समझना शुरू किया और करीब 200 ग़ज़लें कंपोज़ कीं। आज वह ग़ज़ल को अपने अलग-अलग संगीत प्रभावों के साथ पेश कर रहे हैं।
Gen Z और ग़ज़ल के इस नए कनेक्शन, अपनी संगीत यात्रा और उर्दू शायरी की आज भी कायम लोकप्रियता को लेकर निश्चल ज़वेरी ने खास बातचीत की।
निश्चल, ग़ज़ल से आपका रिश्ता कैसे शुरू हुआ?
निश्चल ज़वेरी: संगीत हमेशा से मेरी ज़िंदगी का हिस्सा रहा है। मैंने छह साल की उम्र से तबला और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू किया। घर में जगजीत सिंह, बेगम अख्तर और दूसरे बड़े कलाकारों की ग़ज़लें खूब सुनी जाती थीं। लंबी ड्राइव हो या शाम को परिवार के साथ बैठना, ग़ज़ल हमेशा हमारे साथ रहती थी।
मेरे मामाजी ने भी इस सफर में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने मुझे मेहदी हसन साहब से परिचित कराया। मुझे याद है कि वह अपने साथ उर्दू-हिंदी की डिक्शनरी रखते थे। जब भी किसी ग़ज़ल में कोई मुश्किल उर्दू शब्द आता, वह उसका अर्थ मुझे समझाते थे।
उस वक्त शायद मुझे इसका एहसास नहीं था, लेकिन मैं संगीत के साथ-साथ उर्दू भाषा और शायरी को भी समझ रहा था। एक तरह से ग़ज़ल सुनना ही मेरी पहली तालीम थी।
कोविड के दौरान मेरा ग़ज़ल से रिश्ता और गहरा हुआ। मेरे गुरुजी ने मुझे करीब 700 ग़ज़लों की एक किताब दी। मैंने उन्हें पढ़ना, समझना और हर शेर के पीछे छिपे भाव को महसूस करना शुरू किया। इसी दौरान मैंने खुद ग़ज़लें कंपोज़ करनी शुरू कीं और करीब 200 ग़ज़लें कंपोज़ कीं।
इसलिए कह सकता हूं कि ग़ज़ल हमेशा मेरे आसपास थी, लेकिन कोविड के दौरान मुझे सच में उससे प्यार हुआ।
ग़ज़ल की ऐसी क्या खासियत है, जिसने आपको इसके इतना करीब ला दिया?
निश्चल ज़वेरी: मेरे लिए सबसे बड़ी चीज़ है इसमें मौजूद मानवीय भावनाएं। ग़ज़ल दिल से दिल तक पहुंचती है। प्यार, जुनून, दूरी, तड़प, इंतज़ार और दिल टूटना—ये ऐसी भावनाएं हैं, जिन्हें हर इंसान कभी न कभी महसूस करता है।
अहमद फ़राज़ साहब, फ़िराक़ गोरखपुरी, वसीम बरेलवी साहब और दाग़ देहलवी साहब जैसे शायरों ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। जिगर मुरादाबादी साहब भी मेरे पसंदीदा शायरों में हैं।
मेरे लिए ग़ज़ल की सबसे खूबसूरत बात यह है कि एक शेर आपके उस जज़्बात को शब्द दे सकता है, जिसे आपने महसूस तो किया हो, लेकिन कभी कह नहीं पाए। यही चीज़ मुझे इस विधा से जोड़ती है।
आपकी ग़ज़लों में क्लासिकल के साथ एक मॉडर्न साउंड भी सुनाई देता है। आपके संगीत प्रभावों ने इसे कैसे आकार दिया?
निश्चल ज़वेरी: मेरे संगीत प्रभाव बहुत अलग-अलग हैं। मेरी शुरुआत हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत से हुई, इसलिए राग, सुर, मेलोडी और इम्प्रोवाइजेशन मेरी संगीत समझ का हिस्सा हैं।
इसके साथ ग़ज़ल और बॉलीवुड का गोल्डन दौर भी मुझे बहुत पसंद है। लेकिन मैं वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक, सिम्फनी, ऑर्केस्ट्रा, पियानो, बाख और मोजार्ट से भी प्रभावित रहा हूं। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक और ट्रांस म्यूजिक भी मुझे पसंद है।
लॉस एंजिल्स में मैं एक इलेक्ट्रॉनिक हिप-हॉप बैंड का हिस्सा भी रहा हूं। इन सभी अनुभवों ने मेरे संगीत को आकार दिया है।
हालांकि मैं जानबूझकर अपनी ग़ज़ल को ‘मॉडर्न’ बनाने की कोशिश नहीं करता। मैं बस ऐसा साउंड बनाना चाहता हूं जो मेरी अपनी पहचान को दिखाए। मेरी जड़ें शास्त्रीय संगीत में हैं, लेकिन मेरे सभी संगीत अनुभव उसमें कहीं न कहीं शामिल हो जाते हैं।
आपने पहली बार कब महसूस किया कि Gen Z भी ग़ज़ल को उतनी ही गहराई से महसूस कर रही है?
निश्चल ज़वेरी: लाइव परफॉर्मेंस के दौरान। मुझे याद है, एक कॉलेज फेस्टिवल में परफॉर्म करने के बाद कुछ युवा मेरे पास आए और उन्होंने कहा, “हमने कभी ग़ज़ल नहीं सुनी थी। यह पहली बार था और अब हम इसके फैन हैं।”
मुझे सबसे ज्यादा जो बात अच्छी लगी, वह यह थी कि वे सिर्फ संगीत की तारीफ नहीं कर रहे थे। वे खास शेरों और उनकी पंक्तियों की बात कर रहे थे और बता रहे थे कि वे उनसे कितनी गहराई से जुड़ पाए।
यही ग़ज़ल की खूबसूरती है। दस लोग एक ही शेर सुन सकते हैं, लेकिन हर कोई उसमें अपनी अलग कहानी देख सकता है।
एक कलाकार के तौर पर हमारा काम बस इतना है कि पहली कड़ी को आसान बनाया जाए। लोगों को शब्द और भाव समझ आएं, ताकि उन्हें ग़ज़ल कोई मुश्किल या पहुंच से बाहर की चीज़ न लगे।
एक बार लोग समझ जाते हैं कि शायर क्या कह रहा है, उसके बाद शायरी खुद अपना काम कर देती है।
रील्स, पॉप और हिप-हॉप के बीच बड़ी हुई Gen Z को ग़ज़ल इतनी रिलेटेबल क्यों लग रही है?
निश्चल ज़वेरी: टेक्नोलॉजी बदलती है, लेकिन इंसानी भावनाएं नहीं।
आज भी प्यार, दिल टूटना, दूरी, तन्हाई, इंतज़ार और उम्मीद उतने ही मायने रखते हैं। ग़ज़ल इन जटिल भावनाओं को सिर्फ दो पंक्तियों में कह सकती है।
शायद यही वजह है कि यह रील्स के दौर में भी इतनी आसानी से कनेक्ट करती है। आप एक शेर सुनते हैं और अचानक लगता है—“ये तो बिल्कुल मेरी बात है।”
रील शायद सिर्फ पहला दरवाजा है। कोई दो लाइनें सुनता है, उनसे जुड़ता है, फिर पूरी ग़ज़ल खोजता है और उसके बाद शायर के बारे में जानना शुरू करता है। इस तरह एक छोटी-सी रील किसी को पूरी शायरी की दुनिया तक ले जा सकती है।
मुझे नहीं लगता कि युवा दर्शकों के लिए ग़ज़ल को बदलने की जरूरत है। हमें सिर्फ उसे आसान और सुलभ बनाना है। जब शब्द दिल तक पहुंचते हैं, तो शायरी खुद अपना रास्ता बना लेती है।
क्या आपको लगता है कि ग़ज़ल एक बार फिर अपने सुनहरे दौर की ओर बढ़ रही है?
निश्चल ज़वेरी: बिल्कुल। आज जौन एलिया साहब, मुन्नवर राना जी, राहत इंदौरी साहब और कई दूसरे शायरों को नई पीढ़ी फिर से खोज रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार उनकी शायरी डिजिटल दुनिया के जरिए लोगों तक पहुंच रही है।
आज हमारे आसपास बहुत शोर है। ऐसे में लोग ऐसी चीज़ तलाश रहे हैं जो उन्हें रुकने, महसूस करने और ध्यान से सुनने पर मजबूर करे। मुझे लगता है कि ग़ज़ल यही जगह दे रही है।
इसलिए मैं इसे सिर्फ ग़ज़ल को बचाए रखने का दौर नहीं मानता। यह उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का समय है। अगर हम उसकी रूह को बरकरार रखते हुए उसे नए साउंड और नई आवाज़ों के साथ आगे ले जाएं, तो ग़ज़ल का अगला सुनहरा दौर शायद हमारे सामने ही है।
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