लोकसभा में एंटी-पेपर लीक विधेयक (Anti-Paper Leak Bill) और प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता को लेकर छिड़ी बहस के बीच उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर गर्माहट आ गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने समाजवादी पार्टी (SP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और विपक्ष पर करारा प्रहार किया है।
संसद में अपनी बात रखते हुए अनुराग ठाकुर ने सपा के इतिहास को कुरेदते हुए आरोप लगाया कि जो लोग आज युवा कल्याण और Gen-Z के अधिकारों की बातें कर रहे हैं, उनका अतीत परीक्षा व्यवस्था और प्रतिभाशाली छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने से भरा रहा है।
अखिलेश सरकार ने खुद नकली विरोधी कानून को खत्म किया था ताकि पेपर लीक और नकल से इनकी जेब गरम होती रहे…
: @ianuragthakur जी ने तो धोती खोल दी..
छात्र हित का ढोंग छोड़कर पहले इसका जवाब दो आखिर नकल विरोधी कानून को क्यों समाप्त किया गया..?
आज छात्रहित दिख रहा है ये उस समय कहाँ… pic.twitter.com/cW2eNcw06R
— Shivam Dixit (@ShivamdixitInd) July 28, 2026
‘एंटी-कॉपी एक्ट’ (1992) को निरस्त करने का मुद्दा गरमाया
अनुराग ठाकुर ने उत्तर प्रदेश में साल 1992 की कल्याण सिंह सरकार (तत्कालीन शिक्षा मंत्री राजनाथ सिंह) द्वारा लाए गए ऐतिहासिक ‘एंटी-कॉपी कानून’ (Anti-Copying Act 1992) का जिक्र किया।
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क्या था 1992 का एंटी-कॉपी कानून?
उत्तर प्रदेश में परीक्षाओं में होने वाली धांधली और नकल पर पूरी तरह लगाम लगाने के लिए तत्कालीन भाजपा सरकार यह कड़ा कानून लेकर आई थी। इसमें नकल करने या कराने को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध घोषित किया गया था।
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सपा सरकार में निरस्त हुआ कानून:
साल 1993-94 में जब मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी सत्ता में आई, तो इस सख्त कानून को यह कहते हुए निरस्त कर दिया गया कि यह छात्रों के प्रति अत्यधिक कठोर और उत्पीड़नकारी है।
अनुराग ठाकुर ने संसद में सीधा सवाल खड़ा किया कि आखिर परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाने वाले और नकल माफिया पर नकेल कसने वाले कड़े कानूनों को खत्म क्यों किया गया था?
“थोड़ी-बहुत चीटिंग तो चलती है”— अनुराग ठाकुर ने सपा पर कसा तंज
अनुराग ठाकुर ने समाजवादी पार्टी के पुराने बयानों और नीतियों का हवाला देते हुए कहा कि सपा नेतृत्व की मानसिकता रही है कि “थोड़ी-बहुत चीटिंग तो चलती है”।
उन्होंने तीखे लहजे में कहा:
“100-100 पेपर लीक कराने वाले और नकल माफिया का साथ देने वाले आज युवाओं के मसीहा और शुभचिंतक बनने का ढोंग कर रहे हैं।”
उन्होंने आरोप लगाया कि सपा शासन के दौरान भर्ती आयोगों को पक्षपात का अड्डा बना दिया गया था, यहाँ तक कि लोक सेवा आयोग की कॉपियां तक जला दी गई थीं। वोट बैंक की राजनीति और नकल माफिया को बढ़ावा देने के लिए उस दौर में कड़े कानूनों से समझौता किया गया था।
सपा का पलटवार: “छात्रों का दमन था पुराना कानून”
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने इन आरोपों का खंडन करते हुए अपना रुख स्पष्ट किया है। सपा का कहना है कि 1992 का एंटी-कॉपी कानून एक दमनकारी कानून बन चुका था, जिसके जरिए पुलिस निर्दोष छात्रों और युवाओं को जेल भेजकर उनके करियर को खत्म कर रही थी। सपा के अनुसार, उस समय कानून को वापस लेना छात्रों को प्रशासनिक उत्पीड़न से बचाने के लिए लिया गया एक आवश्यक कदम था।
क्यों अहम है यह बहस?
देश भर में प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, नीट (NEET) विवाद और सार्वजनिक परीक्षाओं की सुरक्षा को लेकर जारी बहस के बीच ऐतिहासिक निर्णयों का सामने आना राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। संसद में पेश ‘एंटी-पेपर लीक विधेयक’ के समय जहाँ भाजपा सरकार सख्त रुख अपनाकर युवाओं को संदेश देना चाहती है, वहीं अतीत की नीतियों का यह मुकाबला उत्तर प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक हलचल पैदा कर रहा है।
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