गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर वर्ष 2026 के पद्म पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इन नामों पर औपचारिक मुहर लगाई। यह वह अवसर होता है, जब देश उन लोगों को सम्मान देता है, जिन्होंने बिना किसी दिखावे के अपने काम से समाज और राष्ट्र को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाई है।
इस बार पद्म पुरस्कारों के लिए देश और विदेश से 39 हजार से अधिक नामांकन प्राप्त हुए। इनमें से चयनित 131 लोगों को सम्मानित किया जाएगा। सूची के अनुसार, 5 हस्तियों को पद्म विभूषण, 13 को पद्म भूषण और 113 लोगों को पद्म श्री प्रदान किया जाएगा। ये सम्मान खेल, कला, साहित्य, संगीत, विज्ञान, चिकित्सा, समाजसेवा और अन्य क्षेत्रों में असाधारण योगदान के लिए दिए जा रहे हैं।
इन 131 नामों के पीछे केवल उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि संघर्ष, त्याग और समाज के प्रति समर्पण की लंबी कहानियाँ छिपी हैं। इस साल की सूची में बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल हैं, जिन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया और वर्षों तक गुमनामी में रहकर समाज को दिशा दी।
कर्नाटक के अंके गौड़ा: मुफ्त लाइब्रेरी का सपना
कर्नाटक के मंड्या जिले के हरलाहल्ली गाँव के अंके गौड़ा ने अपना पूरा जीवन किताबों को लोगों तक पहुँचाने में समर्पित कर दिया। बस कंडक्टर और शुगर फैक्ट्री कर्मचारी के रूप में काम करने के बावजूद, उन्होंने अपनी सीमित आय का बड़ा हिस्सा किताबें खरीदने में लगाया। आज उनकी बनाई मुफ्त लाइब्रेरी में 20 से अधिक भारतीय और विदेशी भाषाओं की दो लाख से ज्यादा किताबें हैं। यह लाइब्रेरी पूरी तरह निःशुल्क है, जहाँ रोजाना सैकड़ों पाठक आते हैं।

अरुणाचल प्रदेश के तेची गुबिन: जनजातीय पहचान के संरक्षक
अरुणाचल प्रदेश के शियोमी जिले के केबी गाँव में जन्मे तेची गुबिन ने जनजातीय समाज को धर्मांतरण और सांस्कृतिक विघटन से बचाने के लिए जीवन समर्पित कर दिया। सरकारी सेवा में मुख्य वास्तुकार और हाउसिंग डायरेक्टर जैसे पदों पर रहने के दौरान और सेवानिवृत्ति के बाद भी वे गाँव-गाँव जाकर लोगों को अपनी परंपराओं और मूल पहचान से जुड़े रहने के लिए प्रेरित करते रहे। उन्होंने अरुणाचल विकास परिषद और अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठनों के साथ मिलकर समाज में आत्मसम्मान की भावना मजबूत की।

केरल की देवकी अम्मा: ‘वन की माँ’ की अनोखी मिसाल
केरल के अलप्पुझा की 92 वर्षीय कोल्लक्कयिल देवकी अम्मा ने अपने घर के आसपास की 4.5 एकड़ बंजर जमीन को 44 सालों में घने जंगल में बदल दिया। ‘तपोवनम्’ नाम के इस जंगल में आज 3,000 से अधिक पेड़-पौधे, औषधीय जड़ी-बूटियाँ और दुर्लभ प्रजातियाँ मौजूद हैं। यह जंगल न केवल जैव विविधता का केंद्र बन चुका है, बल्कि पर्यावरण शिक्षा का जीवंत स्थल भी है।

कश्मीर के बृज लाल भट्ट: सुरों से संस्कृति की रक्षा
कश्मीर घाटी में जन्मे बृज लाल भट्ट ने कश्मीरी लोक संगीत को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया। विस्थापन के दौर में जब कश्मीरी पंडितों की सांस्कृतिक विरासत खतरे में थी, तब उन्होंने बच्चों और युवाओं को सूफियाना कलाम, भजन और लोक धुनें सिखाईं। संगीत के जरिए उन्होंने एक पूरे समुदाय को उसकी जड़ों से जोड़े रखा।

छत्तीसगढ़ की बुधरी ताती: ‘बड़ी दीदी’ की समाजसेवा
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले की बुधरी ताती पिछले 36 वर्षों से नक्सल प्रभावित इलाकों में समाजसेवा कर रही हैं। उन्होंने 500 से अधिक महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया, साक्षरता और स्वास्थ्य अभियानों को बढ़ावा दिया और दुर्गम गाँवों में शिक्षा की पहुँच मजबूत की। उनके प्रयासों से कई महिलाएँ आज अपने पैरों पर खड़ी हैं।

अन्य सम्मानित हस्तियाँ
इनके अलावा मुंबई की पीडियाट्रिशियन आर्मिडा फर्नांडीज, जिन्होंने एशिया का पहला ह्यूमन मिल्क बैंक स्थापित किया; तमिलनाडु के पशु चिकित्सक पुन्नियमूर्ति नटेसन; गुजरात की लोककला ‘मानभट्ट’ को संरक्षित करने वाले धर्मिकलाल पंड्या; सिलम्बम कला के प्रशिक्षक के पाजनिवेल और हिंदी भाषा के लिए काम करने वाले पत्रकार कैलाश चंद्र पंत जैसे नाम भी सूची में शामिल हैं।
पद्म पुरस्कारों की बदली तस्वीर
मोदी सरकार के कार्यकाल में पद्म पुरस्कारों की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई गई। ऑनलाइन नामांकन प्रणाली शुरू होने से आम लोग भी गुमनाम नायकों को नामित कर सके। इससे पहले यह सम्मान अक्सर सत्ता के करीबियों तक सीमित रह जाता था। खुद विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं और पद्म पुरस्कार विजेताओं ने इस बदलाव की सराहना की है।
इन पुरस्कारों की सूची यह संदेश देती है कि अब सम्मान सिर्फ प्रसिद्ध चेहरों तक सीमित नहीं, बल्कि उन लोगों तक भी पहुँच रहा है, जिन्होंने चुपचाप समाज की नींव मजबूत की। यही पद्म पुरस्कारों की असली भावना है—सेवा, समर्पण और राष्ट्र निर्माण।
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