कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में 52 वर्षीय महिला के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार करते हुए यह स्पष्ट किया कि POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) कानून पूरी तरह से जेंडर न्यूट्रल है। अदालत ने कहा कि इस कानून के प्रावधानों के तहत नाबालिग के खिलाफ यौन अपराध करने वाला कोई भी व्यक्ति – चाहे वह पुरुष हो या महिला – आरोपी बन सकता है और उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।
यह मामला वर्ष 2020 का है, जब एक नाबालिग लड़के ने अपनी पड़ोसी महिला पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। इस संबंध में शिकायत उसकी मां ने लगभग चार साल बाद, 2024 में दर्ज करवाई। आरोपित महिला ने कोर्ट में दलील दी कि इतनी देर से दर्ज शिकायत विश्वसनीय नहीं है और यह पड़ोसियों के बीच पैसों के विवाद से प्रेरित है। लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि यौन अपराधों में शिकायत दर्ज करने में देरी अपने आप में FIR रद्द करने का आधार नहीं हो सकती, खासकर जब मामला किसी बच्चे से जुड़ा हो।
महिला पक्ष के वकील ने यह भी दलील दी कि ‘गंभीर यौन शोषण’ (Penetrative Sexual Assault) जैसे अपराधों में केवल पुरुष ही सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं और महिला की इसमें भूमिका ‘निष्क्रिय’ ही हो सकती है। इस तर्क को खारिज करते हुए जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की सिंगल जज बेंच ने कहा कि कानून में ऐसा कोई भेदभाव नहीं है। POCSO एक्ट को विशेष रूप से लैंगिक रूप से तटस्थ बनाया गया है ताकि हर परिस्थिति में नाबालिग की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
कोर्ट का यह फैसला महत्वपूर्ण इसलिए माना जा रहा है क्योंकि यह उन भ्रांतियों को तोड़ता है जिनमें यौन अपराधों को सिर्फ पुरुषों से जोड़कर देखा जाता है। अदालत ने साफ किया कि कानून के नजरिए से पीड़ित की सुरक्षा सर्वोपरि है और आरोपी का लिंग किसी प्रकार की राहत या छूट का आधार नहीं हो सकता। इस प्रकार, अब मामले की जांच और आगे की कार्यवाही सामान्य रूप से जारी रहेगी।
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