विभाजन की आग और हिंदुओं की करुण पुकार
साल था 1947।
देश आज़ाद हो रहा था, लेकिन इस आज़ादी की कीमत इतनी भारी थी कि लाखों हिंदुओं के जीवन लहूलुहान हो गए।
मुस्लिम लीग की ज़िद थी – “हमें अलग राष्ट्र चाहिए”।
और जब पाकिस्तान नाम का नया देश बना, तो उसकी नींव लाशों पर रखी गई।
ट्रेनों से केवल शव लौटते थे।
हज़ारों हिंदू स्त्रियाँ बलात्कार का शिकार हुईं, बच्चे अनाथ हो गए, और जो बच गए, उन्हें अपनी धरती, अपने घर, अपने मंदिर सब कुछ छोड़कर भागना पड़ा।
भारत सरकार असहाय थी।
नेहरू और कांग्रेस बेबस होकर देख रहे थे।
लेकिन इस संकट की घड़ी में अगर कोई मजबूती से खड़ा था, तो वह था –
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस)

जब संघ ने थामा हिंदुओं का हाथ
लाखों हिंदू पाकिस्तान में फँसे थे। चारों ओर कत्लेआम था।
इसी समय संघ के तत्कालीन सरसंघचालक गुरुजी ने आदेश दिया –
“जब तक वहाँ (पाकिस्तान) एक भी हिंदू है, उसे वहाँ मत छोड़ो।”
हज़ारों स्वयंसेवक अपनी जान जोखिम में डालकर पाकिस्तान पहुँचे।
उन्होंने दो करोड़ से अधिक हिंदुओं को सुरक्षित भारत पहुँचाया।
पंजाब, सिंध, लाहौर, कराची, बंगाल – हर जगह संघ के स्वयंसेवक छुपे हुए हिंदुओं को ढूँढ-ढूँढकर सुरक्षित निकाल रहे थे।
कहीं औरतों और बच्चों को छिपाकर ट्रकों में बिठाया जाता, तो कहीं रात के अँधेरे में परिवारों को सीमा पार कराया जाता।
भारत में आते ही विस्थापित हिंदुओं के लिए 3000 से अधिक राहत शिविर लगाए गए।
रोज़ाना 20–25 हज़ार लोगों को भोजन कराया जाता, घायल हिंदुओं के इलाज और रक्तदान की व्यवस्था होती, बिछड़े परिवारों को मिलाया जाता।
इतना ही नहीं, राष्ट्र सेविका समिति की सिंधुताई ने पाकिस्तान के भीतर ही तीन हफ़्ते तक महिलाओं को संगठित करने का अभियान चलाया।
सरदार पटेल की स्वीकारोक्ति
जब देशभर में अफरा-तफरी मची थी, तब सरदार वल्लभभाई पटेल ने संघ के कार्यों की तारीफ़ करते हुए कहा था –
“इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि संघ के वीर स्वयंसेवकों ने अनगिनत निर्दोष महिलाओं और बच्चों की जान बचाई।”
लेकिन दुख की बात है कि यह वीरता कभी इतिहास की किताबों में जगह नहीं पा सकी।
इस्लामिक जिहाद का सबसे बड़ा शिकार: हिंदू
विभाजन केवल सीमा पर नहीं हुआ, यह विभाजन हिंदुओं के दिलों में भी हुआ।
लगभग 20 लाख लोग मारे गए, 2 करोड़ से अधिक को अपने पुश्तैनी घर छोड़ने पड़े।
पंजाब, सिंध, बंगाल और कश्मीर में पूरे-पूरे हिंदू और सिख परिवार जला दिए गए।
बेटियों के साथ बाप के सामने बलात्कार किया गया।
बच्चों को कत्ल किया गया।
मंदिर तोड़े गए।
जिन्हें देखा, काट दिया गया।
इतिहास की किताबों में इन घटनाओं का कोई जिक्र नहीं।
जिन्होंने यह सब सहा, वही जानते हैं कि जिहादी भीड़ कितनी बेरहम थी।
आज़ादी के संग्राम में भी संघ अग्रणी
कांग्रेस और वामपंथी इतिहासकारों ने यह भ्रम फैलाया कि संघ ने स्वतंत्रता आंदोलन में कोई योगदान नहीं दिया।
लेकिन सच्चाई यह है कि संघ के स्वयंसेवक ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ तक में सक्रिय थे।
उमाकांत कड़िया – गांधीजी के आंदोलन में शहादत पाने वाले पहले क्रांतिकारी थे।
अनेक स्वयंसेवकों ने जेल काटी, जान दी।
जब नेहरू सरकार पाकिस्तान की साज़िशों के सामने लाचार थी, तब संघ के स्वयंसेवकों ने गुप्त सूचनाएँ जुटाकर सरकार को सचेत किया।
यानी जब-जब देश पर संकट आया, संघ सबसे आगे रहा।
आज क्यों याद करना ज़रूरी है?
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस केवल एक तिथि नहीं है।
यह वह दिन है, जब हमें लाखों हिंदुओं की पीड़ा, उनके बलिदान और संघ जैसे संगठनों की वीरता को याद करना चाहिए।
सचाई चाहे कितनी भी दबाई जाए, वक्त आने पर सामने आती ही है।
और आज वही समय है, जब दुनिया को यह जानना होगा कि –
अगर आरएसएस न होता, तो शायद करोड़ों हिंदुओं की नस्लें मिटा दी जातीं।
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