उत्तराखंड की धामी सरकार ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने की दिशा में कदम उठाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में यह निर्णय लिया गया कि राज्य में चल रही मदरसा शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से पुनर्गठित किया जाएगा और इसके स्थान पर उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (USAME) की स्थापना की जाएगी। सरकार के इस फैसले को राज्य में शिक्षा सुधार और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। उत्तराखंड में फिलहाल 452 पंजीकृत मदरसे हैं, जबकि 500 से अधिक मदरसे बिना किसी अनुमति या कानूनी आधार के चल रहे थे, जिनमें से 237 को सरकार ने बंद करा दिया है। मदरसों में मिली अनियमितताओं – जैसे केंद्रीय छात्रवृत्ति वितरण में गड़बड़ी और मिड-डे मील योजना में अनियमितताएँ – ने भी सरकार को इस दिशा में कड़ा कदम उठाने के लिए मजबूर किया।
नए विधेयक के अनुसार, अब मदरसा शिक्षा बोर्ड की जगह उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को मान्यता देगा और उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता की निगरानी करेगा। यह प्राधिकरण 11 सदस्यीय होगा, जिसमें अध्यक्ष अनिवार्य रूप से अल्पसंख्यक समुदाय का एक वरिष्ठ शिक्षाविद् होगा, जिसे कम से कम 15 वर्षों का अनुभव होना आवश्यक है। इस अधिनियम के तहत पूर्व में मदरसा शिक्षा बोर्ड द्वारा मान्यता प्राप्त सभी संस्थानों को शैक्षणिक सत्र 2026-27 से नई मान्यता लेनी होगी। इसके साथ ही 1 जुलाई 2026 से उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016 और उत्तराखंड अशासकीय अरबी एवं फारसी मदरसा मान्यता विनियमावली, 2019 स्वतः समाप्त हो जाएंगे।
नया ढांचा इस बात को सुनिश्चित करेगा कि कोई भी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान तभी मान्यता प्राप्त करेगा जब वह वास्तव में अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा स्थापित और संचालित हो, पंजीकृत निकाय (जैसे सोसायटी, न्यास या कंपनी) द्वारा प्रबंधित हो और उसमें गैर-अल्पसंख्यक छात्रों की संख्या 15% से अधिक न हो। प्राधिकरण न केवल अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े विषयों और भाषाओं का पाठ्यक्रम तैयार करेगा बल्कि परीक्षाओं और प्रमाणपत्र वितरण की प्रक्रिया भी पारदर्शी ढंग से आयोजित करेगा।
सबसे बड़ी बात यह है कि अब तक उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान का दर्जा केवल मुस्लिम समुदाय के लिए मान्य था, लेकिन नए प्रावधान लागू होने के बाद सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी समुदायों के शैक्षणिक संस्थान भी समान रूप से मान्यता प्राप्त कर सकेंगे। इससे न केवल धार्मिक समानता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा होगी, बल्कि शिक्षा क्षेत्र में विविधता और गुणवत्तापूर्ण सुधार भी सुनिश्चित होंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम न केवल मदरसों की शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक और जवाबदेह बनाएगा, बल्कि सभी अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों को समान अवसर उपलब्ध कराएगा। इससे उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन जाएगा, जिसने अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों की मान्यता और निगरानी के लिए एक एकीकृत और पारदर्शी व्यवस्था तैयार की है। इसे राज्य की शिक्षा प्रणाली को राष्ट्रीय स्तर पर एक नया मॉडल प्रस्तुत करने वाला कदम माना जा रहा है।
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