भारत और चीन ऐसे दो देश हैं, जिन्होंने आज से 58 वर्ष पहले युद्ध लड़ा था और आज भी सीमा पर माहौल तनावपूर्ण है। पाकिस्तान को तो हमेशा से भारत ने धूल चटाई है लेकिन चीन ने जब 1962 में भारत पर आक्रमण किया, तब जवाहरलाल नेहरू और उनके सारे ‘शांतिवादी दुनिया’ के मिथक धराशाई हो गए। अपने प्रधानमंत्रित्व काल के 16वें वर्ष में नेहरू को समझ आया कि देश की रक्षा नीति सटीक होनी चाहिए, सेना मजबूत व संसाधन संपन्न होनी चाहिए और हथियारों का निर्माण होना चाहिए।
लेकिन, तब तक देर हो चुकी थी। चीन की सेना ने अक्टूबर 20, 1962 को लद्दाख में और मैकमोहन रेखा के पार एक साथ हमले शुरू किए। चीन ने भारत को हरा दिया और हमारी सेना ने सीमित संसाधन और लचर राजनीतिक नेतृत्व के बावजूद इस युद्ध में अपना चरम पराक्रम दिखाया और ये सुनिश्चित किया कि देश को कम से कम नुकसान हो। देश का नेतृत्व उन्हीं नेहरू के हाथ में था, जिन्होंने ‘Scrap The Army’ जैसी शब्दावली का प्रयोग किया और ये वही सेना थी, जिसने तमाम उपेक्षाओं के बावजूद शक्तिशाली चीन का सामना किया।
भारत-चीन युद्ध की छोटी सी नींव: नेहरू ने सरदार पटेल की सलाह को नकारा
ऐसा नहीं है कि किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि चीन भारत पर आक्रमण कर सकता है। एक व्यक्ति था, जिसने अपनी ज़िंदगी के अंतिम वर्ष में भी नेहरू को समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि तिब्बत पर सरकार की नीति क्या हो और चीन हमारे लिए कितना बड़ा खतरा है। 1950 में चीन ने तिब्बत पर आक्रमण कर के उस पर कब्ज़ा करने की शुरुआत कर दी। उनका नरसंहार तभी से चालू हो गया था।
नेहरू आँख बंद किए बैठे रहे। वरिष्ठ भारत-चीन विशेषज्ञ Claude Apri लिखते हैं कि न सिर्फ कॉन्ग्रेस के कई नेता बल्कि कई बड़े अधिकारी भी नेहरू की आत्मघाती ‘चीन तुष्टिकरण’ नीति से नाराज़ थे, लेकिन उन्होंने किसी की एक भी न सुनी। तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल ने नवम्बर 11, 1950 में अपने अंतिम भाषण में तिब्बत और नेपाल के घटनाक्रम का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि दुनिया में कोई भी देश तिब्बत जितना शांतिप्रिय नहीं है और चीन हथियार के बल पर ये निंदनीय हरकत कर रहा है।
उनका कहना था कि न तो चीन ने भारत की ये सलाह सुनी कि तिब्बत मुद्दे को शांतिप्रिय तरीके से हल किया जाए, और न ही भारत को लगता था कि चीन बल-प्रयोग करेगा। सरदार पटेल ने चेताया था कि जब कोई देश इस तरह अपनी सैन्य शक्ति के नशे में चूर रहता है तो वो किसी मुद्दे पर शांति से सोच-विचार नहीं करता। उन्होंने कहा था कि डरपोक नहीं बनना है, खतरों से नहीं भागना है। कलियुग में अहिंसा के बदले अहिंसा हो, लेकिन बल का जवाब बल से दिया जाए।
एक तरह से देखा जाए तो 1962 के भारत-चीन युद्ध की छोटी सी नींव तभी पड़ गई थी, जब भारत ने चुपचाप तिब्बत को उसके कब्जे में जाने दिया। अगर उस समय भारत आवाज़ उठाता तो हो सकता था कई देश उसके साथ आते। लेकिन, चीन ने भारत के बारे में समझ लिया कि वो कुछ भी करता रहेगा और वहाँ के राजनीतिक नेतृत्व के पास इसके खिलाफ जाने की हिम्मत तक नहीं है। खैर, नेहरू ने ‘स्वास्थ्य कारणों से’ दिसंबर 1950 में सरदार पटेल को एक तरह से कार्यमुक्त कर दिया।












