अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने के बाद खाड़ी देशों ने अपनी तेल निर्यात रणनीति में बड़े बदलाव की तैयारी शुरू कर दी है। संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE, सऊदी अरब और इराक अब ऐसी पाइपलाइन, बंदरगाह और कंटेनर टर्मिनल परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं, जिनके माध्यम से होर्मुज स्ट्रेट से गुजरे बिना तेल को वैश्विक बाजारों तक पहुंचाया जा सके।
इन परियोजनाओं का उद्देश्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक पर निर्भरता कम करना, ऊर्जा आपूर्ति को अधिक सुरक्षित बनाना और क्षेत्रीय तनाव के दौरान वैश्विक बाजार में तेल का प्रवाह बनाए रखना है। युद्ध से पहले दुनिया के कुल तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस परिवहन का लगभग पांचवां हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता था।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। सऊदी अरब, UAE, कुवैत, इराक, कतर और बहरीन जैसे प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देशों का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से तेल और गैस का निर्यात करता है।
मार्ग संकरा होने के कारण यहां युद्ध, जहाजों पर हमला, नाकाबंदी या सैन्य तनाव पैदा होने का असर तुरंत अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई देता है। हालिया अमेरिकी-ईरानी तनाव और जलमार्ग की सुरक्षा को लेकर उत्पन्न चिंताओं ने खाड़ी देशों को वैकल्पिक रास्तों की आवश्यकता का अहसास कराया है।
UAE की नई पाइपलाइन से दोगुनी होगी निर्यात क्षमता
संयुक्त अरब अमीरात अपनी नई वेस्ट-ईस्ट तेल पाइपलाइन परियोजना के निर्माण में तेजी ला रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक इस परियोजना का लगभग आधा निर्माण पूरा हो चुका है और इसे वर्ष 2027 तक शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है।
करीब 252 मील लंबी यह प्रस्तावित पाइपलाइन UAE की मौजूदा हबशान-फुजैराह पाइपलाइन के समानांतर संचालित होगी। दोनों मार्गों के पूरी क्षमता से काम करने के बाद UAE की भूमि के रास्ते तेल निर्यात करने की क्षमता बढ़कर लगभग 36 लाख बैरल प्रतिदिन हो सकती है। इससे देश अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से गुजारे बिना फुजैराह बंदरगाह तक पहुंचा सकेगा।
UAE की मौजूदा अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन वर्ष 2012 से संचालित हो रही है। यह अबू धाबी के हबशान तेल क्षेत्र को ओमान की खाड़ी के तट पर स्थित फुजैराह से जोड़ती है और प्रतिदिन लगभग 15 से 18 लाख बैरल तेल ले जाने में सक्षम है।
ऊर्जा सुरक्षा पर UAE का दीर्घकालिक फोकस
अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी—ADNOC के प्रमुख सुल्तान अल जाबेर के अनुसार, हालिया क्षेत्रीय घटनाओं ने UAE की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति की उपयोगिता को और स्पष्ट किया है।
UAE का मानना है कि दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति आज भी बहुत कम समुद्री ‘चोक पॉइंट्स’ पर निर्भर है। किसी एक संकरे मार्ग पर संकट आने से जहाजों की आवाजाही, बीमा लागत, तेल की कीमत और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है। इसी जोखिम को देखते हुए UAE ने एक दशक से भी पहले होर्मुज स्ट्रेट को बायपास करने वाला बुनियादी ढांचा तैयार करना शुरू किया था।
अरब सागर के किनारे नया पोर्ट बनाने की योजना
UAE होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर अरब सागर की ओर एक नया बड़ा बंदरगाह और कंटेनर टर्मिनल विकसित करने की योजना भी बना रहा है। इसके तैयार होने पर खाड़ी क्षेत्र में आने-जाने वाले सामान को ऐसा वैकल्पिक मार्ग मिल सकता है, जिसमें जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से होकर नहीं गुजरना पड़ेगा।
यह परियोजना भविष्य में दुबई के जेबेल अली पोर्ट के विकल्प के रूप में उभर सकती है। इससे केवल तेल निर्यात ही नहीं, बल्कि कंटेनर शिपिंग, आयातित सामान और क्षेत्रीय व्यापार की सुरक्षा भी मजबूत हो सकती है।
इराक की 435 मील लंबी बसरा-हदीथा पाइपलाइन
इराक ने भी होर्मुज पर अपनी निर्भरता कम करने के उद्देश्य से करीब 435 मील लंबी बसरा-हदीथा पाइपलाइन पर काम शुरू किया है। यह पाइपलाइन दक्षिणी इराक के प्रमुख तेल क्षेत्र बसरा को पश्चिमी शहर हदीथा से जोड़ेगी।
भविष्य में इस नेटवर्क को जॉर्डन, सीरिया और तुर्की के रास्ते भूमध्य सागर तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ा जा सकता है। परियोजना के माध्यम से प्रतिदिन करीब 25 लाख बैरल तेल के परिवहन का लक्ष्य रखा गया है। इसके निर्माण पर लगभग 1.5 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान बताया गया है।
यह परियोजना इराक को अपने दक्षिणी समुद्री निर्यात टर्मिनलों के अलावा पश्चिम और उत्तर की तरफ नए निर्यात रास्ते उपलब्ध करा सकती है।
सऊदी अरब रेड सी पाइपलाइन की क्षमता बढ़ाने पर कर रहा विचार
सऊदी अरब भी अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन की क्षमता बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है। यह पाइपलाइन देश के पूर्वी तेल क्षेत्रों से कच्चा तेल लाल सागर के तट पर स्थित यानबू तक पहुंचाती है।
इस पाइपलाइन की मौजूदा क्षमता करीब 70 लाख बैरल प्रतिदिन बताई जाती है। सऊदी अरब इसमें प्रतिदिन 10 से 20 लाख बैरल अतिरिक्त क्षमता जोड़ सकता है, जिससे इसकी सैद्धांतिक क्षमता लगभग 90 लाख बैरल प्रतिदिन हो जाएगी। हालांकि परियोजना अभी शुरुआती विचार-विमर्श के चरण में है और इसे पूरा करने में कई वर्ष तथा अरबों डॉलर का निवेश लग सकता है।
इस विस्तार से सऊदी अरब होर्मुज स्ट्रेट के बजाय लाल सागर के रास्ते अधिक तेल यूरोप, अफ्रीका और दूसरे अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचा सकेगा।
2028 तक वैकल्पिक मार्गों से कितना तेल भेजा जा सकेगा?
ऊर्जा विशेषज्ञों का अनुमान है कि सभी प्रस्तावित परियोजनाएं निर्धारित समय पर पूरी होती हैं, तो वर्ष 2028 के अंत तक प्रतिदिन लगभग 73 लाख बैरल तेल वैकल्पिक मार्गों से भेजा जा सकता है।
इससे खाड़ी क्षेत्र के युद्ध-पूर्व तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से बाहर स्थानांतरित हो सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक खाड़ी देशों का लक्ष्य आने वाले वर्षों में लगभग 45 प्रतिशत तेल निर्यात को वैकल्पिक मार्गों पर ले जाना है। कुछ अनुमानों में यह हिस्सा करीब 60 प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना जताई गई है।
इस बदलाव से तेल बाजार को अचानक होने वाली आपूर्ति रुकावटों से सुरक्षा मिलेगी और खाड़ी देशों को निर्यात के लिए एक से अधिक विकल्प उपलब्ध होंगे।
क्या समाप्त हो जाएगी होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भरता?
नई पाइपलाइन और बंदरगाह परियोजनाओं के बावजूद होर्मुज स्ट्रेट का रणनीतिक महत्व समाप्त नहीं होगा। विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य में भी प्रतिदिन लगभग 70 से 90 लाख बैरल कच्चा तेल और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद इसी जलमार्ग से गुजर सकते हैं।
कुवैत, कतर और बहरीन जैसे देशों के पास फिलहाल होर्मुज को बायपास करने के सीमित विकल्प हैं। कतर का अधिकांश LNG निर्यात भी इसी समुद्री रास्ते पर निर्भर है। ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र बना रहेगा।
रेड सी में हूती हमले भी बढ़ा सकते हैं चुनौती
होर्मुज के विकल्प के रूप में विकसित किए जा रहे कई मार्ग लाल सागर और बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य से जुड़े हैं। लेकिन यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की ओर से जहाजों पर हमले की धमकियों ने इन मार्गों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है।
बाब अल-मंडेब लाल सागर को अदन की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। इस इलाके में अस्थिरता बढ़ने पर सऊदी अरब तथा अन्य देशों के लाल सागर आधारित निर्यात मार्ग प्रभावित हो सकते हैं।
इसका अर्थ है कि खाड़ी देश होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान के प्रभाव को कम तो कर सकते हैं, लेकिन क्षेत्रीय समुद्री जोखिमों को पूरी तरह समाप्त करना आसान नहीं होगा।
वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में बड़ा बदलाव
खाड़ी देशों की नई परियोजनाएं वैश्विक ऊर्जा व्यापार में बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत देती हैं। अब रणनीति केवल अधिक तेल उत्पादन करने की नहीं, बल्कि निर्यात मार्गों को सुरक्षित और विविध बनाने की भी है।
UAE, सऊदी अरब और इराक की पाइपलाइन परियोजनाएं सफल होती हैं तो किसी एक समुद्री मार्ग में संकट आने के बावजूद वैश्विक बाजार में तेल आपूर्ति बनाए रखना आसान होगा। इससे तेल की कीमतों में अचानक उछाल का खतरा घट सकता है और ऊर्जा आयातक देशों को अधिक स्थिर आपूर्ति मिल सकती है।
हालांकि होर्मुज और बाब अल-मंडेब जैसे जलमार्गों का महत्व बरकरार रहेगा, वैकल्पिक पाइपलाइन और बंदरगाह खाड़ी देशों को अधिक रणनीतिक स्वतंत्रता प्रदान करेंगे। इन परियोजनाओं का सकारात्मक संदेश यही है कि क्षेत्रीय संकट के बीच भी देश सहयोग, तकनीक और बेहतर बुनियादी ढांचे के माध्यम से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
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