लद्दाख में पानी के संरक्षण और कृत्रिम ग्लेशियरों को लेकर सोशल मीडिया पर एक नई बहस छिड़ गई है। कई पोस्टों में पर्यावरण कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि उन्होंने पद्मश्री चेवांग नोरफेल की कृत्रिम ग्लेशियर तकनीक को अपना बताकर प्रचार हासिल किया। हालांकि, उपलब्ध दस्तावेजों और विशेषज्ञ स्रोतों को देखने पर मामला सीधे “खोज की चोरी” का नहीं, बल्कि एक पुरानी अवधारणा को अलग डिजाइन और तकनीकी पद्धति से विकसित करने का दिखाई देता है।
कौन हैं चेवांग नोरफेल?
चेवांग नोरफेल लद्दाख के सेवानिवृत्त सिविल इंजीनियर हैं, जिन्हें ‘आइस मैन ऑफ लद्दाख’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने ऊंचाई वाले शुष्क क्षेत्र में सर्दियों के दौरान बहकर बेकार चले जाने वाले पानी को रोकने और जमाने की तकनीक विकसित की। इससे तैयार बर्फ गर्मियों और वसंत के शुरुआती महीनों में धीरे-धीरे पिघलती थी और खेती के लिए पानी उपलब्ध कराती थी।
नोरफेल पानी की धारा को छोटे-छोटे अवरोधों और छायादार क्षेत्रों की सहायता से धीमा करते थे। कम गति के कारण पानी सर्दियों में जमता जाता था और एक कृत्रिम हिम संरचना बनती थी। उनके बनाए कृत्रिम ग्लेशियरों से लद्दाख के कई गांवों को सिंचाई में सहायता मिली। भारत सरकार ने जल संरक्षण में योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2015 में पद्मश्री से सम्मानित किया था।
सोनम वांगचुक का ‘आइस स्तूप’ क्या है?
सोनम वांगचुक और उनकी टीम ने वर्ष 2013 के आसपास ‘आइस स्तूप’ परियोजना शुरू की। इसमें पानी को ऊंचाई के दबाव की सहायता से पाइपों के जरिए ऊपर की ओर फव्वारे की तरह छोड़ा जाता है। शून्य से नीचे के तापमान में यह पानी जमकर शंकु या स्तूप जैसी ऊंची संरचना बनाता है।
शंकुाकार डिजाइन का उद्देश्य बर्फ की बड़ी मात्रा को अपेक्षाकृत कम सतही क्षेत्र में संग्रहित करना है, ताकि वह सूरज की गर्मी में धीरे पिघले और फसलों की बुवाई के समय पानी उपलब्ध करा सके। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर ने भी लिखा है कि आइस स्तूप परियोजना ने कृत्रिम ग्लेशियरों की पहले से मौजूद तकनीक पर प्रयोग किया और उसे एक अलग स्वरूप दिया।
क्या सोनम वांगचुक ने चेवांग नोरफेल की तकनीक चुराई?
उपलब्ध विश्वसनीय स्रोतों में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह स्थापित हो कि सोनम वांगचुक ने चेवांग नोरफेल की तकनीक “चुराई” थी। यह जरूर स्पष्ट है कि नोरफेल ने लद्दाख में कृत्रिम ग्लेशियर बनाने और पानी को जमाकर सिंचाई में इस्तेमाल करने का काम वांगचुक के आइस स्तूप से काफी पहले शुरू कर दिया था।
दोनों पद्धतियों का मूल उद्देश्य समान है—सर्दियों के अतिरिक्त पानी को बर्फ के रूप में रोकना और जरूरत के समय उसे सिंचाई के लिए इस्तेमाल करना। लेकिन दोनों की संरचना और पानी जमाने का तरीका अलग है।
चेवांग नोरफेल की पद्धति में पानी को क्षैतिज रूप से फैलाकर, धीमा करके और छोटे बांधों की मदद से जमाया जाता है। सोनम वांगचुक के आइस स्तूप में पाइप के प्राकृतिक दबाव से पानी ऊपर छिड़का जाता है और वह ऊर्ध्वाधर, शंकुाकार संरचना में जमता है।
इसलिए तथ्यात्मक रूप से यह कहना अधिक उचित होगा कि वांगचुक का काम नोरफेल सहित कृत्रिम ग्लेशियरों की पहले से मौजूद परंपरा से प्रभावित एक नया डिजाइन और विस्तार है। इसे प्रमाण के बिना “चोरी” कहना उचित नहीं होगा।
क्या आइस स्तूप पेटेंट कराया गया था?
किसी आविष्कार का पेटेंट न होना यह साबित नहीं करता कि वह वैज्ञानिक या तकनीकी नवाचार नहीं है। कई सामाजिक और मुक्त-स्रोत नवाचारों को पेटेंट नहीं कराया जाता। उपलब्ध स्रोतों में आइस स्तूप को जल संरक्षण का नवाचार बताया गया है, लेकिन सोशल मीडिया पर किए जा रहे इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिली कि वांगचुक ने किसी और के पेटेंट का उल्लंघन किया था।
किसी तकनीक को पेटेंट मिलना उसके नए होने, आविष्कारात्मक कदम और औद्योगिक उपयोगिता जैसे कानूनी मानकों पर निर्भर करता है। पेटेंट न होने को अपने आप “जुगाड़” या “चोरी” का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
मैग्सेसे पुरस्कार और विदेशी फंडिंग का दावा
सोनम वांगचुक को वर्ष 2018 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। सोशल मीडिया पर पुरस्कार को जॉर्ज सोरोस से जोड़ने और वांगचुक को कथित अमेरिकी फंडिंग या PR अभियान के जरिए स्थापित किए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। हालांकि, उपलब्ध विश्वसनीय और आधिकारिक सामग्री में इन दावों की पुष्टि करने वाला ठोस प्रमाण नहीं मिला।
किसी व्यक्ति के पुरस्कार, विचारधारा या राजनीतिक गतिविधियों से असहमति जताई जा सकती है, लेकिन विदेशी फंडिंग, धोखाधड़ी या तकनीक चोरी जैसे आरोप प्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर ही प्रकाशित किए जाने चाहिए।
‘3 इडियट्स’ और सोनम वांगचुक का संबंध
लंबे समय से यह दावा किया जाता रहा है कि फिल्म ‘3 इडियट्स’ का किरदार फुनसुख वांगडू सोनम वांगचुक पर आधारित था। अभिनेता आमिर खान ने 17 जुलाई 2026 को कहा कि फिल्म लिखे और बनाए जाने के दौरान वह तथा लेखक सोनम वांगचुक को नहीं जानते थे और किरदार को सीधे उन पर आधारित बताना सही नहीं है। उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि वांगचुक के कार्यों का मूल्यांकन उनके अपने काम के आधार पर होना चाहिए।
नोरफेल को अपेक्षित पहचान क्यों नहीं मिली?
इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष चेवांग नोरफेल के योगदान को सामने लाना है। उन्होंने सीमित संसाधनों में लद्दाख के गांवों के लिए व्यावहारिक जल संरक्षण मॉडल तैयार किया। उनका काम आइस स्तूप से कई वर्ष पहले शुरू हो चुका था और इसी कारण उन्हें कृत्रिम ग्लेशियर तकनीक का प्रमुख अग्रदूत माना जाता है।
नोरफेल को पद्मश्री और जमनालाल बजाज पुरस्कार सहित कई सम्मान मिले, लेकिन यह भी सच है कि आधुनिक सोशल मीडिया और वैश्विक प्रचार के दौर में सोनम वांगचुक के आइस स्तूप को कहीं अधिक सार्वजनिक पहचान प्राप्त हुई।
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