पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में अमेरिका तथा ईरान के बीच हुआ 14-पॉइंट ‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ यानी MoU लगभग टूट चुका है। जिस समझौते को पश्चिम एशिया में युद्ध रोकने और तनाव कम करने की बड़ी कूटनीतिक पहल बताया गया था, वह एक महीने भी स्थायी नहीं रह सका। अमेरिकी सेना ने लगातार सातवीं रात ईरान पर हमले किए, जबकि तेहरान ने जवाब में खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और सहयोगी देशों को मिसाइल तथा ड्रोन से निशाना बनाया।
14-पॉइंट इस्लामाबाद MoU क्या था?
अमेरिका और ईरान के बीच 17 जून 2026 को हस्ताक्षरित इस अंतरिम समझौते का उद्देश्य सैन्य संघर्ष रोकना, होर्मुज जलडमरूमध्य को व्यावसायिक जहाजों के लिए खोलना और व्यापक शांति समझौते की दिशा में बातचीत शुरू करना था।
MoU के अंतर्गत दोनों देशों ने तत्काल सैन्य कार्रवाई रोकने और 60 दिनों में स्थायी समझौता तैयार करने पर सहमति जताई थी। अमेरिका को ईरान की नौसैनिक नाकाबंदी हटानी थी, जबकि ईरान को फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य से वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करनी थी। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत, फ्रीज संपत्तियों और पुनर्निर्माण सहायता जैसे मुद्दे भी शामिल थे।
हालाँकि, समझौते की कई शर्तों की व्याख्या को लेकर शुरुआत से ही मतभेद बने रहे। अमेरिका और ईरान ने एक-दूसरे पर समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अंतरिम व्यवस्था को समाप्त मानते हुए ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान दोबारा शुरू कर दिया।
पाकिस्तान की कूटनीतिक उपलब्धि को बड़ा झटका
पाकिस्तान ने इस समझौते को अपनी मध्यस्थता और कूटनीति की बड़ी सफलता के रूप में पेश किया था। इस्लामाबाद ने दावा किया था कि उसकी पहल से अमेरिका और ईरान युद्ध रोकने तथा बातचीत की मेज पर लौटने के लिए तैयार हुए।
लेकिन युद्ध दोबारा शुरू होने के बाद पाकिस्तान की मध्यस्थता पर सवाल खड़े हो गए हैं। पाकिस्तान अब भी कह रहा है कि बातचीत की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है और वह कतर तथा मिस्र जैसे क्षेत्रीय देशों के साथ बैकचैनल संपर्क बनाए हुए है। इसके बावजूद, मौजूदा सैन्य टकराव ने इस्लामाबाद MoU को व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी बना दिया है।
ईरान पर लगातार सातवीं रात अमेरिकी हमला
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, अमेरिकी सेना ने लगातार सातवीं रात ईरान के सैन्य और लॉजिस्टिक ठिकानों पर हमला किया। कार्रवाई में भूमिगत हथियार भंडार, निगरानी केंद्र, संचार सुविधाएँ, समुद्री सैन्य संसाधन और सप्लाई रूट से जुड़े ठिकाने निशाने पर रहे।
ईरान ने आरोप लगाया है कि अमेरिकी हमलों में दक्षिणी प्रांतों की बिजली, पानी, सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाओं को भी नुकसान पहुँचा है। वहीं अमेरिका का कहना है कि उसकी कार्रवाई का उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों को निशाना बनाने की ईरान की क्षमता को कमजोर करना है।
ईरान ने अमेरिकी बेस पर किए मिसाइल और ड्रोन हमले
अमेरिकी हमलों के जवाब में ईरान ने कुवैत, बहरीन और अन्य खाड़ी क्षेत्रों में स्थित अमेरिकी सैन्य एवं खुफिया ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया है। कई देशों ने अपने हवाई क्षेत्र में ईरानी मिसाइलों और ड्रोन को रोकने की जानकारी दी है।
ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने उन देशों को भी चेतावनी दी है, जहाँ अमेरिकी सैनिक और सैन्य सुविधाएँ मौजूद हैं। तेहरान का कहना है कि अमेरिका को सैन्य सहायता या अपने ठिकानों का इस्तेमाल करने देने वाले देशों को ईरानी जवाबी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
मोहसेन रेजाई की अमेरिका को कड़ी चेतावनी
ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई के वरिष्ठ सैन्य सलाहकार मोहसेन रेजाई ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने अगले दो से तीन दिनों तक हमले जारी रखे, तो ईरान केवल सीमित जवाबी कार्रवाई तक नहीं रुकेगा।
रेजाई ने कहा कि लगातार अमेरिकी हमलों की स्थिति में ईरान “पूर्ण पैमाने पर आक्रामक अभियान” शुरू कर सकता है। उन्होंने दावा किया कि संघर्ष के अगले चरण में अमेरिकी सैन्य बेस, सैनिक, युद्धपोत और अन्य रणनीतिक ठिकाने किसी भी राजनीतिक सीमा के भीतर सुरक्षित नहीं रहेंगे।
रेजाई के अनुसार, ईरान ने अब तक संघर्ष को बड़े क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय युद्ध में बदलने से रोकने के लिए संयम बरता है। लेकिन अमेरिका ने कार्रवाई जारी रखी तो ईरान जमीनी सेना सहित अपनी अतिरिक्त सैन्य क्षमताएँ तैनात कर सकता है।
खाड़ी देशों के नागरिकों से ईरान की अपील
ईरानी सैन्य सलाहकार ने कुवैत, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और अन्य खाड़ी देशों के नागरिकों से भी तनाव रोकने में भूमिका निभाने की अपील की है।
ईरान का तर्क है कि इन देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डे उन्हें संघर्ष का हिस्सा बना सकते हैं। हालाँकि, क्षेत्रीय देशों का कहना है कि वे अपने क्षेत्रों और नागरिक प्रतिष्ठानों पर होने वाले हमलों को स्वीकार नहीं करेंगे।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना संघर्ष का केंद्र
अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा संघर्ष का सबसे बड़ा केंद्र होर्मुज जलडमरूमध्य है। यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जिससे विश्व के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है।
ईरान द्वारा जलमार्ग पर नियंत्रण और जहाजों की आवाजाही सीमित करने के बाद अमेरिका ने नौसैनिक कार्रवाई तेज की। जवाब में ईरान ने अमेरिकी युद्धपोतों, सैन्य ठिकानों और सहयोगी देशों पर दबाव बढ़ा दिया। संघर्ष के कारण तेल की कीमतों, वैश्विक शिपिंग, बीमा लागत और ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका है।
क्या पूरे पश्चिम एशिया में फैल सकता है युद्ध?
ईरान की ताजा चेतावनी ने इस आशंका को बढ़ा दिया है कि अमेरिका-ईरान युद्ध अब द्विपक्षीय संघर्ष तक सीमित नहीं रहेगा। खाड़ी देशों में अमेरिकी बेस पर हमले, क्षेत्रीय देशों द्वारा मिसाइलों को इंटरसेप्ट करना और महत्वपूर्ण नागरिक बुनियादी ढाँचे को नुकसान पहुँचना व्यापक युद्ध का खतरा पैदा कर रहा है।
संयुक्त राष्ट्र ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और नागरिक प्रतिष्ठानों को निशाना न बनाने की अपील की है। पाकिस्तान, कतर और मिस्र अभी भी कूटनीतिक समाधान की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जमीन पर बढ़ती सैन्य कार्रवाई के कारण तत्काल संघर्षविराम की संभावना कमजोर दिखाई दे रही है।
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