तमिलनाडु सरकार को भूमि अधिग्रहण मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह वर्ष 2009-10 में औद्योगिक परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित की गई 970 एकड़ भूमि या तो मूल मालिकों को वापस करे या फिर 1 जनवरी 2014 की बाजार दर के अनुसार उचित मुआवजा प्रदान करे। अदालत ने कहा कि सरकार की देरी और निष्क्रियता का खामियाजा जमीन मालिकों को नहीं भुगतना चाहिए।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार और स्टेट इंडस्ट्रीज़ प्रमोशन कॉरपोरेशन ऑफ तमिलनाडु (SIPCOT) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एएम सिंघवी और प्रशांतो सेन उपस्थित हुए।
सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि वह पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के तहत लगभग 21 करोड़ रुपये का मुआवजा देने के लिए तैयार है। हालांकि, जमीन मालिकों के ट्रस्ट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद नायर ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि अधिग्रहण प्रक्रिया 2009-10 में शुरू जरूर हुई थी, लेकिन आज तक कोई अंतिम अवॉर्ड पारित नहीं किया गया। इस कारण भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अधूरी बनी रही और जमीन मालिकों को अब तक कोई मुआवजा नहीं मिला।
नायर ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार लगभग दो दशकों से जमीन पर कब्जा किए हुए है, जबकि प्रभावित भूमि मालिकों को एक रुपये तक का भुगतान नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि यह न केवल कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है बल्कि जमीन मालिकों के अधिकारों का भी हनन है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि जब सरकार किसी सार्वजनिक या औद्योगिक उद्देश्य के लिए जमीन अधिग्रहित करती है, तो उसे उचित और समयबद्ध मुआवजा देने के लिए तैयार रहना चाहिए। केवल सरकारी देरी के कारण नागरिकों को आर्थिक नुकसान नहीं उठाना चाहिए।
पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार 1 जनवरी 2014 की बाजार दर के आधार पर मुआवजा देने में असमर्थ है, तो उसे छह सप्ताह के भीतर अधिग्रहित भूमि मूल मालिकों को वापस करनी होगी। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि मुआवजे का लाभ केवल याचिकाकर्ताओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
इस मामले में मद्रास हाई कोर्ट पहले ही यह टिप्पणी कर चुका है कि भूमि अधिग्रहण से संबंधित केंद्रीय कानून लागू होने के बाद 1 जनवरी 2014 को कट-ऑफ तिथि माना जाएगा। यदि इसी आधार पर मुआवजा तय किया जाता है, तो राज्य सरकार को 21 करोड़ रुपये के बजाय 180 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान करना पड़ सकता है।
तमिलनाडु सरकार का कहना है कि इतनी बड़ी राशि का भुगतान राज्य के खजाने पर अतिरिक्त बोझ डालेगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि वित्तीय कठिनाइयों का हवाला देकर जमीन मालिकों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश भूमि अधिग्रहण मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। इससे उन हजारों मामलों पर भी असर पड़ सकता है, जहां सरकारों ने भूमि तो अधिग्रहित कर ली लेकिन वर्षों तक उचित मुआवजा नहीं दिया।
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