धर्म परिवर्तन के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC आरक्षण का लाभ दिए जाने से जुड़ा मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शोध और कानूनी वकालत से जुड़े संगठन ‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ (YFE) ने शीर्ष अदालत में हस्तक्षेप याचिका दाखिल कर मद्रास हाई कोर्ट के 25 जून 2026 के फैसले का समर्थन किया है।
मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि केवल इस्लाम धर्म अपनाने के आधार पर किसी व्यक्ति को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में शामिल कर OBC आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता। अब YFE ने सुप्रीम कोर्ट से इस निर्णय को बरकरार रखने की मांग की है।
तमिलनाडु सरकार के आदेश को दी गई चुनौती
मामले का संबंध तमिलनाडु सरकार के उस आदेश से है, जिसके तहत हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वाले कुछ लोगों को सात ‘बैकवर्ड क्लास मुस्लिम’ (BCM) समुदायों में शामिल किया जाता था। इसके बाद संबंधित व्यक्ति शिक्षा और सरकारी नौकरियों में BCM आरक्षण का दावा कर सकता था।
यूथ फॉर इक्वलिटी ने अधिवक्ता श्रुतुंजय भारद्वाज के माध्यम से दाखिल अपनी याचिका में कहा है कि धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी व्यक्ति को नई आरक्षित सामाजिक श्रेणी में शामिल करना गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े करता है।
संगठन इससे पहले महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार और राजस्थान सहित कई राज्यों में आरक्षण से जुड़े मामलों में कानूनी हस्तक्षेप कर चुका है।
धर्म परिवर्तन से नई जाति मिलने पर उठाए सवाल
याचिका में दावा किया गया है कि तमिलनाडु के आदेश के तहत हिंदू बीसी, एमबीसी, डीएनसी, एससी या एसटी समुदाय से आने वाला व्यक्ति इस्लाम अपनाने के बाद एक अलग मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदाय का प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकता है।
YFE का तर्क है कि सामाजिक पिछड़ेपन और आरक्षण की पात्रता का निर्धारण संवैधानिक प्रक्रिया, सामाजिक अध्ययन और सरकारी जांच के आधार पर होना चाहिए। केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी व्यक्ति को नई जाति या आरक्षित वर्ग में शामिल नहीं किया जा सकता।
संगठन के अनुसार, आरक्षण का उद्देश्य लंबे समय से चली आ रही सामाजिक और शैक्षणिक असमानताओं को दूर करना है। इसलिए सरकार किसी प्रशासनिक आदेश के माध्यम से नई जातीय पहचान बनाकर आरक्षण का लाभ नहीं दे सकती।
जमात की भूमिका पर भी जताई आपत्ति
याचिका में उस व्यवस्था पर भी सवाल उठाया गया है, जिसमें कथित तौर पर किसी धार्मिक संस्था या जमात की अनुशंसा के आधार पर धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को मुस्लिम समुदाय की किसी विशेष जाति या श्रेणी में शामिल किया जाता है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि जाति, सामाजिक पिछड़ेपन और आरक्षण की पात्रता तय करना सरकार और संवैधानिक संस्थाओं का काम है। इसे किसी निजी या गैर-सांविधिक धार्मिक संस्था को नहीं सौंपा जा सकता।
YFE ने अदालत से आग्रह किया है कि ऐसी किसी भी व्यवस्था की संवैधानिक वैधता की समीक्षा की जानी चाहिए, जिसमें धार्मिक संस्था की अनुशंसा आरक्षण प्रमाणपत्र का आधार बनती हो।
धर्म परिवर्तन को आर्थिक प्रोत्साहन मिलने का दावा
याचिका में यह भी दावा किया गया है कि धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण का लाभ मिलने से लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से धर्म बदलने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है।
अपने तर्क के समर्थन में संगठन ने अलग-अलग आरक्षित श्रेणियों की प्रवेश रैंक और कट-ऑफ का उल्लेख किया है। याचिका के अनुसार, BCM श्रेणी की अंतिम चयनित रैंक 80,758 रही, जबकि सामान्य पिछड़ा वर्ग की अंतिम रैंक 62,857 थी।
संगठन का कहना है कि दोनों श्रेणियों के बीच लगभग 18,000 रैंक का अंतर दर्शाता है कि BCM कोटे में प्रवेश की प्रतिस्पर्धा और कट-ऑफ अलग हो सकते हैं। हालांकि इन आंकड़ों और उनके संदर्भ पर अंतिम निर्णय अदालत में पेश आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर होगा।
आरक्षण और अल्पसंख्यक अधिकारों के दोहरे लाभ का मुद्दा
YFE ने याचिका में कहा है कि इस्लाम अपनाने वाले व्यक्ति को केवल शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का दावा करने का अवसर ही नहीं मिलता, बल्कि वह धार्मिक अल्पसंख्यकों को मिलने वाले संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों का भी लाभ उठा सकता है।
इसमें संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत अल्पसंख्यकों को अपनी शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित और संचालित करने के अधिकार भी शामिल हैं।
संगठन का तर्क है कि धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण और अल्पसंख्यक अधिकारों का एक साथ लाभ मिलना समानता और आरक्षण व्यवस्था के मूल उद्देश्य की न्यायिक समीक्षा की मांग करता है।
सुप्रीम कोर्ट से मद्रास हाई कोर्ट का फैसला बरकरार रखने की मांग
यूथ फॉर इक्वलिटी ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि मद्रास हाई कोर्ट के 25 जून 2026 के फैसले को बरकरार रखा जाए। संगठन का कहना है कि किसी व्यक्ति को केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर OBC या BCM आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
अब सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि याचिका में उठाए गए संवैधानिक सवालों पर विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता है या नहीं। अदालत का निर्णय धर्म परिवर्तन, जातिगत पहचान, सामाजिक पिछड़ेपन और आरक्षण नीति से जुड़े मामलों पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
हमारी यूट्यूब चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करे
Like, Share and Subscribe our YouTube channel