संसद के दोनों सदनों से ‘वंदे मातरम् बिल’ पास होने के बाद देश में इसे लेकर राजनीतिक और धार्मिक बहस तेज हो गई है। आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 नामक यह बिल राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान कानूनी संरक्षण देने का प्रावधान करता है।
राज्यसभा ने 29 जुलाई 2026 और लोकसभा ने 30 जुलाई 2026 को विधेयक को मंजूरी दी। संसद से पारित होने के बाद अब इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा। राष्ट्रपति की मंजूरी और आधिकारिक अधिसूचना के बाद ही संशोधन कानून के रूप में प्रभावी होगा।
मुस्लिम संगठनों ने बिल पर क्या कहा?
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड यानी AIMPLB और जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने बिल के संभावित प्रभावों को लेकर आपत्ति जताई है। मुस्लिम संगठनों का कहना है कि देश और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान सभी नागरिकों का कर्तव्य है, लेकिन किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध कोई गीत गाने या धार्मिक भाव से स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।
AIMPLB ने अपने बयान में बिल को धार्मिक और संवैधानिक स्वतंत्रता से जोड़ते हुए कहा कि देशभक्ति की किसी विशेष अभिव्यक्ति को कानूनी बाध्यता में बदलना उचित नहीं होगा। बोर्ड का तर्क है कि इस्लामी आस्था में इबादत केवल अल्लाह की की जाती है और देश को देवी या आराध्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।3
वंदे मातरम् बिल: संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ, चुनावी राजनीति तथा जनता के मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश।
हमें किसी के "वंदे मातरम्" पढ़ने या गाने से कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है और अपनी इबादत में किसी दूसरे को साझी नहीं ठहरा…
— Arshad Madani (@ArshadMadani007) July 31, 2026
अरशद मदनी ने धार्मिक स्वतंत्रता का उठाया मुद्दा
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि मुसलमानों को किसी अन्य नागरिक द्वारा वंदे मातरम् गाए जाने से आपत्ति नहीं है। उनकी आपत्ति इसके उन हिस्सों को लेकर है, जिनकी व्याख्या मातृभूमि को देवी के रूप में प्रस्तुत करने के तौर पर की जाती है।
मदनी के अनुसार:
“मुसलमान सिर्फ एक अल्लाह की इबादत करता है और अपनी इबादत में किसी दूसरे को शरीक नहीं कर सकता।”
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लेख करते हुए धार्मिक स्वतंत्रता और अंतःकरण की आजादी की बात कही। साथ ही अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देते हुए कहा कि किसी नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विपरीत कोई गीत, नारा या विचार अपनाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
वंदे मातरम् बिल में क्या प्रावधान हैं?
विधेयक वर्ष 1971 के राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम की धारा 3 में संशोधन करता है। मौजूदा कानून राष्ट्रगान के गायन को जानबूझकर रोकने या राष्ट्रगान गा रही सभा में व्यवधान उत्पन्न करने को दंडनीय बनाता है। संशोधन विधेयक इसी कानूनी सुरक्षा को राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ तक विस्तारित करता है।
प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं:
- वंदे मातरम् के गायन को जानबूझकर रोकना अपराध माना जाएगा।
- वंदे मातरम् गा रही किसी सभा में जानबूझकर व्यवधान उत्पन्न करना दंडनीय होगा।
- दोषी पाए जाने पर अधिकतम तीन वर्ष की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
- दूसरी और उसके बाद की प्रत्येक दोषसिद्धि में कम-से-कम एक वर्ष की जेल का प्रावधान है।
क्या वंदे मातरम् गाना अनिवार्य होगा?
बिल के मूल प्रावधानों में प्रत्येक नागरिक के लिए वंदे मातरम् गाना अनिवार्य करने की बात नहीं कही गई है। यह विधेयक मुख्य रूप से राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकने या गायन के दौरान व्यवधान उत्पन्न करने पर कार्रवाई का प्रावधान करता है।
यानी किसी व्यक्ति के गीत न गाने और किसी सभा को गीत गाने से रोकने के बीच कानूनी अंतर होगा। इसके बावजूद विरोध करने वाले संगठनों को आशंका है कि कानून की व्यापक व्याख्या के कारण भविष्य में नागरिकों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जा सकता है।
सरकार ने बिल लाने की क्या वजह बताई?
विधेयक के उद्देश्यों और कारणों में कहा गया है कि स्वतंत्रता आंदोलन में ‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक भूमिका रही है। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि वंदे मातरम् को ‘जन गण मन’ के समान सम्मान दिया जाएगा।
सरकार का तर्क है कि राष्ट्रगान को कानून में विशेष सुरक्षा प्राप्त है, लेकिन राष्ट्रीय गीत के गायन में जानबूझकर बाधा डालने के खिलाफ स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं था। इसी अंतर को समाप्त करने के लिए संशोधन लाया गया है।
विरोध करने वालों का क्या तर्क है?
बिल का विरोध करने वाले नेताओं और संगठनों ने मुख्य रूप से तीन सवाल उठाए हैं।
पहला, उनका कहना है कि राष्ट्रीय गीत के सम्मान और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
दूसरा, उन्हें आशंका है कि कानून का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को वंदे मातरम् गाने के लिए बाध्य करने या उसके देशप्रेम पर सवाल उठाने के लिए किया जा सकता है।
तीसरा, विरोधियों का कहना है कि बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याओं और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों के बीच संसद को आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
कुछ विपक्षी दलों ने यह भी तर्क दिया कि मौजूदा कानून राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के लिए पर्याप्त हैं और नया संशोधन अनावश्यक राजनीतिक एवं सामाजिक विवाद पैदा कर सकता है।
बिल के समर्थकों का पक्ष
विधेयक के समर्थकों का कहना है कि इसका उद्देश्य किसी नागरिक पर गीत थोपना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर बाधित करने से रोकना है। समर्थकों के अनुसार वंदे मातरम् भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है, इसलिए उसे राष्ट्रगान के समान कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए।
उनका कहना है कि धार्मिक आस्था और राष्ट्रीय प्रतीक के सम्मान को एक-दूसरे के विरोध में नहीं देखा जाना चाहिए।
आगे क्या होगा?
संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद विधेयक अब राष्ट्रपति की स्वीकृति का इंतजार कर रहा है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और सरकारी अधिसूचना के बाद यह कानून बन जाएगा।
हालांकि, कानून लागू होने के बाद इसकी व्याख्या, नियमों और संभावित न्यायिक समीक्षा पर भी नजर रहेगी। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सरकार, विपक्ष और धार्मिक संगठनों के बीच राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है।
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