भारत में 26/11 मुंबई आतंकी हमले के छह पाकिस्तान-स्थित आरोपियों के खिलाफ Trial in Absentia यानी आरोपी की गैरमौजूदगी में मुकदमा चलाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इनमें लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े हाफिज सईद और जकी-उर-रहमान लखवी भी शामिल हैं। मुंबई पुलिस ने इस संबंध में विशेष लोक अभियोजक से प्रक्रिया आगे बढ़ाने को कहा है। रिपोर्ट के मुताबिक यह BNSS लागू होने के बाद किसी आतंकी मामले में ट्रायल इन एब्सेंशिया की पहली प्रक्रिया होगी।
26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमलों में 166 लोगों की जान गई थी। भारतीय जांच एजेंसियों के मुताबिक पाकिस्तान में मौजूद कई आरोपी हमले की साजिश, आतंकियों की ट्रेनिंग और ऑपरेशन को नियंत्रित करने में शामिल थे। अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (BNSS), 2023 की धारा 356 के तहत ऐसे घोषित अपराधियों के खिलाफ उनकी अनुपस्थिति में भी मुकदमा आगे बढ़ाया जा सकता है और अदालत फैसला भी सुना सकती है।
किन 6 आरोपियों के खिलाफ शुरू हुई प्रक्रिया?
विशेष अदालत ने जिन छह आरोपियों के खिलाफ घोषणा की है, उनमें हाफिज सईद, जकी-उर-रहमान लखवी, साजिद मीर, अबू अलकामा, असीम उर्फ अबू काहफा और मेजर अब्दुर रहमान पाशा शामिल हैं। भारतीय एजेंसियों के अनुसार ये सभी 26/11 हमले की साजिश और उसे अंजाम देने से जुड़े रहे हैं।
मुंबई पुलिस कमिश्नर ने विशेष लोक अभियोजक को ट्रायल इन एब्सेंशिया की कार्यवाही शुरू करने के लिए पत्र लिखा है। अभियोजन पक्ष का कहना है कि इन फरार आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं और उनके भारत की अदालत में उपस्थित नहीं होने के कारण मामले को अनिश्चितकाल तक रोका नहीं जाना चाहिए।
क्या होता है Trial in Absentia?
Trial in Absentia का अर्थ है ऐसा आपराधिक मुकदमा, जिसमें आरोपी अदालत के सामने शारीरिक रूप से मौजूद न होने के बावजूद कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाती है। यह हर गैरहाजिर आरोपी पर स्वतः लागू नहीं होता। BNSS की धारा 356 विशेष रूप से उस व्यक्ति के लिए व्यवस्था करती है जिसे अदालत proclaimed offender घोषित कर चुकी हो, जो मुकदमे से बचने के लिए फरार हो और जिसकी जल्द गिरफ्तारी की संभावना न हो।
ऐसी स्थिति में अदालत लिखित कारण दर्ज करते हुए यह मान सकती है कि आरोपी ने व्यक्तिगत रूप से मुकदमे में उपस्थित रहने के अपने अधिकार का त्याग किया है। इसके बाद मुकदमा उसी तरह आगे बढ़ सकता है जैसे आरोपी अदालत में मौजूद हो और अंत में फैसला भी सुनाया जा सकता है।
आरोपी के बिना कैसे शुरू होगा ट्रायल?
BNSS की धारा 356 के तहत अदालत को कई सुरक्षा उपायों का पालन करना होता है। आरोपी के खिलाफ कम से कम दो लगातार गिरफ्तारी वारंट जारी किए जाने चाहिए और दोनों वारंट के बीच कम से कम 30 दिनों का अंतर होना चाहिए। इसके बाद आरोपी के अंतिम ज्ञात पते वाले क्षेत्र में प्रसारित राष्ट्रीय या स्थानीय समाचार पत्र में नोटिस प्रकाशित किया जाता है।
इस नोटिस में आरोपी को अदालत में पेश होने के लिए कहा जाता है और यह भी बताया जाता है कि नोटिस के प्रकाशन के 30 दिनों के भीतर उपस्थित नहीं होने पर उसके बिना मुकदमा शुरू किया जा सकता है। उसके रिश्तेदार या मित्र को, जहां संभव हो, मुकदमे की जानकारी देने तथा उसके आवास और संबंधित पुलिस स्टेशन पर सूचना चस्पा करने का भी प्रावधान है।
एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु यह भी है कि चार्ज फ्रेम होने की तारीख से 90 दिन पूरे होने से पहले अदालत धारा 356 के तहत ट्रायल शुरू नहीं कर सकती। इसलिए केवल “नोटिस जारी होने के 90 दिन बाद ट्रायल” कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा।
आरोपी की तरफ से कौन करेगा पैरवी?
कानून आरोपी को पूरी तरह बिना बचाव के छोड़ने की अनुमति नहीं देता। यदि proclaimed offender की ओर से कोई वकील मौजूद नहीं है, तो अदालत राज्य के खर्च पर उसके बचाव के लिए अधिवक्ता उपलब्ध कराएगी। वह अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों का परीक्षण कर सकता है और कानूनी प्रक्रिया में आरोपी के हितों का प्रतिनिधित्व करेगा।
गवाहों की गवाही और पूछताछ को जहां तक संभव हो ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से रिकॉर्ड करने का भी प्रावधान किया गया है। यदि आरोपी मुकदमे के दौरान गिरफ्तार होकर अदालत में पेश हो जाता है, तो अदालत न्यायहित में उसे उसकी अनुपस्थिति में दर्ज कुछ साक्ष्यों की जांच या चुनौती देने की अनुमति दे सकती है।
क्या आरोपी की गैरमौजूदगी में सजा भी सुनाई जा सकती है?
हां। यही BNSS की नई व्यवस्था का सबसे बड़ा बदलाव है। धारा 356 अदालत को आरोपी की अनुपस्थिति में केवल गवाही दर्ज करने तक सीमित नहीं करती, बल्कि आवश्यक कानूनी शर्तें पूरी होने पर पूरा ट्रायल चलाने और फैसला सुनाने की अनुमति देती है।
हालांकि ऐसा फैसला सामान्य आपराधिक मुकदमों की तरह कानूनी और संवैधानिक कसौटियों से मुक्त नहीं होगा। अदालत को निर्धारित प्रक्रिया, बचाव के अधिकार और उपलब्ध साक्ष्यों का ध्यान रखते हुए ही निर्णय लेना होगा।
पुराने CrPC में क्या था प्रावधान?
पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 299 के तहत यदि आरोपी फरार हो और उसकी तत्काल गिरफ्तारी की संभावना न हो, तो अदालत उसकी अनुपस्थिति में अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान दर्ज कर सकती थी। लेकिन यह अपने आप में पूर्ण ट्रायल और अंतिम सजा सुनाने का व्यापक प्रावधान नहीं था।
इस व्यवस्था का उद्देश्य महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही सुरक्षित रखना था, ताकि आरोपी वर्षों बाद गिरफ्तार हो तो गवाह की मृत्यु, बीमारी या अनुपलब्धता के कारण मुकदमा कमजोर न हो जाए।
BNSS की धारा 356 ने इससे आगे जाकर proclaimed offender के खिलाफ निर्धारित शर्तों के बाद मुकदमे और निर्णय दोनों को उसकी अनुपस्थिति में आगे बढ़ाने का ढांचा तैयार किया है।
क्या यह भारत में पहला Trial in Absentia है?
इसे पूरे भारत का “पहला Trial in Absentia” कहना सावधानी के बिना सही नहीं होगा। नवंबर 2025 में दिल्ली की एक अदालत ने BNSS के तहत एक हत्या मामले में फरार आरोपी के खिलाफ उसकी अनुपस्थिति में आरोप तय किए थे। मौजूदा 26/11 प्रक्रिया को रिपोर्ट में BNSS लागू होने के बाद आतंकवाद के किसी मामले में पहला इन-एब्सेंशिया ट्रायल बताया गया है।
26/11 केस में क्यों अहम है यह कदम?
मुंबई हमले के कई आरोपी वर्षों से भारत की पहुंच से बाहर हैं। पुलिस के मुताबिक 26/11 मामले में इन छह आरोपियों के खिलाफ अदालत proclamation जारी कर चुकी है। हाफिज सईद, लखवी, साजिद मीर और अन्य के खिलाफ भारत लंबे समय से कानूनी कार्रवाई और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की कोशिश करता रहा है।
नई व्यवस्था का व्यावहारिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी आरोपी का फरार रहना ही मुकदमे को अनिश्चितकाल तक रोकने का कारण न बन जाए। इससे पीड़ितों से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ाने का रास्ता खुलता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या हो सकता है असर?
अदालत द्वारा विधिवत प्रक्रिया पूरी कर फैसला दिए जाने से भारत को भविष्य में संबंधित आरोपियों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कानूनी और प्रत्यर्पण प्रयासों में अतिरिक्त न्यायिक रिकॉर्ड मिल सकता है। हालांकि किसी व्यक्ति का प्रत्यर्पण या दूसरे देश से उसकी हिरासत हासिल करना उस देश के कानून, द्विपक्षीय समझौतों, उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
मौजूदा कदम का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सीमा पार मौजूद या लंबे समय से फरार घोषित आरोपी केवल अपनी अनुपस्थिति के आधार पर भारतीय आपराधिक मुकदमे को हमेशा के लिए रोक नहीं सकेंगे।
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