एलन मस्क की कंपनी Starlink ने भारत में अपनी सैटेलाइट कम्युनिकेशन सेवाओं का दायरा बढ़ाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है। Economic Times की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, स्टारलिंक ने भारतीय अंतरिक्ष नियामक IN-SPACe के सामने अपने Gen-2 सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन के लिए दोबारा आवेदन किया है। इस नेटवर्क की सबसे अहम खासियत Direct-to-Device (D2D) या Direct-to-Cell कनेक्टिविटी है, जिसके जरिए भविष्य में सामान्य मोबाइल फोन सीधे सैटेलाइट नेटवर्क से जुड़ सकेंगे।
हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि D2D तकनीक का मतलब यह नहीं है कि स्टारलिंक की मौजूदा हाई-स्पीड होम ब्रॉडबैंड सेवा के लिए इस्तेमाल होने वाली डिश हर परिस्थिति में तुरंत खत्म हो जाएगी। D2D मुख्य रूप से मोबाइल उपकरणों को सैटेलाइट से सीधे जोड़ने की तकनीक है। इसका इस्तेमाल नेटवर्क से बाहर वाले इलाकों में मैसेजिंग, कॉलिंग और निर्धारित मोबाइल डेटा सेवाओं के लिए किया जा सकता है। स्टारलिंक भी भारत के भावी सैटेलाइट कम्युनिकेशन फ्रेमवर्क में D2D सेवाओं को अनुमति देने की मांग कर चुका है।
करीब 30 हजार सैटेलाइट वाले Gen-2 नेटवर्क के लिए आवेदन
रिपोर्ट के अनुसार, स्टारलिंक का नया आवेदन उसके विशाल Gen-2 नेटवर्क से जुड़ा है, जिसमें लगभग 30,000 लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट्स प्रस्तावित हैं। SpaceX के Gen-2 कॉन्स्टेलेशन की अंतरराष्ट्रीय योजना करीब 29,988 सैटेलाइट तक की रही है। इन्हें विभिन्न लो-अर्थ ऑर्बिट शेल्स में स्थापित करने की योजना बनाई गई है।
अमेरिकी नियामक FCC के दस्तावेजों के मुताबिक भी SpaceX के Gen-2 नेटवर्क के विभिन्न हिस्सों को चरणबद्ध तरीके से मंजूरी दी गई है। स्टारलिंक वर्तमान में अपने कई सैटेलाइट्स को कम ऊंचाई वाली कक्षाओं में संचालित करने की रणनीति पर भी काम कर रहा है।
क्या है Direct-to-Device यानी D2D तकनीक?
D2D ऐसी सैटेलाइट तकनीक है जिसमें संगत मोबाइल फोन जमीन पर मौजूद पारंपरिक मोबाइल टावर की बजाय अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट से सीधे संपर्क कर सकता है।
इसका सबसे बड़ा फायदा उन इलाकों में हो सकता है जहां मोबाइल टावर नहीं हैं या प्राकृतिक आपदा के कारण स्थानीय नेटवर्क ठप हो गया है। पहाड़ों, जंगलों, समुद्री क्षेत्रों, सीमावर्ती इलाकों और दूरदराज के गांवों में यह तकनीक संचार का वैकल्पिक माध्यम बन सकती है।
स्टारलिंक ने TRAI के सामने अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया में कहा है कि सैटेलाइट आधारित D2D सेवाओं को IMT स्पेक्ट्रम के जरिए अनुमति देने से कनेक्टिविटी विस्तार, आपदा प्रबंधन और इमरजेंसी कम्युनिकेशन में फायदा हो सकता है।
मोबाइल टावरों की पहुंच से बाहर भी मिल सकता है नेटवर्क
यदि भारत में D2D सेवाओं को नियामकीय मंजूरी मिलती है, तो भविष्य में सैटेलाइट मोबाइल नेटवर्क ऐसे इलाकों तक पहुंच सकता है जहां परंपरागत टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करना मुश्किल या महंगा है।
हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि D2D आते ही देशभर में मोबाइल टावरों की जरूरत पूरी तरह खत्म हो जाएगी। शहरों और ज्यादा ट्रैफिक वाले क्षेत्रों में पारंपरिक 4G और 5G नेटवर्क अपनी अधिक क्षमता, कम लेटेंसी और घनी कवरेज के कारण अहम बने रहेंगे। सैटेलाइट D2D को फिलहाल मुख्य रूप से स्थलीय नेटवर्क के पूरक के तौर पर देखा जा रहा है।
भारत में D2D नियमों को लेकर चल रही नियामकीय प्रक्रिया
भारत में सैटेलाइट कम्युनिकेशन के लिए नियामकीय ढांचा तेजी से विकसित हो रहा है। TRAI ने 8 अप्रैल 2026 को Satellite Communication Network Authorisation और सैटेलाइट नेटवर्क ऑपरेटरों को स्पेक्ट्रम देने के ढांचे पर एक Consultation Paper जारी किया था। इस पर Starlink, Airtel, Vodafone Idea, BSNL समेत कई कंपनियों और संगठनों ने अपनी राय दी है।
इस प्रक्रिया में D2D सेवाओं के लिए मोबाइल स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल, सैटेलाइट ऑपरेटरों को स्पेक्ट्रम देने के तरीके और टेलीकॉम तथा सैटेलाइट कंपनियों के बीच नियामकीय संतुलन जैसे मुद्दे अहम हैं।
Starlink ने D2D के लिए TRAI से क्या कहा?
Starlink India ने मई 2026 में TRAI को दिए अपने आधिकारिक Counter Comments में साफ तौर पर कहा था कि IMT Spectrum का इस्तेमाल कर Satellite D2D सेवाओं को अनुमति दी जानी चाहिए।
कंपनी का तर्क है कि इससे दूरदराज के क्षेत्रों में कनेक्टिविटी बढ़ाने के साथ आपदा और आपातकालीन परिस्थितियों में भी संचार सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। स्टारलिंक ने स्पेक्ट्रम इस्तेमाल में लचीले नियमों की भी पैरवी की है।
Jio और OneWeb समेत दूसरी कंपनियों से बढ़ेगा मुकाबला
भारत का सैटेलाइट इंटरनेट बाजार आने वाले वर्षों में बेहद प्रतिस्पर्धी हो सकता है। स्टारलिंक के अलावा Jio Satellite Communications और OneWeb India जैसे ऑपरेटर भी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। TRAI की सैटेलाइट स्पेक्ट्रम संबंधी परामर्श प्रक्रियाओं में इन कंपनियों की भागीदारी भी रही है।
अगर स्टारलिंक को Gen-2 और D2D के लिए जरूरी अनुमतियां मिल जाती हैं, तो खासकर डायरेक्ट-टू-मोबाइल सैटेलाइट सेवाओं के क्षेत्र में कंपनी को तकनीकी बढ़त मिल सकती है। हालांकि बाजार में वास्तविक बढ़त इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार किन स्पेक्ट्रम बैंड्स को मंजूरी देती है, लाइसेंस की शर्तें क्या रहती हैं और व्यावसायिक सेवा कब शुरू होती है।
स्पेक्ट्रम की कीमत भी बड़ा मुद्दा
भारत में सैटेलाइट सेवा शुरू करने के लिए केवल अंतरिक्ष संबंधी अनुमति पर्याप्त नहीं है। कंपनियों को टेलीकॉम और सुरक्षा से संबंधित अनुमति तथा आवश्यक स्पेक्ट्रम असाइनमेंट भी चाहिए।
TRAI ने मई 2025 में कुछ सैटेलाइट आधारित कमर्शियल कम्युनिकेशन सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम असाइनमेंट की शर्तों पर अपनी सिफारिशें दी थीं। इसके बाद 2026 में सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क के लिए नए ऑथराइजेशन और स्पेक्ट्रम फ्रेमवर्क पर अलग परामर्श प्रक्रिया भी शुरू हुई।
इसलिए स्टारलिंक समेत किसी भी कंपनी की भारत में बड़े पैमाने पर कमर्शियल लॉन्च की टाइमलाइन अंतिम सरकारी नियमों और स्पेक्ट्रम आवंटन से जुड़ी रहेगी।
टेलीकॉम कंपनियों की क्यों बढ़ी चिंता?
D2D तकनीक पारंपरिक टेलीकॉम सेक्टर के लिए भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है। मौजूदा मोबाइल कंपनियां चाहती हैं कि सैटेलाइट आधारित मोबाइल सेवाओं के लिए ऐसा नियामकीय ढांचा बने जिसमें स्पेक्ट्रम उपयोग, लाइसेंसिंग और प्रतिस्पर्धा को लेकर समान अवसर सुनिश्चित हों।
TRAI के अप्रैल 2026 के Consultation Paper पर Airtel, Vodafone Idea, BSNL, Starlink और विभिन्न सैटेलाइट एवं टेलीकॉम संगठनों की प्रतिक्रियाएं यह दिखाती हैं कि भविष्य के नियमों को लेकर उद्योग स्तर पर व्यापक चर्चा जारी है।
राष्ट्रीय सुरक्षा भी सरकार की प्राथमिकता
सैटेलाइट नेटवर्क की प्रकृति को देखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा भारत सरकार के लिए बेहद अहम विषय है। सैटेलाइट कम्युनिकेशन सेवाओं को निर्धारित लाइसेंसिंग, सुरक्षा और तकनीकी शर्तों का पालन करना होगा।
विशेष रूप से ऐसी तकनीक जिसमें मोबाइल फोन सीधे अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट से जुड़ सकता है, उसमें नेटवर्क नियंत्रण, इंटरसेप्शन से जुड़े कानूनी प्रावधान, उपयोगकर्ता सत्यापन और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की आवश्यकताओं जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
क्या भारत में बिना मोबाइल नेटवर्क के फोन चलेगा?
तकनीकी रूप से D2D का उद्देश्य यही है कि मोबाइल टावर की कवरेज उपलब्ध नहीं होने पर भी एक संगत फोन सैटेलाइट के जरिए संचार कर सके। लेकिन भारत में इसके इस्तेमाल का वास्तविक स्वरूप सरकार द्वारा निर्धारित नियमों, उपलब्ध स्पेक्ट्रम, डिवाइस सपोर्ट और ऑपरेटर पार्टनरशिप पर निर्भर करेगा।
इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि स्टारलिंक की मंजूरी मिलते ही हर स्मार्टफोन पर बिना किसी बदलाव के हाई-स्पीड सैटेलाइट इंटरनेट चलने लगेगा।
Starlink के लिए भारत क्यों है महत्वपूर्ण?
भारत दुनिया के सबसे बड़े मोबाइल और इंटरनेट बाजारों में शामिल है। देश में बड़ी ग्रामीण आबादी, पर्वतीय क्षेत्र, द्वीप, समुद्री इलाके और ऐसे अनेक स्थान हैं जहां फाइबर या मोबाइल टावर पहुंचाना चुनौतीपूर्ण है।
ऐसे में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड और D2D तकनीक डिजिटल कनेक्टिविटी का महत्वपूर्ण पूरक बन सकती है। यदि Starlink Gen-2 को सभी जरूरी मंजूरियां मिलती हैं, तो आने वाले समय में भारत का सैटेलाइट इंटरनेट बाजार Starlink, Jio और OneWeb जैसी कंपनियों के बीच बड़े टेक्नोलॉजी मुकाबले का केंद्र बन सकता है।
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