राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम्’ को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक टकराव और तेज हो गया है। कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने 19 अगस्त 2026 को अपने 1937 के ऐतिहासिक प्रस्ताव के अनुरूप पार्टी कार्यक्रमों में ‘वन्दे मातरम्’ के केवल पहले दो पद गाने की व्यवस्था जारी रखने का फैसला किया। कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने भी स्पष्ट किया कि पार्टी अपने कार्यक्रमों में पहले दो पदों का ही गायन करेगी।
इसके जवाब में भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के फैसले की कड़ी निंदा करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया है। भाजपा का कहना है कि ‘वन्दे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति की ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। पार्टी ने पूर्ण ‘वन्दे मातरम्’ के सम्मान और उसकी विरासत को लेकर देशव्यापी जनजागरण अभियान चलाने की बात कही है।
कांग्रेस ने क्यों दोहराया 1937 का प्रस्ताव?
कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में लिए गए अपने निर्णय को आधार बनाते हुए कहा है कि पार्टी के कार्यक्रमों में ‘वन्दे मातरम्’ के प्रथम दो पद ही गाए जाएंगे। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि यह कोई नया फैसला नहीं है, बल्कि पार्टी दशकों से इसी ऐतिहासिक व्यवस्था का पालन करती आई है। कांग्रेस ने इस फैसले को महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नेताओं से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ा है।
वहीं भाजपा ने इस फैसले को राष्ट्रीय गीत की विरासत को सीमित करने वाला कदम बताया है। भाजपा नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस ने राजनीतिक तुष्टीकरण के कारण 1937 की नीति को फिर से स्वीकार किया है। कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि भाजपा राष्ट्रीय गीत जैसे भावनात्मक मुद्दे को राजनीतिक विवाद में बदल रही है।
‘वन्दे मातरम्’ के सम्मान की रक्षा का BJP का संकल्प
भाजपा के प्रस्ताव के अनुसार पार्टी ‘वन्दे मातरम्’ के सम्मान, गरिमा और ऐतिहासिक विरासत की रक्षा को लेकर सार्वजनिक अभियान चलाएगी। भाजपा का कहना है कि राष्ट्रीय गीत को सांप्रदायिक दबाव, राजनीतिक तुष्टीकरण या वोट-बैंक की राजनीति के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए।
पार्टी ने कहा है कि वह जनता के सामने ‘वन्दे मातरम्’ से जुड़े स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास और राजनीतिक घटनाक्रम को भी रखेगी। खास तौर पर युवा पीढ़ी को गीत का इतिहास, अर्थ और स्वतंत्रता संघर्ष में इसकी भूमिका बताने के लिए कार्यक्रम आयोजित करने की योजना है।
भाजपा के अनुसार ‘वन्दे मातरम्’ के साथ स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष, बलिदान और राष्ट्र-जागरण की गहरी स्मृतियां जुड़ी हुई हैं और इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाना चाहिए।
2026 के कानून का भी दिया हवाला
इस विवाद के बीच वर्ष 2026 में राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में हुआ संशोधन भी महत्वपूर्ण है। Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Act, 2026 में राष्ट्रीय गीत को भी कानून के दायरे में शामिल किया गया है। संशोधित कानून के अनुसार जानबूझकर राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकना या गायन कर रही सभा में व्यवधान पैदा करना दंडनीय अपराध है। आधिकारिक गजट के अनुसार इस कानून को 6 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी।
इसका अर्थ यह है कि कानून ‘वन्दे मातरम्’ के गायन को जानबूझकर रोकने या उसमें बाधा डालने के खिलाफ वैधानिक सुरक्षा देता है। हालांकि कांग्रेस के पार्टी कार्यक्रमों में कितने पद गाए जाएं, इसे लेकर मौजूदा राजनीतिक विवाद मुख्य रूप से दोनों दलों की अलग-अलग ऐतिहासिक और राजनीतिक व्याख्याओं से जुड़ा हुआ है।
महात्मा गांधी के विचारों को भी आगे रखेगी भाजपा
भाजपा ने अपने प्रस्ताव में महात्मा गांधी के ‘वन्दे मातरम्’ को लेकर दिए गए ऐतिहासिक विचारों का उल्लेख करने की बात कही है। गांधी ने 1939 में ‘हरिजन’ में ‘वन्दे मातरम्’ को औपनिवेशिक शासन के खिलाफ एक प्रभावशाली पुकार बताते हुए उससे अपनी गहरी राष्ट्रीय भावना जुड़ी होने की बात कही थी। ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि गांधी ने गीत के राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान की प्रशंसा के साथ-साथ बाद में इससे जुड़े सांप्रदायिक विवादों को लेकर सावधानी की भी बात की थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संसद में ‘वन्दे मातरम्’ पर विशेष चर्चा के दौरान गांधी के 1905 के लेखन का हवाला देते हुए कहा था कि यह गीत स्वदेशी आंदोलन के दौरान देशभक्ति जगाने का शक्तिशाली माध्यम बना था।
युवाओं तक पहुंचाया जाएगा ‘वन्दे मातरम्’ का इतिहास
भाजपा ने खास तौर पर युवाओं के बीच जागरूकता अभियान चलाने की बात कही है। पार्टी कार्यकर्ताओं के माध्यम से देशभर में कार्यक्रम आयोजित कर गीत की रचना, स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका और उससे जुड़े ऐतिहासिक प्रसंगों की जानकारी देने की योजना है।
भाजपा का दावा है कि नई पीढ़ी को यह समझाना आवश्यक है कि ‘वन्दे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन में केवल एक गीत नहीं था, बल्कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनभावना और प्रतिरोध की आवाज के रूप में भी उभरा था।
BJP और कांग्रेस आमने-सामने
विवाद अब केवल गीत के कितने पद गाए जाएं, इस प्रश्न तक सीमित नहीं रह गया है। भाजपा इसे राष्ट्रीय गौरव और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस अपने 1937 के फैसले को ऐतिहासिक सहमति और लंबे समय से चली आ रही परंपरा का हिस्सा बता रही है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत कई भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के फैसले की तीखी आलोचना की है। दूसरी तरफ कांग्रेस का कहना है कि पार्टी वही परंपरा जारी रख रही है जिसका पालन कई दशकों से होता आया है।
आने वाले दिनों में भाजपा इस मुद्दे को देशव्यापी अभियान के रूप में जनता के बीच ले जाने की तैयारी कर रही है। पार्टी ने अपने राजनीतिक संदेश में स्वतंत्रता के इतिहास से लेकर 2047 के ‘विकसित भारत’ तक ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करने का संकल्प व्यक्त किया है।
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