धर्म परिवर्तन कर इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने वाले अनुसूचित जाति समुदाय के लोगों को SC आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए या नहीं, इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आ सकता है। पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में गठित आयोग अनुसूचित जातियों की मौजूदा परिभाषा में यथास्थिति बनाए रखने की सिफारिश कर सकता है। यदि ऐसा होता है तो हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अलावा अन्य धर्म अपनाने वाले दलितों को अनुसूचित जाति के आरक्षण के दायरे में शामिल करने की मांग को झटका लग सकता है।
हालांकि, इसे अभी अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। आयोग की रिपोर्ट और उसकी सिफारिशों के बाद केंद्र सरकार के रुख तथा संबंधित न्यायिक प्रक्रिया पर भी निगाह रहेगी।
बालाकृष्णन आयोग को क्या जिम्मेदारी दी गई?
केंद्र सरकार ने पूर्व CJI जस्टिस केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में आयोग का गठन इस सवाल का अध्ययन करने के लिए किया था कि क्या उन लोगों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जा सकता है, जो ऐतिहासिक रूप से SC समुदाय से जुड़े थे लेकिन बाद में हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म में परिवर्तित हो गए।
यह मुद्दा सामाजिक और संवैधानिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसके एक पक्ष का तर्क है कि धर्म बदलने के बाद भी जातिगत भेदभाव और सामाजिक पिछड़ापन समाप्त नहीं होता, जबकि दूसरा पक्ष मौजूदा SC समुदाय के लिए उपलब्ध आरक्षण में नए दावेदार जुड़ने और आरक्षण के मूल आधार को लेकर सवाल उठाता है।
मौजूदा नियम क्या कहते हैं?
राष्ट्रपति (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के मौजूदा प्रावधानों के तहत SC दर्जे से संबंधित धार्मिक पात्रता हिंदू, सिख और बौद्ध समुदायों तक सीमित है। यही कारण है कि ईसाई या मुस्लिम धर्म अपनाने वाले दलित मूल के लोगों को अनुसूचित जाति के लिए निर्धारित आरक्षण का लाभ देने का सवाल लंबे समय से कानूनी और राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है।
रिपोर्टों के अनुसार बालाकृष्णन आयोग मौजूदा व्यवस्था में बदलाव नहीं करने की सिफारिश कर सकता है। अगर यह सिफारिश सामने आती है और मौजूदा व्यवस्था बरकरार रहती है तो धर्म परिवर्तन कर ईसाई या मुस्लिम बने दलित मूल के लोगों को SC आरक्षण के दायरे में शामिल नहीं किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है मामला
धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति का दर्जा बरकरार रखने से जुड़ा विवाद दो दशक से अधिक समय से न्यायिक विमर्श का हिस्सा रहा है। धर्मांतरित दलित समुदायों से जुड़े संगठनों की मांग रही है कि धार्मिक पहचान बदलने मात्र से उनके सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन को समाप्त नहीं माना जाना चाहिए।
दूसरी तरफ इसका विरोध करने वाले वर्गों का कहना है कि अनुसूचित जाति आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था का विस्तार किए जाने से वर्तमान लाभार्थियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है और आरक्षण के उपलब्ध अवसरों पर असर पड़ सकता है।
पुराने आयोगों की सिफारिशों का भी अध्ययन
इस जटिल विषय पर पहले विभिन्न आयोगों और समितियों ने अलग-अलग दृष्टिकोण रखे हैं। बालाकृष्णन आयोग के सामने काका कालेलकर आयोग, सच्चर समिति, रंगनाथ मिश्र आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग से जुड़े पुराने विचार एवं दस्तावेज भी महत्वपूर्ण संदर्भ रहे हैं।
रंगनाथ मिश्र आयोग ने अनुसूचित जाति की पात्रता को धर्म से अलग करने की वकालत की थी। इसके विपरीत विभिन्न अन्य रिपोर्टों और संस्थागत रुख में धर्म परिवर्तन के बाद SC दर्जे को लेकर अलग दृष्टिकोण सामने आया है। इन्हीं परस्पर विरोधी विचारों के कारण यह मुद्दा वर्षों से विवाद और बहस का विषय बना हुआ है।
धर्म परिवर्तन के बाद सामाजिक स्थिति भी बड़ा सवाल
इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या धर्म परिवर्तन के बाद किसी व्यक्ति के साथ होने वाला जातिगत भेदभाव और सामाजिक पिछड़ापन समाप्त हो जाता है। SC दर्जे के विस्तार का समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि धर्म बदलने के बावजूद कई समुदायों को सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है।
वहीं विरोध करने वालों का तर्क है कि अनुसूचित जाति की संवैधानिक व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मौजूदा लाभार्थियों के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए इसमें बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। इसी कारण आयोग के लिए सामाजिक, ऐतिहासिक और संवैधानिक पहलुओं के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है।
ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों में क्यों अहम है मुद्दा?
धर्मांतरण और आरक्षण से जुड़ी राजनीति विशेष रूप से उन राज्यों में संवेदनशील रही है जहां अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की बड़ी आबादी रहती है। ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों में धर्मांतरण से जुड़े सवाल पहले भी राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा बनते रहे हैं।
यदि आयोग अनुसूचित जातियों की मौजूदा धार्मिक पात्रता में बदलाव नहीं करने की सिफारिश करता है तो इसका असर राष्ट्रीय स्तर की राजनीति के साथ उन राज्यों में भी दिखाई दे सकता है जहां धर्मांतरण एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा है।
आयोग की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
बालाकृष्णन आयोग की अंतिम सिफारिश इस बहस में बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। यदि आयोग यथास्थिति बनाए रखने का सुझाव देता है तो हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से बाहर धर्म परिवर्तन करने वाले दलित मूल के लोगों को SC आरक्षण देने की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की संभावना कम हो सकती है।
हालांकि आयोग की संभावित सिफारिश और अंतिम सरकारी या न्यायिक निर्णय में अंतर है। इसलिए रिपोर्ट औपचारिक रूप से सामने आने और सरकार द्वारा उस पर रुख स्पष्ट किए जाने के बाद ही यह कहा जा सकेगा कि धर्मांतरित दलितों के SC दर्जे और आरक्षण को लेकर आगे क्या व्यवस्था होगी।
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