सुप्रीम कोर्ट ने धरना-प्रदर्शन और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। मंगलवार, 3 नवंबर 2026 को एक मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि विरोध प्रदर्शन करना संवैधानिक अधिकार है, लेकिन व्यापार करना और आजीविका कमाना भी संवैधानिक संरक्षण प्राप्त अधिकार हैं। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी प्रदर्शनकारी समूह किसी सार्वजनिक प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकाल तक कब्जा करके नहीं बैठ सकता। अदालत ने कहा कि प्रदर्शन का अधिकार सभी नागरिकों को है और किसी एक संगठन को लंबे समय तक किसी स्थान पर कब्जा करके दूसरों के अधिकारों को सीमित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। सुनवाई के दौरान वकीलों के बीच तीखी बहस होने पर सीजेआई सूर्यकांत नाराज हो गए और उन्होंने अदालत को मछली बाजार की तरह नहीं बनाने की हिदायत दी।
धरना-प्रदर्शन के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार से जुड़े विरोध प्रदर्शनों और उनसे संबंधित अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई हुई। इन याचिकाओं में प्रदर्शनकारियों के अधिकार, पुलिस कार्रवाई, सार्वजनिक आवागमन, व्यापारियों को होने वाली परेशानी और प्रदर्शन स्थल के उपयोग जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए।
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ अन्य नागरिकों के अधिकारों का भी सम्मान किया जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि प्रदर्शनकारियों के अधिकारों के साथ व्यापारियों, दिहाड़ी मजदूरों और आम नागरिकों की आजीविका का सवाल भी जुड़ा हुआ है।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी एक समूह के प्रदर्शन के कारण अन्य नागरिकों के अधिकारों पर अनावश्यक प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए।
विरोध करना भी अधिकार, व्यापार करना भी अधिकार: CJI सूर्यकांत
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अदालत के सामने विरोधाभासी दावे रखे गए हैं। एक तरफ प्रदर्शनकारी अपने संवैधानिक अधिकारों की बात कर रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ व्यापारियों और स्थानीय नागरिकों ने प्रदर्शन के कारण होने वाली परेशानियों का मुद्दा उठाया है।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, सीजेआई ने कहा कि विरोध प्रदर्शन करना संवैधानिक अधिकार है और व्यापार करना तथा कारोबार चलाना भी संवैधानिक संरक्षण प्राप्त अधिकार हैं। उन्होंने विशेष रूप से दिहाड़ी मजदूरों की स्थिति का उल्लेख किया और सवाल उठाया कि यदि प्रदर्शन के कारण किसी मजदूर का काम बंद हो जाता है, तो वह अपनी रोजी-रोटी कमाने कहां जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से स्पष्ट हुआ कि प्रदर्शन के अधिकार और आम नागरिकों की आजीविका के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
SG: They forced the shops to close. There are situations where protests become violent.
Guruswamy: It was not violent.
SG: you are lucky your microphone has not been snatched.
Katju: she has her own microphone.
Adv for petitioners: Along with the fifth category, the lawyers'…
— Bar and Bench (@barandbench) November 3, 2026
प्रदर्शन स्थल पर हमेशा कब्जा नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा कि कोई भी प्रदर्शनकारी समूह सार्वजनिक प्रदर्शन स्थल पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में केवल एक संगठन या समूह को ही विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार नहीं है, बल्कि किसानों, मजदूरों, ट्रेड यूनियनों और अन्य नागरिक संगठनों को भी अपनी मांगों के समर्थन में प्रदर्शन करने का अधिकार है।
सीजेआई ने सवाल उठाया कि यदि एक समूह किसी प्रदर्शन स्थल पर लंबे समय तक कब्जा करके बैठा रहेगा, तो दूसरे संगठन कहां जाकर प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन स्थल का आवंटन एक निश्चित अवधि के लिए होना चाहिए, ताकि अन्य लोगों को भी वहां अपनी बात रखने का अवसर मिल सके। अदालत की टिप्पणी का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों के उपयोग में समान अवसर और विभिन्न नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन सुनिश्चित करना था।
व्यापारियों ने लगाया ₹2,000 करोड़ के नुकसान का आरोप
सुनवाई के दौरान प्रदर्शनकारियों के साथ-साथ व्यापारियों की ओर से भी अदालत में दलीलें रखी गईं। वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और अन्य वकीलों ने व्यापारियों का पक्ष प्रस्तुत किया। रोहतगी ने दावा किया कि लंबे समय तक चले विरोध प्रदर्शनों के कारण व्यापारियों को लगभग 2,000 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ है।
व्यापारियों की ओर से यह भी कहा गया कि प्रदर्शन के कारण बाजारों में सामान्य कारोबारी गतिविधियां प्रभावित हुईं और कई लोगों की आजीविका पर असर पड़ा।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रखे दो पक्ष
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि इस मामले में दो अलग-अलग पक्ष हैं। एक पक्ष प्रदर्शनकारियों का है, जो अपने विरोध प्रदर्शन के अधिकार और पुलिस कार्रवाई से संबंधित शिकायतों को लेकर अदालत पहुंचे हैं।
दूसरी ओर व्यापारियों का पक्ष है, जिन्होंने प्रदर्शन के कारण कारोबार प्रभावित होने और आर्थिक नुकसान होने की शिकायत की है। तुषार मेहता ने आरोप लगाया कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने जबरन दुकानें बंद कराईं और कुछ घटनाओं में हिंसा भी हुई।
वहीं, प्रदर्शनकारियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने इन आरोपों का विरोध करते हुए कहा कि प्रदर्शन के दौरान कोई हिंसा नहीं हुई। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि सभी संबंधित याचिकाओं पर विचार किया जाएगा।
एक दिन की अनुमति लेकर 17 दिन तक प्रदर्शन करने का आरोप
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक प्रदर्शन का उदाहरण देते हुए कहा कि संबंधित राजनीतिक समूह को केवल एक दिन के लिए प्रदर्शन की अनुमति दी गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारी 17 दिन तक उसी स्थान पर डटे रहे।
उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने बिना आवश्यक अनुमति के संसद की ओर मार्च करने का प्रयास किया। तुषार मेहता ने कहा कि संसद केवल एक राजनीतिक इमारत नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता का प्रतीक है। उन्होंने दलील दी कि किसी भी व्यक्ति या समूह को बिना अनुमति संसद परिसर या सुप्रीम कोर्ट में प्रवेश करके प्रदर्शन करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। इस पर अदालत ने सार्वजनिक प्रदर्शन के अधिकार और निर्धारित नियमों के पालन के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया।
पुलिस कार्रवाई और पत्रकारों पर कथित हमलों का मुद्दा भी उठा
सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी गई याचिकाओं में केवल प्रदर्शन स्थल के उपयोग का मामला ही शामिल नहीं था। इनमें पुलिस द्वारा कथित अत्याचार, गैरकानूनी हिरासत, लोगों की आवाजाही रोकने, प्रदर्शन में बाधा डालने, पत्रकारों और वकीलों पर कथित हमले तथा न्यायिक आदेशों के उल्लंघन जैसे गंभीर आरोप भी शामिल थे।
याचिकाकर्ताओं ने इन घटनाओं को नागरिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मामला बताया। अदालत ने संकेत दिया कि संबंधित पक्षों की शिकायतों और दावों पर सुनवाई की जाएगी। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष की जानकारी उपलब्ध विवरण में नहीं दी गई है।
CCTV और प्राइवेसी को लेकर भी हुई बहस
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने प्रदर्शन स्थलों पर सीसीटीवी निगरानी और नागरिकों की निजता से जुड़ा मुद्दा भी उठाया। उन्होंने निगरानी व्यवस्था से संबंधित चिंताओं को अदालत के सामने रखने का प्रयास किया।
वहीं, सरकार की ओर से सीसीटीवी निगरानी का समर्थन किया गया। अदालत ने भी सुरक्षा और घटनाओं का रिकॉर्ड रखने के संदर्भ में सीसीटीवी के महत्व का उल्लेख किया। इस दौरान निजता के अधिकार और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन का सवाल भी चर्चा में रहा।
वकीलों की बहस पर नाराज हुए CJI, कहा- कोर्ट को मछली बाजार न बनाएं
सुनवाई के दौरान एक समय अदालत में मौजूद वकीलों के बीच तीखी बहस होने लगी। कई वकील एक साथ अपनी दलीलें रखने लगे, जिससे न्यायिक कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न हुआ।
इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने नाराजगी जताते हुए वकीलों को अनुशासन बनाए रखने की हिदायत दी। सीजेआई ने सवाल किया कि वकील एक-एक करके अपनी दलीलें क्यों नहीं रख सकते और अदालत में मछली बाजार जैसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि जब अदालत आदेश लिखवा रही हो, तब इस प्रकार की बहस उचित नहीं है। मुख्य न्यायाधीश की इस टिप्पणी के बाद अदालत की कार्यवाही में अनुशासन बनाए रखने का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया।
तीन जजों की बेंच कर रही मामले की सुनवाई
इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच कर रही है। बेंच में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल बताए गए हैं।
मामला अक्टूबर 2026 में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों और उनसे जुड़ी विभिन्न शिकायतों से संबंधित है। अदालत के सामने प्रदर्शनकारियों के संवैधानिक अधिकार, पुलिस की कार्रवाई, व्यापारियों के हित और सार्वजनिक स्थानों के उपयोग से जुड़े सवाल रखे गए हैं।
लोकतंत्र में प्रदर्शन के अधिकार और आजीविका के बीच संतुलन जरूरी
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई में यह महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन के अधिकार का इस्तेमाल करते समय अन्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तथा बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है। इसी अनुच्छेद में पेशा अपनाने, व्यापार करने और व्यवसाय चलाने की स्वतंत्रता का भी प्रावधान है। हालांकि, ये अधिकार संविधान में निर्धारित उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणियों से यह संदेश सामने आया कि किसी एक समूह के विरोध प्रदर्शन के कारण दूसरे नागरिकों की आजीविका और सार्वजनिक सुविधाएं अनिश्चितकाल तक प्रभावित नहीं होनी चाहिए। साथ ही, सार्वजनिक प्रदर्शन स्थलों तक सभी पात्र समूहों की पहुंच सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान विभिन्न पक्षों की दलीलें सुनी हैं। अदालत के अंतिम आदेश और आगे के निर्देशों के आधार पर ही मामले के कानूनी परिणाम स्पष्ट होंगे।
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