भारत के प्रख्यात संविधान विशेषज्ञ, पूर्व लोकसभा महासचिव और पद्म भूषण से सम्मानित Dr. Subhash C. Kashyap का गुरुवार (4 जून 2026) को 97 वर्ष की आयु में निधन हो गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कार्डियो-पल्मोनरी अरेस्ट के कारण उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से भारतीय संसदीय परंपरा, संवैधानिक अध्ययन और सार्वजनिक नीति के क्षेत्र में एक युग का अंत माना जा रहा है।
डॉ. कश्यप को भारतीय संविधान, संसद और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उनके गहन अध्ययन और योगदान के लिए देश-विदेश में विशेष सम्मान प्राप्त था।
संसद से जुड़ा रहा चार दशक का सफर
डॉ. सुभाष कश्यप ने वर्ष 1953 में संसद सचिवालय में अपना कार्यकाल शुरू किया था। करीब 37 वर्षों तक उन्होंने भारतीय संसद से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया।
उन्होंने विशेष रूप से 7वीं, 8वीं और 9वीं लोकसभा के दौरान संसदीय कार्यों के संचालन और संसदीय प्रक्रियाओं को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में वे लोकसभा के महासचिव बने और संसदीय कार्यप्रणाली के प्रमुख विशेषज्ञों में गिने जाने लगे।
संविधान और संसदीय व्यवस्था पर अमूल्य योगदान
डॉ. कश्यप भारतीय संविधान और संसदीय लोकतंत्र के सबसे प्रतिष्ठित विद्वानों में शामिल थे। उन्होंने:
- 100 से अधिक पुस्तकें लिखीं
- 500 से अधिक शोध लेख प्रकाशित किए
- संसदीय प्रक्रियाओं और संवैधानिक विषयों पर व्यापक शोध किया
- अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया
उनकी पुस्तकों और शोध कार्यों को आज भी संविधान और संसदीय अध्ययन के छात्रों, शोधकर्ताओं तथा नीति निर्माताओं द्वारा संदर्भ सामग्री के रूप में उपयोग किया जाता है।
स्वतंत्रता आंदोलन से भी रहा जुड़ाव
उत्तर प्रदेश के Bijnor में जन्मे डॉ. कश्यप ने किशोरावस्था में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान छात्र आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई थी। बताया जाता है कि उन्होंने बिजनौर और मेरठ क्षेत्र में छात्रों को संगठित कर स्थानीय स्तर पर स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अभियानों का नेतृत्व किया था।
देश-विदेश में प्राप्त की उच्च शिक्षा
डॉ. कश्यप ने University of Allahabad सहित भारत और विदेश के प्रतिष्ठित संस्थानों में शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन और स्विट्जरलैंड में भी उच्च शिक्षा एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण हासिल किया।
उनका शैक्षणिक अनुभव और वैश्विक दृष्टिकोण भारतीय संवैधानिक विमर्श को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।
पद्म भूषण से हुए सम्मानित
भारतीय लोकतंत्र और संविधान के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2015 में उन्हें Padma Bhushan से सम्मानित किया था।
इसके अलावा वे पंचायती राज कानूनों और संस्थाओं के लिए भारत सरकार के मानद संवैधानिक सलाहकार भी रहे।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में निभाई अहम भूमिका
डॉ. कश्यप लंबे समय तक Indian National Bar Association (INBA) के अध्यक्ष रहे। उन्होंने जिनेवा स्थित Inter-Parliamentary Union (IPU) के संसदीय दस्तावेजीकरण केंद्र का भी नेतृत्व किया।
उनकी विशेषज्ञता का लाभ अनेक राष्ट्रीय आयोगों और समितियों को मिला।
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ समिति में भी थे शामिल
जीवन के अंतिम वर्षों में डॉ. कश्यप दिल्ली स्थित Centre for Policy Research (CPR) में मानद शोध प्रोफेसर के रूप में कार्यरत थे।
वे संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग के सदस्य रहे और उसकी ड्राफ्टिंग एवं संपादकीय समिति के अध्यक्ष भी रहे। इसके अलावा ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की संभावनाओं का अध्ययन करने के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
भारतीय लोकतंत्र ने खोया एक महान चिंतक
डॉ. सुभाष कश्यप का निधन भारतीय संवैधानिक अध्ययन, संसदीय लोकतंत्र और सार्वजनिक नीति के क्षेत्र के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। उनके लेखन, शोध और विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बने रहेंगे।
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