राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी NCERT ने कक्षा 8वीं की सोशल साइंस की संशोधित पुस्तक जारी कर दी है। न्यायपालिका को लेकर विवादित टिप्पणियों के कारण चर्चा में आई पिछली किताब को वापस लेने के करीब पांच महीने बाद नया संस्करण बाजार में लाया गया है। संशोधित पुस्तक में न्यायपालिका से जुड़े पूरे अध्याय को दोबारा लिखा गया है और ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’, अदालतों में लंबित मामलों, न्यायिक व्यवस्था की चुनौतियों तथा अन्य विवादित हिस्सों को हटा दिया गया है।
पिछले संस्करण में न्यायपालिका पर की गई कुछ टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई थी। विशेष रूप से ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ जैसे विषयों को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया और सुनवाई के दौरान NCERT ने बिना शर्त माफी मांगते हुए विवादित सामग्री हटाने की बात कही थी। इसके बाद पुस्तक का प्रकाशन रोक दिया गया और उपलब्ध प्रतियों को बाजार से वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।
अब लगभग पांच महीने बाद NCERT ने संशोधित संस्करण जारी किया है, जिसमें न्यायपालिका की आलोचना और उसकी आंतरिक चुनौतियों की चर्चा के बजाय उसकी संवैधानिक भूमिका, नागरिकों को न्याय दिलाने की जिम्मेदारी, जनहित याचिका और वैकल्पिक विवाद समाधान जैसे विषयों पर अधिक जोर दिया गया है।
न्यायपालिका का पूरा अध्याय दोबारा लिखा गया
NCERT की नई संशोधित पुस्तक में न्यायपालिका से संबंधित अध्याय को बड़े स्तर पर बदल दिया गया है। पुराने संस्करण में मौजूद कई विवादित हिस्सों को पूरी तरह हटाकर अध्याय का नया स्वरूप तैयार किया गया है।
संशोधित अध्याय में न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका को अधिक विस्तार से समझाया गया है। छात्रों को यह बताने की कोशिश की गई है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका किस प्रकार कानून और संविधान के अनुसार काम करती है तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में उसकी क्या भूमिका होती है।
इसके अलावा नई पुस्तक में जनहित याचिका यानी PIL और वैकल्पिक विवाद समाधान यानी Alternative Dispute Resolution जैसे विषयों को अधिक विस्तार से शामिल किया गया है।
‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ वाला पूरा हिस्सा हटाया गया
नई पुस्तक में सबसे बड़ा बदलाव ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक वाले हिस्से को पूरी तरह हटाने के रूप में सामने आया है।
पिछली पुस्तक में न्यायपालिका में कथित भ्रष्टाचार और न्यायिक व्यवस्था से जुड़े विवादित मुद्दों पर चर्चा की गई थी। इसी सामग्री को लेकर सबसे ज्यादा विवाद हुआ था और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर गंभीर आपत्ति जताई थी।
अब संशोधित संस्करण में इस पूरे हिस्से को जगह नहीं दी गई है। न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को आलोचनात्मक नजरिए से प्रस्तुत करने के बजाय उसकी संवैधानिक जिम्मेदारियों और न्याय उपलब्ध कराने में उसकी भूमिका पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है।
अदालतों में लंबित मामलों और न्यायिक चुनौतियों की चर्चा भी हटाई
पुरानी किताब में भारतीय न्यायिक व्यवस्था के सामने मौजूद कई चुनौतियों का उल्लेख किया गया था। इनमें अदालतों में लंबित मामलों के भारी बोझ यानी बैकलॉग, न्यायाधीशों की कमी, जटिल कानूनी प्रक्रियाएं और कमजोर आधारभूत ढांचा जैसे मुद्दे शामिल थे।
नई संशोधित पुस्तक में न्यायपालिका की इन चुनौतियों पर आधारित पूरे हिस्से को हटा दिया गया है। यानी अब छात्रों को इस अध्याय में अदालतों में लंबित मामलों की संख्या, जजों की कमी या न्यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं पर पहले की तरह विस्तृत चर्चा पढ़ने को नहीं मिलेगी।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अलग सेक्शन भी हटाया गया
पिछली किताब में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर एक अलग हिस्सा दिया गया था। इसमें छात्रों को यह समझाने की कोशिश की गई थी कि न्याय दिलाने के लिए एक स्वतंत्र न्यायपालिका क्यों जरूरी है। नई संशोधित पुस्तक में यह अलग सेक्शन भी हटा दिया गया है।
पहले अध्याय में छात्रों के सामने सवाल रखा गया था कि ‘न्याय के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका क्यों जरूरी है?’ लेकिन अब पुस्तक में इस सवाल की जगह न्याय और सामाजिक सौहार्द से जुड़े व्यापक प्रश्न को शामिल किया गया है।
छात्रों के लिए ‘बिग क्वेश्चन’ भी बदला
NCERT ने केवल अध्याय की सामग्री ही नहीं बदली है, बल्कि छात्रों से पूछे जाने वाले प्रमुख सवालों यानी ‘बिग क्वेश्चन’ में भी बदलाव किया है। पहले छात्रों से पूछा जाता था कि स्वतंत्र न्यायपालिका क्यों जरूरी है? अब इस प्रश्न की जगह पूछा गया है कि ‘एक न्यायपूर्ण और सौहार्दपूर्ण समाज के लिए न्याय क्यों महत्वपूर्ण है?’ इस बदलाव से स्पष्ट है कि नई पुस्तक में न्यायपालिका की संस्थागत स्वतंत्रता के बजाय न्याय के व्यापक सामाजिक महत्व पर अधिक जोर दिया गया है।
नए अध्याय का फोकस यह समझाने पर है कि एक निष्पक्ष समाज के निर्माण, नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने में न्याय की क्या भूमिका होती है।
पहले संस्करण में न्यायपालिका की चुनौतियों पर थी विस्तृत चर्चा
विवादित संस्करण में भारतीय न्यायपालिका के सामने मौजूद समस्याओं और चुनौतियों पर अलग से चर्चा की गई थी। इसमें अदालतों में बड़ी संख्या में लंबित मामलों, न्यायाधीशों की कमी, मुकदमों की जटिल प्रक्रिया और कमजोर न्यायिक आधारभूत ढांचे जैसे विषयों का उल्लेख था।
संशोधित पुस्तक में इन सभी मुद्दों की विस्तृत चर्चा को हटाकर अध्याय का स्वरूप बदल दिया गया है। अब छात्रों को न्यायपालिका की समस्याओं के बजाय उसकी संवैधानिक जिम्मेदारियों और न्याय प्रदान करने की भूमिका के बारे में अधिक जानकारी दी गई है।
श्रेया सिंघल और चुनावी बॉन्ड केस का भी था उल्लेख
पिछली पुस्तक में सुप्रीम कोर्ट के दो महत्वपूर्ण फैसलों का भी उल्लेख किया गया था। इनमें पहला था श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामला, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम यानी IT Act की धारा 66A को रद्द कर दिया था।
दूसरा था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत संघ मामला, जो चुनावी बॉन्ड योजना से संबंधित था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित किया था। संशोधित अध्याय में विवादित और आलोचनात्मक हिस्सों को हटाकर न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका, जनहित याचिका और वैकल्पिक विवाद समाधान पर ज्यादा जोर दिया गया है।
फरवरी में शुरू हुआ था NCERT पुस्तक को लेकर विवाद
यह पूरा विवाद फरवरी 2026 में शुरू हुआ था, जब कक्षा 8वीं की सोशल साइंस भाग-2 की नई पुस्तक जारी की गई थी। पुस्तक में न्यायपालिका से जुड़े अध्याय की कुछ टिप्पणियों पर विवाद खड़ा हो गया था। विशेष रूप से ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ जैसे विषय को लेकर आपत्ति जताई गई थी। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की।
सुनवाई के दौरान NCERT ने विवादित सामग्री को लेकर खेद जताया और उसे पुस्तक से हटाने की बात कही। इसके बाद किताब का प्रकाशन रोक दिया गया और उसे बाजार से वापस लेने का फैसला किया गया।
NCERT ने सुप्रीम कोर्ट में मांगी थी बिना शर्त माफी
मामले की सुनवाई के दौरान NCERT ने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी गलती स्वीकार करते हुए बिना शर्त माफी मांगी थी। संस्था ने अदालत को भरोसा दिलाया था कि विवादित सामग्री को हटाया जाएगा और न्यायपालिका से संबंधित अध्याय को संशोधित किया जाएगा। इसके बाद संबंधित किताबों का वितरण रोका गया और नई सामग्री तैयार करने की प्रक्रिया शुरू हुई।
अब करीब पांच महीने बाद संशोधित पुस्तक बाजार में आ गई है, जिसमें विवाद का कारण बने हिस्सों को हटा दिया गया है।
नई किताब में न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका पर ज्यादा जोर
संशोधित पुस्तक में छात्रों को न्यायपालिका की संवैधानिक जिम्मेदारियों के बारे में अधिक विस्तार से जानकारी दी गई है। इसमें यह समझाया गया है कि न्यायपालिका लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और नागरिकों को न्याय उपलब्ध कराने में उसकी केंद्रीय भूमिका होती है। नई पुस्तक में जनहित याचिका के माध्यम से आम लोगों और समाज के कमजोर वर्गों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया पर भी जोर दिया गया है।
साथ ही, अदालतों के बाहर विवादों को सुलझाने की वैकल्पिक व्यवस्थाओं के बारे में भी अधिक विस्तार से बताया गया है।
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