भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में मध्य प्रदेश ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। ‘ज्ञान भारतम्’ अभियान के तहत दुर्लभ और ऐतिहासिक पांडुलिपियों के पंजीकरण में मध्य प्रदेश देश में पहले स्थान पर पहुंच गया है। प्रदेश में अब तक 34 लाख 45 हजार 439 पांडुलिपि पन्नों का पंजीकरण किया जा चुका है, जबकि 12 लाख 13 हजार 127 प्रविष्टियों का सत्यापन पूरा होने की जानकारी सामने आई है।
इस अभियान के दौरान मध्य प्रदेश के अलग-अलग जिलों से ऐसी दुर्लभ धरोहरें भी सामने आई हैं, जो भारतीय इतिहास, साहित्य, धर्म, भूगोल और प्रशासनिक परंपरा के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती हैं। इनमें टीकमगढ़ से मिला 10 फीट लंबा ‘जम्बूद्वीप’ का नक्शा, पन्ना से महाकवि केशवदास की हस्तलिखित ‘रसिक प्रिया’, बुरहानपुर से लगभग 220 वर्ष पुराना श्रीमद्भागवत महापुराण और दतिया से विक्रम संवत 1828 का ताम्रपत्र अभिलेख शामिल है।
केंद्र सरकार का ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ देशभर में बिखरी पांडुलिपियों की खोज, सर्वेक्षण, सूचीकरण, संरक्षण और डिजिटलीकरण की महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसे केंद्रीय बजट 2025-26 में एक करोड़ से अधिक पांडुलिपियों को कवर करने के लक्ष्य के साथ घोषित किया गया था। सरकार का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा का एक राष्ट्रीय डिजिटल भंडार तैयार करना है।
मध्य प्रदेश ने पांडुलिपि पंजीकरण में हासिल किया पहला स्थान
ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक ‘ज्ञान भारतम्’ ऐप के माध्यम से पांडुलिपियों के पंजीकरण अभियान में मध्य प्रदेश देश के अन्य राज्यों से आगे निकल गया है।
प्रदेश से अब तक:
34,45,439 पांडुलिपि पन्नों का पंजीकरण किया गया है, जबकि 12,13,127 का सत्यापन पूरा होने की जानकारी दी गई है।
यह अभियान केवल सरकारी संग्रहालयों और अभिलेखागारों तक सीमित नहीं है। प्राचीन ग्रंथ मंदिरों, मठों, पुस्तकालयों, संस्थानों और निजी संग्रहों में भी सुरक्षित हो सकते हैं। ज्ञान भारतम् मिशन का व्यापक उद्देश्य ऐसी बिखरी हुई पांडुलिपियों को खोजकर उनका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण करना है। केंद्र सरकार के अनुसार मिशन सर्वे और कैटलॉगिंग, संरक्षण, तकनीक एवं डिजिटलीकरण, भाषा एवं अनुवाद तथा शोध एवं प्रकाशन जैसे पांच प्रमुख क्षेत्रों पर काम करता है।
भोपाल सबसे आगे, 24.26 लाख पंजीकरण
मध्य प्रदेश के भीतर राजधानी भोपाल ने पांडुलिपियों के पंजीकरण में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। रिपोर्ट के मुताबिक भोपाल से 24.26 लाख पांडुलिपि पन्नों या प्रविष्टियों का पंजीकरण किया गया है। इसके बाद इंदौर, रीवा, बैतूल और छिंदवाड़ा का स्थान बताया गया है।
भोपाल का यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अकेले राजधानी क्षेत्र का योगदान प्रदेश के कुल पंजीकरण का बड़ा हिस्सा है। अभियान के विस्तार के साथ राज्य के अन्य जिलों, मंदिरों, पुरानी रियासतों से जुड़े संग्रहों, निजी परिवारों और परंपरागत संस्थाओं से भी नई पांडुलिपियां सामने आने की संभावना है।
शिव शेखर शुक्ला बोले—यह प्राचीन ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महायज्ञ
मध्य प्रदेश के अपर मुख्य सचिव शिव शेखर शुक्ला के अनुसार यह अभियान भारत की प्राचीन ज्ञान-संपदा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का बड़ा प्रयास है। उन्होंने कहा कि भारतीय पांडुलिपियों का संरक्षण और डिजिटलीकरण देश की सांस्कृतिक धरोहर को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिला रहा है। अभियान के जरिए ऐसे प्राचीन दस्तावेज सामने आ रहे हैं, जो वर्षों या सदियों से मंदिरों, निजी संग्रहों और पारंपरिक संस्थानों में सुरक्षित थे।
ज्ञान भारतम् मिशन भी इसी सोच पर आधारित है। केंद्र सरकार इसे भारत की विशाल पांडुलिपि विरासत को खोजने, सुरक्षित रखने और भावी पीढ़ियों के लिए उपलब्ध कराने वाली प्रमुख राष्ट्रीय पहल के रूप में प्रस्तुत करती है।
अभियान में मिलीं चार अनोखी धरोहरें
मध्य प्रदेश में चल रहे पंजीकरण अभियान के दौरान कई महत्वपूर्ण ग्रंथ और अभिलेख मिले हैं, लेकिन चार खोजों ने विशेष ध्यान आकर्षित किया है।
1. टीकमगढ़ में मिला 10 फीट लंबा ‘जम्बूद्वीप’ का दुर्लभ नक्शा
टीकमगढ़ से लगभग 10 फीट लंबा ‘जम्बूद्वीप’ का नक्शा सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार यह दुर्लभ चित्र प्राचीन भारतीय भूगोल की अवधारणा को प्रस्तुत करता है।
नक्शे के मध्य में एक वृत्ताकार संरचना दिखाई गई है, जबकि उसके चारों ओर पर्वत शृंखलाओं और विभिन्न प्राचीन क्षेत्रों का चित्रण किया गया है।
‘जम्बूद्वीप’ भारतीय धार्मिक और पारंपरिक भूगोल की प्राचीन अवधारणाओं से जुड़ा शब्द है। ऐसे दुर्लभ चित्रों का अध्ययन यह समझने में मदद कर सकता है कि अलग-अलग कालखंडों में भारतीय विद्वान भूगोल, ब्रह्मांड और क्षेत्रों की संरचना को किस तरह चित्रित करते थे।
इस नक्शे की उम्र, लिपि, निर्माण शैली, चित्रांकन सामग्री और ऐतिहासिक संदर्भ पर विस्तृत विशेषज्ञ अध्ययन भविष्य में इसकी वास्तविक महत्ता को और स्पष्ट कर सकता है।
2. पन्ना में मिली महाकवि केशवदास की हस्तलिखित ‘रसिक प्रिया’
पन्ना के श्रीराम जानकी मंदिर से महाकवि केशवदास द्वारा रचित ‘रसिक प्रिया’ की हस्तलिखित पांडुलिपि मिलने की जानकारी सामने आई है।
‘रसिक प्रिया’ की मूल रचना 1591 ईस्वी से जोड़ी जाती है। यह रीतिकालीन साहित्य की प्रसिद्ध कृतियों में शामिल है और राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंगों के साथ काव्यशास्त्रीय विषयों का वर्णन करती है।
महाकवि केशवदास हिंदी साहित्य के प्रमुख रीतिकालीन कवियों में गिने जाते हैं। ऐसे में किसी हस्तलिखित प्रति का मिलना साहित्यिक शोध की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है।
पांडुलिपि की वास्तविक आयु, किसने उसकी प्रतिलिपि तैयार की, उसमें कौन-सी लिपि और सामग्री इस्तेमाल हुई तथा वह मूल पाठ के कितने करीब है—इन विषयों पर विशेषज्ञ अध्ययन इसकी ऐतिहासिक और साहित्यिक महत्ता को अधिक स्पष्ट कर सकता है।
3. बुरहानपुर में 220 वर्ष पुराना और 20 फीट लंबा श्रीमद्भागवत महापुराण
बुरहानपुर से लगभग 220 वर्ष पुराना हस्तलिखित श्रीमद्भागवत महापुराण भी अभियान के दौरान पंजीकृत किया गया है।
रिपोर्ट में इस दुर्लभ ग्रंथ को करीब 20 फीट लंबा बताया गया है।
श्रीमद्भागवत महापुराण भारतीय धार्मिक और दार्शनिक परंपरा का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। सदियों से इसकी हस्तलिखित प्रतियां अलग-अलग क्षेत्रों, मंदिरों और धार्मिक परिवारों में संरक्षित की जाती रही हैं।
बुरहानपुर से सामने आई इस पांडुलिपि की बनावट और आकार इसे विशेष बनाते हैं। इसके कागज या अन्य लेखन माध्यम, स्याही, चित्रांकन, लिपि और संरक्षण की स्थिति पर वैज्ञानिक अध्ययन से इसके इतिहास के बारे में नई जानकारी सामने आ सकती है।
4. दतिया में मिला विक्रम संवत 1828 का ताम्रपत्र
दतिया जिले से एक ऐतिहासिक ताम्रपत्र अभिलेख भी सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार यह ताम्रपत्र श्री राधावल्लभ मिश्रा के निवास से मिला और इसे ओरछा नरेश राजा उद्दोत सिंह के समय से जोड़ा गया है।
ताम्रपत्र पर विक्रम संवत 1828 अंकित होने की जानकारी दी गई है।
प्राचीन और मध्यकालीन भारत में ताम्रपत्रों का उपयोग भूमि दान, राजकीय आदेश, धार्मिक अनुदान, अधिकार और अन्य प्रशासनिक घोषणाओं को दर्ज करने के लिए किया जाता था।
ऐसे अभिलेख तत्कालीन शासन व्यवस्था, समाज, स्थानीय भूगोल, राजस्व व्यवस्था और भाषा के अध्ययन में अत्यंत उपयोगी हो सकते हैं। दतिया से मिले ताम्रपत्र की पूरी सामग्री के अध्ययन से बुंदेलखंड और ओरछा राज्य के इतिहास से जुड़ी नई जानकारी सामने आ सकती है।
क्या है ‘ज्ञान भारतम् मिशन’?
‘ज्ञान भारतम्’ भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की प्रमुख राष्ट्रीय पहल है। इसे भारत की विशाल पांडुलिपि विरासत को खोजने, सुरक्षित रखने, सूचीबद्ध करने, डिजिटल स्वरूप में बदलने और शोधकर्ताओं तथा आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के उद्देश्य से शुरू किया गया है।
केंद्रीय बजट 2025-26 में सरकार ने एक करोड़ से अधिक पांडुलिपियों के सर्वेक्षण, दस्तावेजीकरण और संरक्षण के लिए ज्ञान भारतम् मिशन की घोषणा की थी। इसके साथ भारतीय ज्ञान प्रणालियों का National Digital Repository तैयार करने का प्रस्ताव भी रखा गया था।
मिशन को केवल पुराने ग्रंथों की तस्वीरें लेने की परियोजना के रूप में नहीं देखा जा रहा। इसका उद्देश्य पांडुलिपियों के बारे में विस्तृत जानकारी इकट्ठा करना भी है, जिसमें भाषा, लिपि, विषय, स्रोत, संग्रहण स्थल, संरक्षण की स्थिति और निर्माण काल जैसी सूचनाएं शामिल हो सकती हैं।
पांच प्रमुख क्षेत्रों में काम कर रहा ज्ञान भारतम्
केंद्र सरकार के अनुसार मिशन पांच प्रमुख क्षेत्रों पर आधारित है:
सर्वे और कैटलॉगिंग: देशभर में बिखरी पांडुलिपियों की पहचान और उनका व्यवस्थित रिकॉर्ड तैयार करना।
संरक्षण और क्षमता निर्माण: क्षतिग्रस्त या नष्ट होने के खतरे वाली पांडुलिपियों को वैज्ञानिक तरीके से सुरक्षित रखना और विशेषज्ञ तैयार करना।
टेक्नोलॉजी और डिजिटलीकरण: उच्च गुणवत्ता में डिजिटल प्रतियां तैयार करना और उन्हें दीर्घकाल तक सुरक्षित रखना।
भाषा और अनुवाद: पुरानी लिपियों और भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान को समझना और अधिक लोगों तक पहुंचाना।
शोध, प्रकाशन और जनसंपर्क: पांडुलिपियों को शोध, शिक्षा और ज्ञान-विमर्श से जोड़ना।
AI और आधुनिक तकनीक का भी होगा इस्तेमाल
ज्ञान भारतम् मिशन में आधुनिक डिजिटल तकनीकों और AI आधारित प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल की भी योजना है।
केंद्र सरकार के मुताबिक पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण के लिए न्यूनतम 400 DPI और आवश्यक मामलों में 600 DPI तक स्कैनिंग, रंग की गुणवत्ता सुरक्षित रखने, डिजिटल फाइलों के दीर्घकालीन भंडारण और मेटाडेटा तैयार करने जैसे तकनीकी मानक तय किए गए हैं।
मिशन के तहत एक AI-integrated डिजिटल प्लेटफॉर्म और मोबाइल एप्लिकेशन विकसित करने का भी प्रावधान है। आधिकारिक ज्ञान भारतम् प्लेटफॉर्म पांडुलिपियों को डिजिटाइज और एक्सप्लोर करने की सुविधा देने की बात करता है।
7.5 लाख से अधिक पांडुलिपियां हो चुकी थीं डिजिटाइज
केंद्र सरकार ने 2 फरवरी 2026 को बताया था कि ज्ञान भारतम् के तहत 7.5 लाख से अधिक पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण किया जा चुका था। इनमें से लगभग 1.29 लाख पांडुलिपियां ज्ञान भारतम् पोर्टल पर उपलब्ध थीं।
सरकार के अनुसार देशभर में क्लस्टर सेंटर और स्वतंत्र केंद्रों का नेटवर्क विकसित किया जा रहा है, ताकि स्थानीय स्तर पर पांडुलिपियों के सर्वेक्षण, संरक्षण और डिजिटलीकरण का काम तेजी से आगे बढ़ सके।
एक करोड़ से अधिक पांडुलिपियों तक पहुंचने का लक्ष्य
भारत सरकार ने ज्ञान भारतम् मिशन के लिए एक करोड़ से अधिक पांडुलिपियों को सर्वे, दस्तावेजीकरण और संरक्षण के दायरे में लाने का लक्ष्य रखा है। ये पांडुलिपियां केवल धर्म और दर्शन तक सीमित नहीं हैं। सरकार के अनुसार भारत की पांडुलिपि परंपरा में विज्ञान, चिकित्सा, गणित, खगोलशास्त्र, साहित्य, कला, वास्तुकला और आध्यात्मिक विषयों का विशाल ज्ञान मौजूद है।
यही कारण है कि मिशन का लक्ष्य प्राचीन ग्रंथों को केवल संग्रहालय की वस्तु के रूप में सुरक्षित करना नहीं, बल्कि उन्हें शोध और शिक्षा के लिए जीवंत ज्ञान-स्रोत बनाना भी है।
शोधकर्ताओं और छात्रों को क्या फायदा होगा?
एक बड़ा डिजिटल अभिलेख तैयार होने से शोधकर्ताओं को अलग-अलग राज्यों, पुस्तकालयों और निजी संग्रहों में रखी पांडुलिपियों की जानकारी एक जगह खोजने में मदद मिल सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार ज्ञान भारतम् प्लेटफॉर्म पर भविष्य में शीर्षक, लेखक, भाषा, विषय और संग्रहण स्थल जैसी जानकारियों के आधार पर पांडुलिपियों को खोजने की सुविधा महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। इससे इतिहास, संस्कृत, प्राकृत, क्षेत्रीय भाषाओं, दर्शन, चिकित्सा, विज्ञान, कला और धार्मिक अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं को नए प्राथमिक स्रोत उपलब्ध हो सकते हैं।
निजी संग्रहों में छिपी धरोहरें भी आ सकती हैं सामने
भारत में बड़ी संख्या में प्राचीन ग्रंथ और पांडुलिपियां केवल सरकारी संग्रहालयों में नहीं, बल्कि मंदिरों, मठों, धार्मिक संस्थानों और निजी परिवारों के पास भी सुरक्षित हैं।
ज्ञान भारतम् मिशन का राष्ट्रीय ढांचा निजी संग्रहकर्ताओं और संस्थानों को भी सर्वेक्षण तथा संरक्षण अभियान से जोड़ने के लिए बनाया गया है। केंद्रीय बजट की घोषणा में भी शैक्षणिक संस्थानों, संग्रहालयों, पुस्तकालयों और निजी संग्रहकर्ताओं के साथ मिलकर अभियान चलाने की बात कही गई थी।
मध्य प्रदेश में जम्बूद्वीप का नक्शा, हस्तलिखित ‘रसिक प्रिया’ और ऐतिहासिक ताम्रपत्र जैसी खोजें इस बात का उदाहरण हैं कि देश के अलग-अलग हिस्सों में अभी भी महत्वपूर्ण ज्ञान-संपदा छिपी हो सकती है।
मध्य प्रदेश की उपलब्धि क्यों महत्वपूर्ण?
मध्य प्रदेश की पहचान प्राचीन मंदिरों, ऐतिहासिक नगरों, राजघरानों, धार्मिक केंद्रों और समृद्ध साहित्यिक परंपरा वाले राज्य के रूप में रही है। भोपाल, पन्ना, टीकमगढ़, दतिया और बुरहानपुर जैसे क्षेत्रों में मिले दस्तावेज दिखाते हैं कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों में विविध प्रकार की पांडुलिपि और अभिलेख परंपराएं मौजूद हैं।
34.45 लाख से अधिक पांडुलिपि पन्नों का पंजीकरण केवल एक आंकड़ा नहीं है। इससे भविष्य में यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि राज्य की प्राचीन ज्ञान-संपदा किन भाषाओं, लिपियों और विषयों में उपलब्ध है तथा किन संग्रहों को तत्काल वैज्ञानिक संरक्षण की जरूरत है।
‘जम्बूद्वीप’ से ‘रसिक प्रिया’ तक, इतिहास की नई परतें खुलने की उम्मीद
टीकमगढ़ का विशाल नक्शा प्राचीन भारतीय भूगोल की परंपरा पर नई चर्चा शुरू कर सकता है। पन्ना की ‘रसिक प्रिया’ हिंदी साहित्य के शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
बुरहानपुर का विशाल हस्तलिखित श्रीमद्भागवत महापुराण धार्मिक पांडुलिपि परंपरा की जानकारी दे सकता है, जबकि दतिया का ताम्रपत्र तत्कालीन शासन और प्रशासन से जुड़े संकेत उपलब्ध करा सकता है। इन वस्तुओं की वास्तविक ऐतिहासिक महत्ता विशेषज्ञ अध्ययन, डेटिंग, लिपि विश्लेषण और वैज्ञानिक परीक्षण से और स्पष्ट होगी।
ज्ञान भारतम् मिशन का सबसे बड़ा महत्व इसी में है—देश की बिखरी हुई ज्ञान-संपदा को खोजकर उसका रिकॉर्ड तैयार करना, उसे नष्ट होने से बचाना और आधुनिक तकनीक की मदद से आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना।
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