राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत के प्रस्तावित कनाडा दौरे को लेकर वहां राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है। RSS की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, मोहन भागवत 25 अगस्त से अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की यात्रा पर जाने वाले हैं। यह दौरा संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान प्रवासी भारतीय समुदाय तक पहुंच बढ़ाने की पहल का हिस्सा है।
इसी बीच कनाडा की न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (NDP) की सांसद जेनी क्वान और हीथर मैकफर्सन ने संघ प्रमुख को कनाडा में प्रवेश नहीं देने की मांग की है। NDP ने 7 अगस्त को जारी अपने बयान में कहा कि दोनों सांसदों ने विदेश, सार्वजनिक सुरक्षा और आव्रजन मंत्रियों को पत्र लिखकर मोहन भागवत की प्रस्तावित यात्रा को लेकर कार्रवाई की मांग की। NDP लंबे समय से कनाडा में RSS पर प्रतिबंध लगाने की भी मांग करती रही है।
मोहन भागवत के कनाडा दौरे के समर्थन में भी उठी आवाज
इस विवाद के बीच मोहन भागवत के दौरे के समर्थन में भी कनाडा के हिंदू समुदाय से आवाजें सामने आ रही हैं। आपके उपलब्ध कराए गए विवरण के मुताबिक, 100 से अधिक हिंदू संगठनों और नागरिक अधिकार समूहों ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी से अपील की है कि संघ प्रमुख से जुड़ा कोई भी आव्रजन या सार्वजनिक सुरक्षा संबंधी फैसला राजनीतिक दबाव में न लिया जाए।
इन संगठनों का कहना है कि किसी व्यक्ति के प्रवेश को लेकर फैसला विश्वसनीय सबूत, कनाडाई कानून और उचित कानूनी प्रक्रिया यानी Due Process के आधार पर ही होना चाहिए। दौरे के समर्थकों का तर्क है कि राजनीतिक असहमति को अपने आप आव्रजन प्रतिबंध का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
हालांकि, 100 से अधिक समर्थक संगठनों वाले इस विशेष संयुक्त पत्र की स्वतंत्र पुष्टि हमें उपलब्ध विश्वसनीय सार्वजनिक स्रोतों में नहीं मिली है। इसके विपरीत, कनाडा में भागवत की यात्रा का विरोध करने वाले 40 से अधिक तथा एक अन्य अभियान में 200 से अधिक संगठनों की अपील सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट हुई है। इसलिए समर्थक संगठनों की संख्या को प्रकाशित करते समय संबंधित संयुक्त पत्र या आधिकारिक सूची का हवाला देना बेहतर होगा।
किन सांसदों ने मोहन भागवत के प्रवेश का विरोध किया?
NDP सांसद हीथर मैकफर्सन और जेनी क्वान ने कनाडा सरकार से भागवत को देश में प्रवेश देने से इनकार करने का आग्रह किया है। आधिकारिक NDP बयान में RSS को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं और कनाडा के Immigration and Refugee Protection Act के प्रावधानों के तहत मामले की जांच करने की मांग की गई है। ये NDP और सांसदों के आरोप तथा राजनीतिक मांगें हैं, न कि किसी कनाडाई अदालत द्वारा RSS या मोहन भागवत के खिलाफ दिया गया निष्कर्ष।
मौजूदा NDP संरचना में हीथर मैकफर्सन विदेश मामलों की प्रमुख आलोचक हैं, जबकि जेनी क्वान के पास आव्रजन, नागरिकता, सार्वजनिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विभागों की जिम्मेदारी है।
दौरे को रोकने की मांग के विरोध में क्या दलील?
भागवत की यात्रा का समर्थन करने वालों का मुख्य तर्क अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निष्पक्ष प्रक्रिया और कानून के तहत समान व्यवहार से जुड़ा है। कनाडा में प्रकाशित एक पक्षधर लेख में भी यात्रा का समर्थन करते हुए कहा गया है कि आरोपों पर फैसला प्रमाण और उचित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए तथा अलग-अलग विचार रखने वाले लोगों के विचारों पर खुली बहस की गुंजाइश रहनी चाहिए।
समर्थकों के अनुसार RSS भारत में सामाजिक सेवा, सांस्कृतिक गतिविधियों और सामुदायिक कार्यक्रमों में सक्रिय एक बड़ा संगठन है। उनका कहना है कि कनाडा जैसे बहुसांस्कृतिक लोकतंत्र में किसी नेता की यात्रा का मूल्यांकन उसके विचारों से राजनीतिक असहमति के बजाय लागू कानूनों के आधार पर किया जाना चाहिए।
कनाडा में हिंदू समुदाय की बड़ी मौजूदगी
2021 की कनाडाई जनगणना के अनुसार हिंदू धर्म मानने वालों की संख्या करीब 8.3 लाख थी। इसके बाद समुदाय की आबादी बढ़ी है, लेकिन “10 लाख से अधिक” का वर्तमान आंकड़ा आधिकारिक नई जनगणना के बिना अनुमान के रूप में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
मोहन भागवत का प्रस्तावित कनाडा दौरा ऐसे समय हो रहा है जब भारत और कनाडा अपने द्विपक्षीय संबंधों को दोबारा मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। मार्च 2026 में कनाडाई विदेश मंत्री अनीता आनंद और भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने नई Canada-India Roadmap को आगे बढ़ाने और लोगों के बीच संपर्क तथा सुरक्षा संवाद मजबूत करने पर चर्चा की थी।
सरकार के फैसले पर नजर
अब नजर कनाडा की मार्क कार्नी सरकार पर है। विदेश मंत्री अनीता आनंद, सार्वजनिक सुरक्षा मंत्री गैरी आनंदसांगरी और आव्रजन मंत्री लीना मेटलेज डायब मौजूदा सरकार में संबंधित जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं।
भागवत के प्रस्तावित दौरे पर एक तरफ NDP और कई मानवाधिकार एवं नागरिक संगठनों का विरोध है, जबकि दूसरी तरफ हिंदू समुदाय के कुछ हिस्से इसे धार्मिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और समान कानूनी व्यवहार का मुद्दा बता रहे हैं। ऐसे में कनाडा सरकार का अंतिम रुख राजनीतिक और कूटनीतिक दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।
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