महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों में त्वरित न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (Fast Track Special Courts – FTSCs) योजना को अगले पांच वर्षों तक जारी रखने की मंजूरी दी गई। इस फैसले के तहत देश में बलात्कार और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम से जुड़े मामलों की तेजी से सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों की संख्या 779 से बढ़ाकर 850 करने का लक्ष्य रखा गया है।
केंद्रीय कैबिनेट ने इस योजना के विस्तार के लिए कुल 3,788.04 करोड़ रुपये के वित्तीय प्रावधान को मंजूरी दी है। यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक लागू रहेगी। केंद्र सरकार का उद्देश्य यौन अपराधों के पीड़ितों को समयबद्ध न्याय उपलब्ध कराना, अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम करना और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना है। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मंत्रिमंडल की बैठक के बाद इन फैसलों की जानकारी देते हुए कहा कि सरकार महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों से सख्ती से निपटने तथा पीड़ितों को जल्द न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है।
मोदी कैबिनेट ने फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना को पांच साल के लिए बढ़ाया
केंद्र सरकार ने बलात्कार और POCSO अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई में तेजी लाने के लिए संचालित फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना को वित्त वर्ष 2030-31 तक बढ़ाने का फैसला किया है। इस योजना की शुरुआत 2 अक्टूबर 2019 को की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं और नाबालिग बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से संबंधित मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए विशेष न्यायिक व्यवस्था विकसित करना था।
सरकार के अनुसार, इन विशेष अदालतों के माध्यम से पीड़ितों को लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया का इंतजार न करना पड़े और मामलों की सुनवाई अधिक प्रभावी तरीके से हो सके, इसके लिए विशेष संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। अब योजना के विस्तार के साथ देश में कुल 850 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट संचालित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। वर्तमान में इन अदालतों की संख्या 779 है। इस प्रकार लक्ष्य पूरा होने पर कुल संख्या में 71 अदालतों की वृद्धि होगी।
₹3,788.04 करोड़ का बजट, निर्भया फंड से केंद्र देगा ₹2,353 करोड़
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना के अगले पांच वर्षों के संचालन और विस्तार के लिए कुल 3,788.04 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इसमें केंद्र सरकार की ओर से 2,353.15 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए जाएंगे। यह राशि निर्भया फंड के माध्यम से दी जाएगी, जबकि राज्य सरकारों की ओर से 1,434.89 करोड़ रुपये का योगदान किया जाएगा।
निर्भया फंड का उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा और संरक्षण से जुड़ी योजनाओं को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना है। फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना के विस्तार में इस फंड की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी।
इस वित्तीय सहायता का उपयोग विशेष अदालतों के संचालन, न्यायिक अधिकारियों, सरकारी वकीलों और सहायक कर्मचारियों की व्यवस्था सहित संबंधित आवश्यकताओं को पूरा करने में किया जाएगा। सरकार का मानना है कि पर्याप्त वित्तीय संसाधनों और मानवबल की उपलब्धता से न्यायिक प्रक्रियाओं को तेज करने में मदद मिलेगी।
देश में 779 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट, 399 अदालतें POCSO मामलों के लिए
सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, वर्तमान में देश के 29 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कुल 779 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट संचालित हैं। इनमें से 399 विशेष अदालतें POCSO अधिनियम से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए कार्यरत हैं।
POCSO यानी प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट, 2012 बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण प्रदान करने वाला विशेष कानून है। इस कानून के तहत 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में विशेष कानूनी प्रावधान लागू होते हैं।
फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट की व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे संवेदनशील मामलों की सुनवाई में होने वाली देरी को कम करना और पीड़ित बच्चों तथा महिलाओं को समय पर न्याय दिलाना है। विशेष अदालतों में इन मामलों को प्राथमिकता के आधार पर सुनने की व्यवस्था न्यायिक प्रक्रिया को अधिक केंद्रित बनाने में मदद करती है।
अब हर कोर्ट में अलग न्यायिक अधिकारी और फुल टाइम सरकारी वकील
मोदी कैबिनेट के इस फैसले की एक महत्वपूर्ण विशेषता न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अलग से मानव संसाधन उपलब्ध कराने का प्रावधान है। नई व्यवस्था के तहत प्रत्येक फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट के लिए एक न्यायिक अधिकारी, एक पूर्णकालिक सरकारी वकील और छह सहायक कर्मचारियों की व्यवस्था का प्रावधान किया गया है।
सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अदालतों में मामलों की सुनवाई केवल न्यायिक अधिकारियों की उपलब्धता पर निर्भर न रहे, बल्कि अभियोजन और प्रशासनिक कार्यों के लिए भी पर्याप्त कर्मचारी मौजूद हों। पूर्णकालिक सरकारी वकील की व्यवस्था से अभियोजन पक्ष की तैयारी और मामलों की सुनवाई में निरंतरता बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।
इसी तरह सहायक कर्मचारियों की उपलब्धता से दस्तावेजों के प्रबंधन, अदालती प्रक्रियाओं और अन्य प्रशासनिक कार्यों को व्यवस्थित करने में मदद मिलने की उम्मीद है। हालांकि, इस व्यवस्था की वास्तविक सफलता समय पर नियुक्तियों, पर्याप्त प्रशिक्षण और न्यायिक संसाधनों के प्रभावी उपयोग पर निर्भर करेगी।
2019 से अब तक 4 लाख से ज्यादा मामलों का निपटारा
फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना की शुरुआत अक्टूबर 2019 में की गई थी। इसके बाद से इन विशेष अदालतों ने बलात्कार और POCSO अधिनियम से जुड़े बड़ी संख्या में मामलों का निपटारा किया है। उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार, इन अदालतों के माध्यम से अब तक 4.02 लाख से अधिक मामलों का निस्तारण किया जा चुका है।
सरकार इसे विशेष अदालतों की उपयोगिता का महत्वपूर्ण संकेतक मान रही है। बड़ी संख्या में मामलों के निपटारे से स्पष्ट होता है कि इन अदालतों ने यौन अपराधों से संबंधित न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हालांकि, मामलों के निपटारे की कुल संख्या के साथ-साथ सुनवाई में लगने वाला औसत समय, लंबित मामलों की स्थिति और न्यायिक संसाधनों की उपलब्धता भी इस योजना के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने के महत्वपूर्ण आधार हैं।
फास्ट ट्रैक कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या भी बढ़ी
विशेष अदालतों के माध्यम से लाखों मामलों का निपटारा होने के बावजूद लंबित मामलों की बढ़ती संख्या एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2023 में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट में लगभग 2.02 लाख मामले लंबित थे। वर्ष 2025 तक यह संख्या बढ़कर करीब 2.45 लाख हो गई। इसका अर्थ है कि इस अवधि में लंबित मामलों की संख्या में लगभग 43 हजार की वृद्धि दर्ज की गई।
ये आंकड़े बताते हैं कि केवल अदालतों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। न्यायिक अधिकारियों की उपलब्धता, समय पर जांच पूरी होना, साक्ष्यों का संकलन और अभियोजन की प्रभावशीलता जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना आवश्यक है। लंबित मामलों की संख्या बढ़ने के पीछे नए मामलों के दर्ज होने की दर, अदालतों में कर्मचारियों की कमी और सुनवाई में देरी जैसे विभिन्न कारण हो सकते हैं। इन कारणों का सटीक आकलन विस्तृत आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकता है।
सिर्फ अदालतों की संख्या बढ़ाने से नहीं बनेगी बात, जांच और अभियोजन में भी तेजी जरूरी
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट की संख्या 850 तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन न्यायिक विशेषज्ञों के दृष्टिकोण से किसी भी त्वरित न्याय व्यवस्था की सफलता कई स्तरों पर निर्भर करती है।
यौन अपराधों के मामलों में पुलिस जांच की गुणवत्ता, फॉरेंसिक रिपोर्ट की समय पर उपलब्धता, गवाहों की सुरक्षा, पीड़ितों को कानूनी सहायता और सरकारी वकीलों की तैयारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि जांच प्रक्रिया में देरी होती है या आवश्यक साक्ष्य समय पर अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए जाते, तो विशेष अदालत होने के बावजूद सुनवाई लंबी खिंच सकती है।
इसलिए फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना के विस्तार के साथ न्यायिक अधिकारियों की समय पर नियुक्ति, पुलिस और अभियोजन एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय तथा आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा।
महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों में त्वरित न्याय पर सरकार का जोर
केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मंत्रिमंडल के फैसलों की जानकारी देते हुए कहा कि सरकार महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अत्याचार के मामलों से सख्ती से निपटने के लिए प्रतिबद्ध है। फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना का विस्तार इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
यौन हिंसा के मामलों में लंबी न्यायिक प्रक्रिया पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए मानसिक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां पैदा कर सकती है। ऐसे मामलों में संवेदनशील सुनवाई, पीड़ितों की गरिमा की रक्षा और समयबद्ध न्याय विशेष महत्व रखते हैं।
सरकार का लक्ष्य विशेष अदालतों की संख्या बढ़ाकर तथा न्यायिक व्यवस्था को अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराकर मामलों के निपटारे की गति में सुधार करना है। हालांकि, त्वरित न्याय के साथ निष्पक्ष सुनवाई और सभी पक्षों के कानूनी अधिकारों की रक्षा भी आवश्यक है।
मोदी सरकार के फैसले से न्यायिक व्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद
फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना के पांच वर्षीय विस्तार से राज्यों को यौन अपराधों से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए अतिरिक्त वित्तीय और प्रशासनिक सहायता मिलने की उम्मीद है। 850 विशेष अदालतों का लक्ष्य पूरा होने पर देश में बलात्कार और POCSO मामलों की सुनवाई के लिए उपलब्ध न्यायिक क्षमता बढ़ सकती है।
इसके साथ प्रत्येक अदालत में न्यायिक अधिकारी, पूर्णकालिक सरकारी वकील और सहायक कर्मचारियों की व्यवस्था न्यायिक कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने में सहायक हो सकती है। अब इस फैसले के क्रियान्वयन में राज्यों की भागीदारी, नई अदालतों की स्थापना, रिक्त पदों पर नियुक्तियां और लंबित मामलों के निपटारे की वास्तविक प्रगति महत्वपूर्ण होगी।
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