प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने जातिगत जनगणना की घोषणा कर दी है। राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति ने शुक्रवार (30 अप्रैल, 2025) को इसकी मंज़ूरी दी है। इसके बाद जनगणना को लेकर नई नई अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं। साथ ही एक बार फिर रोहिणी आयोग की चर्चा सुर्खियों में है। इसके सुझावों और सिफारिशों पर चर्चा चल रही है, जिन्हें जनगणना के बाद लागू किया जा सकता है।
रोहिणी आयोग पर हम विस्तार से बात करेंगे पर उससे पहले आपको ये बताते हैं कि भारत में जातिगत जनगणना कितनी बार और कब-कब हुई। आपको जानकर हैरत होगी कि असल में जातिगत जनगणना सबसे पहले ब्रिटिश जमाने में हुई और आखिरी बार भी। स्वतंत्रता के बाद से अब तक में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना सर्वेक्षण किया जाएगा।
जातिगत जनगणना: ऐतिहासिक संदर्भ
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अंतिम बार 1931 में जातिगत जनगणना के आँकड़े सार्वजनिक किए गए थे।
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1941 में भी जनगणना हुई, लेकिन WWII के कारण आँकड़े अधूरे रह गए।
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स्वतंत्र भारत में 1951 से अब तक केवल SC/ST के आँकड़े एकत्र किए जाते रहे।
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2011 का Socio-Economic and Caste Census (SECC) भी पूरी तरह जातिगत आँकड़े नहीं दे पाया और उसकी रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं हुई।
जातिगत जनगणना की घोषणा (2025) का महत्व
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यह 1931 के बाद पहली बार है जब पूरे भारत में जातिगत डेटा औपचारिक रूप से इकट्ठा किया जाएगा।
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यह राजनीतिक निर्णय मोदी सरकार की नीति में एक बड़ा बदलाव दर्शाता है, क्योंकि पहले भाजपा और RSS इसके विरोध में रहे हैं।
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आगामी 2026 या 2029 के चुनावों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि सामाजिक समूहों की नई पहचान के आधार पर राजनीतिक दल नए वोट बैंक तैयार कर सकते हैं।
रोहिणी आयोग की भूमिका और सिफारिशें
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गठित: 2 अक्टूबर 2017, अध्यक्षता: जस्टिस जी. रोहिणी
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उद्देश्य: OBC का उप-वर्गीकरण करना ताकि समान रूप से आरक्षण का लाभ दिया जा सके।
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मुख्य निष्कर्ष:
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2633 OBC जातियाँ हैं, जिनमें से 983 को कोई लाभ नहीं मिला।
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97% आरक्षण का लाभ केवल 25% OBC जातियाँ उठा रही हैं।
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सुझाव: OBC को चार उप-वर्गों में बाँटना (पूर्ण लाभार्थी, आंशिक लाभार्थी, वंचित, अत्यंत वंचित) और आरक्षण में आरक्षण लागू करना।
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संवैधानिक समर्थन
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अनुच्छेद 340 के तहत यह आयोग वैध है।
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सुप्रीम कोर्ट (1 अगस्त 2024) ने भी “आरक्षण में आरक्षण” को संवैधानिक रूप से वैध करार दिया।
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तेलंगाना इसका पहला राज्य बन गया जिसने SC वर्ग के भीतर वर्गीकरण आधारित आरक्षण लागू किया।
समाज और राजनीति पर संभावित प्रभाव
सकारात्मक प्रभाव:
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अधिक सटीक नीति निर्धारण।
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वंचित समुदायों को प्राथमिकता।
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आरक्षण का लाभ उन तक पहुँच सकेगा जिन्हें वास्तव में ज़रूरत है।
चुनौतियाँ और विवाद:
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ताकतवर OBC जातियाँ इसका विरोध कर सकती हैं यदि उनका कोटा घटाया गया।
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राजनीतिक दलों को अपनी जातीय रणनीतियाँ फिर से गढ़नी होंगी।
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जातीय पहचान और विभाजन की राजनीति फिर से उभर सकती है।
जातिगत जनगणना और रोहिणी आयोग की सिफारिशें भारत की सामाजिक न्याय व्यवस्था में एक ऐतिहासिक मोड़ ला सकती हैं। यह निर्णय आरक्षण नीतियों में गुणवत्ता और न्याय को प्राथमिकता देगा, लेकिन इससे सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों में हलचल भी मच सकती है।